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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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की आंशिक जीवनी है। मुद्राराक्षस से महामति कौटिल्य के अतुल व्यक्तित्व का परिचय प्राप्त किया जा सकता है।

विशाखदत्त के समकालीन कथाकार एवं काव्यशास्त्री आचार्य दण्डी ने कौटिलीय दण्डनीति के अध्ययन पर जोर दिया ही है, वरन् उस दण्डनीति के स्वरूप के सम्बन्ध में भी एक ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया है। दण्डी का कथन है कि 'आचार्य विष्णुगुप्त निर्मित उस दण्डनीति का अध्ययन करो, जिसको उन्होंने मौर्य ( चन्द्रगुप्त ) के लिये छः हजार श्लोकों में संक्षिप्त किया था। जो भी इस उत्तम ग्रन्थ को पढ़ेगा उसको उत्तम फल मिलेगा।' (अधीष्व तावद्दण्डनीतिम्। तदिदमिदानीमाचार्यविष्णुगुप्तेन मौर्यार्थे षड्भिः श्लोकसहस्रैः संक्षिप्ता। सैवेयमधीत्य सम्यगनुष्ठीयमानयथोक्तकार्यक्षमेति )।

कादम्बरी जैसे वृहत्कथा काव्य के निर्माता बाणभट्ट ( ७०० ई० ) ने कौटिल्य शास्त्र का उल्लेख तो किया है, किन्तु मालूम नहीं किस दृष्टि से उन्होंने उसको निकृष्ट शास्त्र की संज्ञा दी है। बाण का कथन है कि 'उन लोगों के लिये क्या कहा जाय जो अति नृशंस कार्य को उचित बताने वाले कौटिल्य के शास्त्र को प्रमाण मानते हैं'। ( किं वा तेषां सांप्रतं येषामतिनृशंसप्रायोपदेशे कौटिल्यशास्त्रप्रमाणम् ।

अर्थशास्त्र और उसकी परंपरा

बृहद् हिन्दू जाति के राजनीतिशास्त्र-विषयक साहित्य का निर्माण लगभग ६५० ई० पूर्व में हो चुका था। यह कल्पसूत्रों की रचना का समय था। कौटिलीय अर्थशास्त्र के सैकड़ों शब्दों में एवं उसकी लेखन-शैली पर कल्पसूत्रों की शब्दावली एवं उनकी रचना-शैली का प्रभाव स्पष्ट लक्षित होता है। ( प्रो० प्राणनाथ विद्यालंकार, कौटिल्य अर्थशास्त्र की प्रस्तावना )।

इससे प्रतीत होता है कि अर्थशास्त्र-विषयक ग्रन्थों का निर्माण कल्पसूत्रों ( ७०० ई० पू० ) के बाद और विशेष रूप से बौधायन-धर्मसूत्र ( ५०० ई० पू० ) के बाद होना आरम्भ हो गया था। बौद्ध-धर्म के प्राण-सर्वस्व जातक-ग्रन्थों का रचनाकाल तथागत बुद्ध से पूर्व अर्थात् लगभग ६०० ई० पू० बैठता है। इन जातकों के अध्ययन से स्पष्ट है कि उस समय तक अर्थशास्त्र को एक प्रमुख विज्ञान के रूप में परिगणित किया जाने लगा था। ( फासबोल जातक, जिल्द २, पृष्ठ ३०, ७४ )।

सूत्रकाल की समाप्ति ( २०० ई० पू० ) के लगभग अर्थशास्त्र एक प्रामाणिक शास्त्र के रूप में समाहित हो चुका था। सूत्र-ग्रन्थों में अर्थशास्त्र-विषयक चर्चाओं को देख कर उसकी मान्यता का सहसा अनुमान लगाया जा सकता है

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