कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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अर्थशास्त्र का व्यापक प्रभाव
संस्कृत-साहित्य के कतिपय ग्रन्थकारों की कृतियों पर अर्थशास्त्र का पर्याप्त प्रभाव है, जिससे उसकी सार्वभौम मान्यता का सहज में ही पता चलता है। ईसवी पूर्व प्रथम शताब्दी में वर्तमान संस्कृत के सुपरिचित महाकवि कालिदास से लेकर याज्ञवल्क्य, वात्स्यायन, विष्णुशर्मा, विशाखदत्त तथा बाण प्रभृति महाकवियों, स्मृतिकारों, गद्यकारों और नाटककारों की सातवीं शताब्दी ई० तक की रची गयी कृतियाँ अर्थशास्त्र से प्रभावित हैं। वैसे भी स्वतन्त्र रूप से अर्थशास्त्र का दाय लेकर अनेक तद्विषयक कृतियाँ संस्कृत में निर्मित हुईं, किन्तु दूसरे विषय के जिन ग्रन्थों में कौटिल्य अर्थशास्त्र का महत्त्व एवं उसकी शैली का अनुकरण है, उनकी संख्या भी पर्याप्त है।
महाकवि कालिदास (१०० ई० पू०) के रघुवंश, कुमारसंभव और शाकुन्तल अत्यधिक रूप से अर्थशास्त्र से प्रभावित हैं। इसी प्रकार याज्ञवल्क्य-स्मृति (१५० ई०) भी अर्थशास्त्र के प्रभाव से अछूती नहीं। आचार्य वात्स्यायन (३०० ई०) ने तो अपने कामसूत्र का एकमात्र आधार कौटिल्य का अर्थशास्त्र स्वीकार किया है और इसी हेतु इन दोनों का प्रकरण-विभाजन भी एक जैसा है। (मिलाइये, अर्थशास्त्र २।१, १०।७, १७।५५, १०।७३, ९।१, ७।१५, १।२, ८।३ क्रमशः रघुवंश १५।९, कुमारसंभव ६।७३, रघुवंश १७।४९, १२।५५, १७।५६, १७।७६, १७।८९, १८।५० तथा शाकुन्तल २।५ कामसूत्रमिदं प्रणीतम्। तस्यायं प्रकरणाधिकरणसमुद्देशः; कामसूत्र १।१)।
संस्कृत के जन्तु-विषयक कथाओं का एकमात्र प्रतिनिधि ग्रन्थ पञ्चतन्त्र संप्रति अपने मूल में उपलब्ध नहीं है, जिसकी रचना ३०० ई० पू० मानी जाती है और अपने विषय का जिसे दुनिया के जन्तु-कथा-काव्यों में पहिला स्थान प्राप्त है, तथापि उसके विभिन्न छायारूपों में विष्णु शर्मा कृत पञ्चतन्त्र ही प्रधान माना जाता है, जिनकी रचना कथमपि ३०० ई० के बाद की नहीं है। इस कथा-ग्रन्थ में चाणक्य के अर्थशास्त्र को मनुस्मृति और कामसूत्र की भाँति अपने विषय का एकमात्र प्रतिनिधि ग्रन्थ कह कर स्मरण किया गया है। (ततो धर्मशास्त्राणि मन्वादीनि, अर्थशास्त्राणि चाणक्यादीनि, कामशास्त्राणि वात्स्यायनादीनि।) पञ्चतन्त्र के प्रथम अध्याय में एक दूसरे स्थल पर अर्थशास्त्र को 'नयशास्त्र' नाम से भी अभिहित किया गया है।
संस्कृत-साहित्य का एक नाटक मुद्राराक्षस है, जिसके रचयिता विशाख-दत्त ६०० ई० के लगभग हुए। यह नाटक एक प्रकार से आचार्य कौटिल्य