भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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एक कल्पित नाम है एवं अर्थशास्त्र तीसरी शती का रचा हुआ एक जाली ग्रन्थ है। ओटोस्टाइन महोदय ने मेगस्थनीज ऐण्ड कौटिल्य नामक अपनी तुलनात्मक पुस्तक में मेगस्थनीज और कौटिल्य के सम्बन्ध में पारस्परिक विरोध दिखाने की चेष्टा की है। ओटोस्टाइन के बाद डा० जोली ने इस क्षेत्र को संभाला और उन्होंने जिन नयी सूझों की उद्भावना की वे आज भी हमारे सामने हैं।

१९२३ ई० में डा० जोली की, पंजाबी संस्कृत सीरीज, लाहौर से एक पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसका नाम है—अर्थशास्त्र ऑफ कौटिल्य। अपनी इस पुस्तक की प्रस्तावना में डाक्टर साहब ने यह सिद्ध किया कि अर्थशास्त्र तीसरी सदी में लिखा गया एक जाली ग्रन्थ है। उसके रचयिता कौटिल्य को डा० जोली ने एक कल्पित राज-मन्त्री कहा है।

डा० जोली के उक्त मत को अतर्क्य कहकर डा० विंटरनित्स ने अपने ग्रन्थ ए हिस्ट्री आफ इण्डियन लिटरेचर (१९२७ ई०) में जोली साहब के मत की ही पुष्टि की। इसके पश्चात् डा० कीथ ने १९२८ ई० में सर आशुतोष स्मारक ग्रन्थ के प्रथम भाग में एक लेख लिखकर भरपूर शब्दों में यह सिद्ध किया कि अर्थशास्त्र की रचना ३०० ई० से पहले की कदापि नहीं हो सकती है। इससे भी आगे बढ़कर उक्त लेख में एक नयी बात उन्होंने यह भी जोड़ दी कि सम्पूर्ण अर्थशास्त्र एक अप्रामाणिक रचना है।

डा० जोली के भ्रमपूर्ण प्रचार और प्रस्तावना में उद्धृत उनके तर्कों को डा० जायसवाल ने खंडित किया और प्रामाणिक आधारों को साक्षी रखकर स्पष्ट किया कि अर्थशास्त्र जैसा संस्कृत साहित्य का महान् ग्रन्थ जाली नहीं है। उसका रचयिता कौटिल्य एक कल्पित व्यक्ति न होकर सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य का महामात्य था। अर्थशास्त्र उसी की कृति है, जो प्रामाणिक रूप में संप्रति उपलब्ध है और जिसकी रचना ४०० ई० पू० में हुई (विस्तृत विवरण के लिए डा० जायसवाल-हिन्दू-राजतन्त्र परिशिष्ट 'ग' 'पहिले खण्ड के अतिरिक्त नोट' पृ० ३२७-३६७) ।

इसी प्रकार श्री जयचंद विद्यालंकार ने डा० कीथ द्वारा अपने निबन्ध में उपस्थित किये गये तर्कों एवं उनकी युक्तियों की विस्तृत आलोचना करके दूसरे इतिहासकारों की इस राय से कि कौटिल्य चन्द्रगुप्त मौर्य (३२५-२७३ ई० पूर्व) के राजमन्त्री थे और अर्थशास्त्र उन्हीं की कृति है, जो अपने प्रामाणिक रूप में उपलब्ध है, अपना अभिमत कौटिल्य अर्थशास्त्र के ३०० ई० पू० के लगभग रचे जाने के समर्थन में पेश किया (चन्द्रगुप्त विद्यालंकार : भारतीय इतिहास की रूपरेखा २, पृ० ५४७, ६७३-७००) ।