कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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घोर विवाद चलता रहा। इस तर्क-वितर्क और वाद-विवाद की परंपरा में जिन देशी-विदेशी विद्वानों का भरपूर हाथ रहा उनमें पं० शामशास्त्री, महामहोपाध्याय पं० गणपतिशास्त्री, श्री काशीप्रसाद जायसवाल, श्री नरेन्द्रनाथ लाहा, श्री राधाकुमुद मुकर्जी, श्री देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर, श्री रमेश मजूमदार, श्री उपेन्द्र घोषाल, श्री प्राणनाथ विद्यालंकार, श्री विनयकुमार सरकार और श्री जयचन्द विद्यालंकार प्रमुख हैं। इसी प्रकार विदेशी विद्वानों में श्री हिलेब्रांट, श्री हर्टेल, याकोबी साहब, श्री विंसेंट स्मिथ, श्री औटो स्टाइन, डा० जोली, डा० विंटरनित्स और डा० कीथ के नाम उल्लेखनीय हैं।
कौटिल्य अर्थशास्त्र के उद्धारक के रूप में पं० शामशास्त्री का नाम अर्थशास्त्र की महानता के साथ अमर हो चुका है। श्री शास्त्री जी ने मैसूर राज्य से प्राप्त कर इस महाग्रन्थ के कुछ अंशों को पहले-पहल १९०५ ई० में इण्डियन एण्टीक्वेरी में सानुवाद प्रकाशित किया और बाद में १९०९ ई० में सम्पूर्ण ग्रन्थ को बड़ी शुद्धता के साथ प्रकाशित भी किया। पं० शामशास्त्री ने ग्रन्थ के विस्तृत उपोद्घात में बड़े पाण्डित्यपूर्ण प्रमाणों के आधार पर अर्थशास्त्र के सम्बन्ध में तीन बातों का विशेष रूप से उल्लेख किया। पहली बात तो उन्होंने यह बतायी कि आचार्य कौटिल्य चन्द्रगुप्त मौर्य के आमात्य थे, दूसरी बात उन्होंने यह दिखायी कि अर्थशास्त्र कौटिल्य की ही कृति है और तीसरा निराकरण उन्होंने यह भी किया है कि अर्थशास्त्र का यही प्रामाणिक मूलपाठ है। पं० शामशास्त्री ने अर्थशास्त्र के जिस अनुवाद को प्रकाशित किया था, ट्रावनकोर राज्य से प्रकाशित कामन्दकीय नीतिसार की टीका में उद्धृत अर्थशास्त्र के अंशों से उनका मिलान ठीक नहीं बैठता है।
अर्थशास्त्र विषयक विवाद
पं० शामशास्त्री की दो बातों का, कि अर्थशास्त्र कौटिल्य की ही कृति है और वह अपने मूलरूप में उपलब्ध है, समर्थन हिलब्रांट, हर्टेल, याकोबी ( १९१२ ई० ) और स्मिथ ने भी किया। श्री विंसेंट स्मिथ ने अपने प्रसिद्ध इतिहास ग्रन्थ अर्ली हिस्ट्री आफ इण्डिया के तीसरे संस्करण ( १९१४ ई० ) में शास्त्री जी की उक्त स्थापनाओं को मान्यता देकर उन पर अपने समर्थन की अन्तिम मुहर लगायी।
स्मिथ साहब के उक्त इतिहास-ग्रन्थ के लगभग आठ वर्ष बाद विदेशी विद्वानों के एक वर्ग ने कौटिल्य, उनके अर्थशास्त्र और उसकी प्रामाणिकता एवं रचना-काल के बारे में अविश्वास की नयी मान्यताओं को स्थापित किया। उनके मतानुसार कौटिल्य, ग्रन्थकार का वास्तविक नाम न होकर