भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पद्यमय ग्रन्थ नीतिसार लिखा, जो कि आचार्य शुक्र कृत शुक्रनीतिसार का संस्करण मात्र था और आधुनिक विद्वानों ने कामन्दकीय नीतिसार के उन उद्धरणों को, जिनको कि मध्ययुग के बाद वाले स्मृतिशास्त्र के टीकाकारों ने उद्धृत किया है, मिलान करने पर पता लगाया कि कामन्दक के नीतिसार का १७वीं शताब्दी के लगभग पुनः संस्करण हुआ।

ईसा की छठीं और सातवीं शताब्दी में विरचित अग्नि और मत्स्य आदि पुराणों में भी यद्यपि अर्थशास्त्र सम्बन्धी चर्चाएँ और तत्सम्बन्धी कुछ आचार्यों के नाम उपलब्ध होते हैं, तथापि वे विशेष महत्त्व के नहीं हैं। नवम-दशम शताब्दी के दो ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं। पहिले अर्थशास्त्र विषयक ग्रन्थ बृहस्पतिसूत्र को डा० एफ० डब्ल्यू० थामस ने खोज कर सम्पादित एवं प्रकाशित किया। यह ग्रन्थ अपने मूलरूप में बहुत प्राचीन था, किन्तु जिस रूप में आज वह उपलब्ध है, वह नवम-दशम शताब्दी का पुनः संस्करण है। इसी प्रकार दूसरा ग्रन्थ दसवीं शताब्दी में विरचित सूत्रात्मक शैली का नीतिवाक्यामृत है, जिसके रचयिता का नाम सोमदेव था। यह सोमदेव कथासरित्सागर का रचयिता ११वीं शताब्दी के काश्मीर देशीय सोमदेव से पृथक् व्यक्ति था।

तदनन्तर १०वीं शताब्दी से लेकर १४वीं शताब्दी तक की कोई कृति उपलब्ध नहीं होती। अर्थशास्त्र विषयक ग्रंथों की निर्माण-परम्परा लगभग १८वीं शताब्दी तक पहुँचती है। अर्थशास्त्र का यह अन्तिम समय नितान्त अवनति का रहा है। १४वीं से १८वीं शताब्दी तक के ग्रन्थकारों में चन्द्रशेखर, मित्रमिश्र और नीलकंठ प्रमुख हैं, जिनके ग्रन्थों का नाम क्रमशः राजनीति रत्नाकर (जायसवाल, बिहार, उड़ीसा, रिसर्च सोसाइटी), वीरमित्रोदय (चौखम्बा संस्कृत सीरीज, वाराणसी से प्रकाशित) और राजनीतिमयूख (स्व० बा० गोविन्ददास, वाराणसी के पुस्तकालय में सुरक्षित) है। चन्द्रशेखर के ग्रंथ में दो अन्य अर्थशास्त्र-विषयक ग्रन्थों के नाम उद्धृत हैं, जिनमें से एक ग्रन्थ राजनीतिकल्पतरु के रचयिता का नाम लक्ष्मीधर और दूसरे विलुप्त नामक ग्रन्थकार का राजनीतिकाकामधेनु है।

इस प्रकार आचार्य कौटिल्य, उनका अर्थशास्त्र और उस परम्परा का आकण्ठ अध्ययन करने के पश्चात् हमें विदित होता है कि संस्कृत-साहित्य की अभिवृद्धि में अर्थशास्त्र का महत्त्वपूर्ण योग रहा है और आचार्य कौटिल्य काल्पनिक व्यक्ति न होकर एक युगविधायक महारथी के रूप में संस्कृत भाषा की महानताओं के साथ अजर एवं अमर हो चुके हैं।