कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण १७३ अध्याय ३
अपसर्पप्रणिधिः
(१) श्रेणीमुख्यमाप्तं निष्पातयेत् । स परमाश्रित्य पक्षापदेशेन स्वविषयात् साचिव्यकरणसहायोपादानं कुर्वीत । कृतापसर्पोपचयो वा परमनुमान्य स्वामिनो दूष्यग्रामं वीतहस्त्यश्वं दूष्यामात्यं दण्डमाक्रन्दं वा हत्वा परस्य प्रेषयेत् । जनपदैकदेशं श्रेणीमटवीं वा सहायोपादानार्थं संश्रयेत । विश्वासमुपगतः स्वामिनः प्रेषयेत् । ततः स्वामी हस्तिबन्धनमटवीघातं वापदिश्य गूढमेव प्रहरेत् ।
(२) एतेनामात्याटविका व्याख्याताः ।
(३) शत्रुणा मैत्रीं कृत्वा अमात्यानवक्षिपेत् । ते तच्छत्रोः प्रेषयेयुः—‘भर्तारं नः प्रसादय’ इति । स यं दूतं प्रेषयेत् । तमुपालभेत—‘भर्ता ते माम-
गुप्तचरों का शत्रु देश में निवास
( १ ) विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह अपने किसी अत्यन्त विश्वस्त श्रेणी-मुख्य को बनावटी शत्रुतावश अपने राज्य से निकाल दे । वह शत्रु-राजा की शरण में जाकर उसका विश्वास प्राप्त करे और उसके कार्य का बहाना बनाकर छिपे तौर से अपने देश की युद्धोपयोगी सहायक वस्तुओं का संग्रह करे । सहायतार्थ जब उसके पास पर्याप्त गुप्तचर एकत्र हो जायँ तब वह शत्रु-राजा की अनुमति से अपने राजा के किसी दूष्यवर्ग या मित्र पर आक्रमण कर वहाँ से विजित हाथी, घोड़े, राजद्रोही अमात्य, सैनिक और मित्र आदि को गिरफ्तार कर शत्रु-राजा के पास भेज दे । विजिगीषु के उस विश्वस्त व्यक्ति को चाहिए कि वह जनपद के किसी एक देश, संघ या आटविक पुरुषों को अपने उस बनावटी स्वामी की सहायता के लिए तैयार करके फिर उनके साथ गुप्त-मंत्रणा करे । जब गुप्त-मंत्रणा द्वारा वे लोग वस्तुस्थिति को जानकर पूरी तरह सहमत हो जाँय तो उन्हें अपने असली स्वामी के सहायतार्थ उसके पास भेज दे । तदनन्तर हाथियों को पकड़ने या जंगल को नष्ट करने का बहाना बनाकर विजिगीषु राजा अपने असावधान शत्रु पर आक्रमण कर दे ।
( २ ) इसी प्रकार अमात्य तथा आटविक को गुप्तचर बनाकर शत्रु-देश में भेज देने की रीति को भी समझ लेना चाहिए ।
( ३ ) विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह अपने शत्रु राजा के साथ बनावटी मित्रता करके अपने अमात्यों का तिरस्कार कर दे, वे अमात्य उस शत्रु-राजा के