कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 800, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७१६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तेरहवाँ अधिकरण |
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मात्यैर्भेदयति, न च पुनरिहागन्तव्यम्' इति । अथैकममात्यं निष्पातयेत् । स परमाश्रित्य योगापसर्परक्तदूष्यानशक्तिमतः स्तेनाटविकानुभयोपघातकान् वा परस्योपहरेत् । आप्तभावोपगतः प्रवीरपुरुषोपघातमस्योपहरेत् । अन्तपालमाटविकं दण्डचारिणं वा—'दृढमसौ चासौ च ते शत्रुगा सन्धत्ते' इति । अथ पश्चादभित्यक्तशासनै रेनान्धातयेत् । (१) दण्डबलव्यवहारेण वा शत्रुमुद्योज्य घातयेत् । (२) कृत्यपक्षोपग्रहेण वा परस्यामित्रं राजानमात्मन्यपकारयित्वाभियुञ्जीत । ततः परस्य प्रेषयेत् । 'असौ ते वैरी ममापकरोति, तमेहि सम्भूय हनिष्यावः । भूमौ हिरण्ये वा ते परिग्रहः' इति । प्रतिपन्नमभिसत्कृत्यागत-
पास अपने दूत को इस प्रकार का संदेश लेकर भेजें कि 'आप हमारे स्वामी को प्रसन्न करा दीजिए ।' उसके बाद जब शत्रु-राजा अपने जिस दूत को विजिगीषु राजा के पास भेजे, उसको विजिगीषु राजा यह कह कर धमका दे कि 'तुम्हारा राजा, हमारे अमात्यों को हमसे अलग करना चाहता है । खबरदार ! ऐसा संदेश लेकर मेरे पास फिर कभी न आना' । इसके बाद विजिगीषु राजा उन अमात्यों में से एक अमात्य को अपने यहाँ से निकाल दे । वह अमात्य शत्रु-राजा की शरण में जाकर अपने राजा के गुप्तचर, गूढ़-पुरुष, दूष्य-पुरुष, चोर तथा 'आटविक आदि को साथ ले जाकर शत्रु-राजा के पास जाये और उससे कहे कि, 'मैंने आपके लिए इतने सहायक तैयार कर दिये हैं' जब शत्रु-राजा उस अमात्य पर पूरा विश्वास करने लगे तो वह अमात्य शत्रु-राजा के शक्तिशाली पुरुषों को मरवा डाले । वह अमात्य शत्रु-राजा से कहे कि 'आपके ये आटविक और सैनिक लोग बड़े दुष्ट हो गए हैं । मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि अमुक आटविक या अमुक सैनिक आपके शत्रु-राजा के साथ संधि कर रहे हैं ।' तदनन्तर वह अमात्य वध्य पुरुषों के पास आटविक और विजिगीषु की पारस्परिक मित्रता को प्रकट करने वाले कपट लेखों को उस शत्रु-राजा को दिखाकर उन अन्तःपाल आदि को मरवा डाले ।
( १ ) अथवा वह अमात्य शत्रु को सैनिक सहायता देने का वायदा कर उसको उसके शत्रु से भिड़ा दे और बाद में उसकी सहायता न कर उसके शत्रु द्वारा ही उसको मरवा डाले ।
( २ ) अथवा विजिगीषु को चाहिए कि वह शत्रु के क्रुद्ध, लुब्ध तथा भीत आदि प्रतिपक्ष को अपने अनुकूल बनाकर शत्रु के शत्रु राजा द्वारा अपना कुछ अपकार कराये और फिर उस पर चढ़ाई कर दे । उसके बाद विजिगीषु शत्रु-राजा के पास अपने दूत द्वारा यह संदेश भेजे कि 'यह तुम्हारा शत्रु-राजा बराबर मेरा अपकार कर रहा है, आओ, हम दोनों मिलकर उस पर चढ़ाई कर दें । इस विजय में जो