कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १७३ : अ० ३ ] अपसर्पप्रणिधि ७१९
ते युद्धावस्कन्दावरोधव्यसनेषु शत्रुमतिसन्दध्युः, भेदं वास्य स्ववर्गेभ्यः कुर्युः, अभित्यक्तशासनैः प्रतिसमानयेयुः ।
(१) लुब्धकव्यञ्जना वा मांसविक्रयेण द्वाःस्था दौवारिकापाश्रयाश्चोराभ्यागमं परस्य द्विस्त्रिरिति निवेद्य लब्धप्रत्यया भर्तुरनीकं द्विधा निवेश्य ग्रामवधेऽवस्कन्दे च द्विषतो ब्रूयुः—'आसन्नश्चोरगणः, महांश्चाक्रन्दः, प्रभूतं सैन्यमागच्छतु' इति । तदर्पयित्वा ग्रामघातदण्डस्य सैन्यमितरदादाय रात्रौ दुर्गद्वारेषु ब्रूयुः—'हतश्चोरगणः, सिद्धयात्रमिदं सैन्यमागतं, द्वारमपान्वियताम्' इति पूर्वप्रणिहिता वा द्वाराणि दद्युः, तैः सह प्रहरेयुः ।
(२) कारुशिल्पिपाषण्डकुशीलववैदेहकव्यञ्जनानायुधीयान् वा परदुर्गे प्रणिदध्यात् । तेषां गृहपतिकव्यञ्जनाः काष्ठतृणधान्यपण्यशकटैः प्रहरणा-
बहाना कर अपने यहाँ से निकाल दे कि वे लोग विजिगीषु के कृत्य पक्ष की सहायता करते हैं । निकाले हुए वे लोग शत्रु की शरण में जाकर युद्ध के समय, सोते समय, अन्तःपुर में रहते समय या किसी आपत्ति के समय मौका पाकर शत्रु को मार डालें । अथवा शत्रु-राजा और उसके अमात्यों के बीच फूट पैदा कर दें और वध्य पुरुषों के द्वारा लाये गये कपट लेखों के प्रमाण से शत्रु-राजा तथा उसके अमात्यों की फूट को अधिक बढ़ा दें ।
( १ ) अथवा शिकारी के वेश में रहने वाले गुप्तचर मांस बेचने के बहाने दरवाजे पर ठहर कर पहरेदारों से मित्रता करके दो तीन बार चिल्लाकर कहें कि 'शत्रु के गाँव में चोर आते हैं' । जब शत्रु राजा को उनकी बातों पर विश्वास हो जाय तो वे गुप्तचर अपने राजा की सेना को ग्रामवध और लूटमार करने ( अवस्कंद ) के लिए दो भागों में बाँट कर शत्रु-राजा से कहें कि 'चोरों का समूह बिलकुल नजदीक आ गया है, उनकी संख्या बहुत है, अतः मुकाबले के लिए आपकी बहुत-सी सेना हमारे साथ जानी चाहिए।' जब शत्रु-राजा चोरों को दण्ड देने के लिए अपनी सेना भेज दे तो वे ही गुप्तचर अपने राजा की सेना के दूसरे हिस्से को लेकर रात के समय दुर्ग के दरवाजों पर आकर चिल्ला-चिल्ला कर कहें कि 'हमने चोरों के समूह को मार डाला है, यह सेना अपने कार्य को सफल करके यहाँ पहुँच गयी है, इसलिए दुर्ग के दरवाजों को खोल दिया जाय' । अथवा पहिले नियुक्त हुए गुप्तचर ही इशारा पाकर दरवाजे खोल दें और उस सेना के सहित वे गुप्तचर दुर्ग पर हमला बोल दें ।
( २ ) अथवा कारु, शिल्पी, पाखण्डी, कुशीलव और वैदेहक आदि के वेष में रहने वाले या आयुधजीवियों के वेष में रहने वाले गुप्तचरों को भेदिया बनाकर दुर्ग में बसा देना चाहिए । उनमें से गृहस्थ के वेष में रहने वाले गुप्तचर दूसरे गुप्तचरों को लकड़ी, घास, अनाज आदि की गाड़ियों में हथियार तथा कवच आदि पहुँचाते रहें ।