कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ७२० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तेरहवां अधिकरण |
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वरणान्यभिहरेयुः, देवध्वजप्रतिमाभिर्वा । ततस्तद्व्यञ्जनाः प्रमत्तवधमव- स्कन्दप्रतिग्रहमभिप्रहरणं पृष्ठतः शङ्खदुन्दुभिशब्देन वा प्रविष्टमित्यावेद- येयुः । प्राकारद्वाराट्टालकदानमनीकभेदं घातं वा कुर्युः । (१) सार्थगणवासिभिरातिवाहिकैः कन्यावाहिकैरश्वपण्यव्यवहारिभि- रुपकरणहारकैर्धान्यक्रेतृविक्रेतृभिर्वा प्रव्रजितलिङ्गिभिर्दूतैश्चदण्डातिनयनं सन्धिकर्म विश्वासनाथम् । (२) इति राजापसर्पाः । (३) एत एवाटवीनामपसर्पाः कण्टकशोधनोक्ताश्च । व्रजमटव्यासन्न- मपसर्पाः सार्थं वा चोरैर्घातयेयुः । कृतसङ्केतमन्नपानं चात्र मदनरसविद्धं वा कृत्वाऽपगच्छेयुः । गोपालकवैदेहकाश्च ततश्चोरान् गृहीतलोप्त्रभाराः मदन- रसविकारकालेऽवस्कन्दयेयुः । सङ्कर्षणदैवतीया वा मुण्डजटिलव्यञ्जनाः
अथवा देवताओं की ध्वजाओं तथा प्रतिमाओं के साथ वे हथियार वहाँ पहुँचाये जायें । उसके बाद कारु आदि के वेष में रहने वाले गुप्तचर प्रमादी पुरुषों के वध, बलात्कार, लूट-मार और चारों ओर के आक्रमण के सम्बन्ध में शंख तथा नगाड़े आदि बजाकर पीछे की ओर से हमला हो जाने की सूचना दें । जब शत्रु उनका प्रतीकार करने के लिए सेना लेकर पीछे की ओर से जाय तो इधर से वे गुप्तचर परकोटा प्रधान दरवाजा तथा उसके ऊपर की अटारी तोड़ने के साथ ही शत्रु ही सेना को पूर्ववत् विभक्त कर यथावसर उसको नष्ट कर दें ।
( १ ) उन्हीं गुप्तचरों को चाहिए कि दुर्गम मार्गों से पार करने वाले व्यापारियों के झुंड में रहते हुए, कन्याओं को ले जाते हुए, घोड़ों का व्यापार करते हुए, तत्सम्बन्धी दूसरे सौदों को बेचते हुए, सामान को इधर-उधर ढोते हुए, अनाज आदि की खरीद-फरोख्त करते हुए और संन्यासियों के वेष में रहते हुए अपनी सेनाओं को दुर्गम रास्तों से निकालकर बाहर ले आवें तथा शत्रु के विश्वास के लिए सन्धि की शर्तों का पूरा-पूरा ध्यान रखें ।
( २ ) इस प्रकार यहाँ तक राजाओं के गुप्त-पुरुषों का निरूपण किया गया ।
( ३ ) कण्टकशोधन अधिकरण में और इस अध्याय में कहे गए गुप्तचर ही आटविकों के भी समझने चाहिए । अर्थात् आवश्यकता होने पर आटविकों में भी वही गुप्तचर कार्य करें । आटविकों के बीच में रहने वाले गुप्तचरों को चाहिए कि वे जंगल के पास की गोशालाओं तथा राहगीरों को आटविकों के साथ मिलकर लूट डालें या नष्ट कर डालें, उसके बाद संकेत पाते ही उनके खाने-पीने की वस्तुओं में विष मिलाकर वहाँ से भाग निकलें । फिर ग्वालों और व्यापारियों के वेश में रहने वाले गुप्तचर चोरों द्वारा चुराये गये उस माल को स्वयं लेकर विष खाने से बेहोश