कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १७७ : अ० १ ] शत्रु-वध के प्रयोग ७४३
(१) चण्डालाग्निं च मांसेन चिताग्निं मानुषेण च ।
समस्तान् बस्तवसया मानुषेण ध्रुवेण च ॥
जुहुयादग्निमन्त्रेण राजवृक्षकदारुभिः ।
एष निष्प्रतिकारोऽग्निर्द्विषतां नेत्रमोहनः ॥
(२) अदिते ! नमस्ते, अनुमते ! नमस्ते, सरस्वति ! नमस्ते, देव ! सवितर्नमस्ते । अग्नये स्वाहा, सोमाय स्वाहा, भूः स्वाहा, भुवः स्वाहा ।
इति औपनिषदिके चतुर्दशाऽधिकरणे परघातप्रयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः;
आदितः पञ्चचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।
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किया जाय, व्यभिचारिणी स्त्री के घर से लायी गयी अग्नि में सरसों से हवन किया जाय; सूतिका गृह से लायी गयी अग्नि में दही से हवन किया जाय; अग्निहोत्री के घर से लायी गयी अग्नि में चावलों से हवन किया जाय ।
( १ ) चांडाल के यहाँ से लायी गयी अग्नि में मांस से हवन किया जाय; चिता से लायी गयी अग्नि में मनुष्य से हवन किया जाय; और तदनंतर इन सब अग्नियों को एकत्र करके उनमें बकरी की चर्बी से सूखी बरगद की लकड़ी से हवन किया जाय; तदनन्तर अग्नि के स्तुतिवाचक मंत्रों द्वारा अमलतास की लकड़ियों द्वारा हवन किया जाय । इस प्रकार की अग्नि का फिर कोई प्रतीकार नहीं है । यह अग्नि केवल दुर्ग आदि को ही नहीं जलाती, वरन् उसको देखने मात्र से ही शत्रुओं की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है ।
( २ ) इन मंत्रों से हवन किया जाय—आदिते ! नमस्ते । अनुमते ! नमस्ते । सरस्वति ! नमस्ते । देव ! सवितर्नमस्ते । अग्नये स्वाहा । सोमाय स्वाहा । भूः स्वाहा । भुवः स्वाहा ।
औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में परघातप्रयोग नामक पहला अध्याय समाप्त
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