भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 83

( ७९ )

विषयपृष्ठ
७ : द्वैधीभाव सम्बन्धी सन्धि और विक्रम४८४
८ : यातव्य सम्बन्धी व्यवहार और अनुग्रह करने वाले मित्रों के प्रति कर्तव्य४८९
९ : मित्र-सन्धि और हिरण्य-सन्धि ( सन्धिविचार १ )४९३
१० : भूमि-सन्धि ( सन्धि-विचार २ )५००
११ : अनवसित सन्धि ( सन्धि-विचार ३ )५०५
१२ : कर्म-सन्धि ( सन्धि-विचार ४ )५११
१३ : पाष्णिग्राह-चिन्ता५१६
१४ : दुर्बल विजिगीषु के लिये शक्तिसंचय के साधन५२२
१५ : बलवान् शत्रु और विजित शत्रु के साथ व्यवहार५२७
१६ : अधीनस्थ राजाओं के प्रति विजेता विजिगीषु का व्यवहार५३२
१७ : सन्धि-कर्म और सन्धि-मोक्ष५३७
१८ : मध्यम, उदासीन और मण्डलचरित५४४

( ८ ) व्यसनाधिकारिक : आठवाँ अधिकरण

१ : प्रकृतियों के व्यसन और उनका प्रतीकार५५५
२ : राजा और राज्य के व्यसनों पर विचार५६२
३ : सामान्य पुरुषों के व्यसन५६६
४ : पीडनवर्ग, स्तम्भवर्ग और कोषसङ्गवर्ग५७३
५ : सेना-व्यसन और मित्र-व्यसन५८१

( ९ ) अभियास्यत्कर्म : नौवाँ अधिकरण

१ : शक्ति, देश, काल, बल-अबल का ज्ञान और आक्रमण का समय५८९
२ : सैन्य-संग्रह का समय, सैन्य-संगठन और शत्रुसेना से मुकाबला५९५
३ : पश्चात्कोपचिन्ता और बाह्याभ्यन्तर प्रकृति के कोप का प्रतीकार६०२
४ : क्षय, व्यय और लाभ का विचार६०६
५ : बाह्य और आभ्यन्तर आपत्तियाँ६१३
६ : राजद्रोही और शत्रुजन्य आपत्तियाँ६१७
७ : अर्थ, अनर्थ तथा संशय सम्बन्धी आपत्तियाँ और उनके प्रतीकार के उपायों से प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ६२५

( १० ) साङ्ग्रामिक : दसवाँ अधिकरण

१ : छावनी का निर्माण६३७
२ : छावनी-प्रयाण और आपत्ति एवं आक्रमण के समय सेना की रक्षा६४०
३ : कूट-युद्ध के भेद : अपनी सेना का प्रोत्साहन और अपनी तथा पराई सेना का प्रयोग६४४