कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
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| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ७ : द्वैधीभाव सम्बन्धी सन्धि और विक्रम | ४८४ |
| ८ : यातव्य सम्बन्धी व्यवहार और अनुग्रह करने वाले मित्रों के प्रति कर्तव्य | ४८९ |
| ९ : मित्र-सन्धि और हिरण्य-सन्धि ( सन्धिविचार १ ) | ४९३ |
| १० : भूमि-सन्धि ( सन्धि-विचार २ ) | ५०० |
| ११ : अनवसित सन्धि ( सन्धि-विचार ३ ) | ५०५ |
| १२ : कर्म-सन्धि ( सन्धि-विचार ४ ) | ५११ |
| १३ : पाष्णिग्राह-चिन्ता | ५१६ |
| १४ : दुर्बल विजिगीषु के लिये शक्तिसंचय के साधन | ५२२ |
| १५ : बलवान् शत्रु और विजित शत्रु के साथ व्यवहार | ५२७ |
| १६ : अधीनस्थ राजाओं के प्रति विजेता विजिगीषु का व्यवहार | ५३२ |
| १७ : सन्धि-कर्म और सन्धि-मोक्ष | ५३७ |
| १८ : मध्यम, उदासीन और मण्डलचरित | ५४४ |
( ८ ) व्यसनाधिकारिक : आठवाँ अधिकरण
| १ : प्रकृतियों के व्यसन और उनका प्रतीकार | ५५५ |
| २ : राजा और राज्य के व्यसनों पर विचार | ५६२ |
| ३ : सामान्य पुरुषों के व्यसन | ५६६ |
| ४ : पीडनवर्ग, स्तम्भवर्ग और कोषसङ्गवर्ग | ५७३ |
| ५ : सेना-व्यसन और मित्र-व्यसन | ५८१ |
( ९ ) अभियास्यत्कर्म : नौवाँ अधिकरण
| १ : शक्ति, देश, काल, बल-अबल का ज्ञान और आक्रमण का समय | ५८९ |
| २ : सैन्य-संग्रह का समय, सैन्य-संगठन और शत्रुसेना से मुकाबला | ५९५ |
| ३ : पश्चात्कोपचिन्ता और बाह्याभ्यन्तर प्रकृति के कोप का प्रतीकार | ६०२ |
| ४ : क्षय, व्यय और लाभ का विचार | ६०६ |
| ५ : बाह्य और आभ्यन्तर आपत्तियाँ | ६१३ |
| ६ : राजद्रोही और शत्रुजन्य आपत्तियाँ | ६१७ |
| ७ : अर्थ, अनर्थ तथा संशय सम्बन्धी आपत्तियाँ और उनके प्रतीकार के उपायों से प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ | ६२५ |
( १० ) साङ्ग्रामिक : दसवाँ अधिकरण
| १ : छावनी का निर्माण | ६३७ |
| २ : छावनी-प्रयाण और आपत्ति एवं आक्रमण के समय सेना की रक्षा | ६४० |
| ३ : कूट-युद्ध के भेद : अपनी सेना का प्रोत्साहन और अपनी तथा पराई सेना का प्रयोग | ६४४ |