भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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विषयपृष्ठ
४ : गुप्त षड्यन्त्रकारियों से प्रजा की रक्षा के उपाय३६१
५ : सिद्धवेषधारी गुप्तचरों द्वारा दुष्टों का दमन३६४
६ : शंकित पुरुषों की पहिचान, चोरी के माल की पहिचान और चोर की पहिचान३६७
७ : आशुमृतक की परीक्षा३७२
८ : जाँच और यातना के द्वारा चोरी को अंगीकार करना३७६
९ : सरकारी विभागों और छोटे-बड़े कर्मचारियों की निगरानी३८०
१० : एकांग वध अथवा उसकी जगह द्रव्य-दण्ड३८६
११ : शुद्धदण्ड और चित्रदण्ड३८८
१२ : कुँवारी कन्या से संभोग करने का दण्ड३६३
१३ : अतिचार का दण्ड३९८

( ५ ) योग-वृत्त : पाँचवाँ अधिकरण

१ : राजद्रोही उच्चाधिकारियों के सम्बन्ध में दण्ड-व्यवस्था४०५
२ : कोष का अधिकाधिक संग्रह४१२
३ : भृत्यों का भरण-पोषण४२०
४ : राजकर्मचारियों का राजा के प्रति व्यवहार४२५
५ : व्यवस्था का यथोचित पालन४२८
६ : विपत्तिकाल में राज-पुत्र का अभिषेक और एकछत्र राज्य की प्रतिष्ठा४३२

( ६ ) मण्डल-योनि : छठा अधिकरण

१ : प्रकृतियों के गुण४४१
२ : शान्ति और उद्योग४४५

( ७ ) षाड्गुण्य : सातवाँ अधिकरण

१ : छह गुणों का उद्देश्य और क्षय, स्थान तथा वृद्धि का निश्चय४५३
२ : बलवान् का आश्रय४५८
३ : सम, हीन तथा बलवान् राजाओं के चरित्र और हीन राजा के साथ संबन्ध४६१
४ : विग्रह करके आसन और यान का अवलंबन४६६
५ : यान संबन्धी विचार, प्रकृतिमण्डल के क्षय, लोभ तथा विराग के हेतु और सहयोगी समवायिकों का हिस्सा४७०
६ : सामूहिक प्रयाण और देश, काल तथा कार्य के अनुसार संधियाँ४७७