कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
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( ३ ) धर्मस्थीय : तीसरा अधिकरण
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १ : शर्तनामों का लेखन-प्रकार और तत्सम्बन्धी विवादों का निर्णय | २५५ |
| २ : विवाह-सम्बन्ध : (१) धर्म-विवाह : स्त्री का धन : स्त्री को पुनर्विवाह का अधिकार : पुरुष को पुनर्विवाह का अधिकार | २६१ |
| ३ : विवाह-सम्बन्ध : ( २ ) स्त्री की परवरिश : कठोर स्त्री के साथ व्यवहार : पति-पत्नी का द्वेष : पति-पत्नी का अतिचार : अतिचार पर प्रतिषेध | २६६ |
| ४ : विवाह-सम्बन्ध : (३) परिणीता का निष्पतन : पर पुरुष का अनुसरण : पुनर्विवाह की स्थिति | २७० |
| ५ : दाय-विभाग : उत्तराधिकार का सामान्य नियम | २७५ |
| ६ : दाय-विभाग : पैतृक क्रम से विशेषाधिकार | २७९ |
| ७ : दाय-विभाग : पुत्रक्रम से उत्तराधिकार | २८२ |
| ८ : वास्तुक : गृह-निर्माण | २८६ |
| ९ : वास्तुक : मकान बेचना : सीमा-विवाद : खेतों की सीमाएँ : मिश्रित विवाद : कर की छूट | २८९ |
| १० : वास्तुक : रास्तों का रोकना : गावों का बन्दोबस्त : चारागाहों का प्रबन्ध : सामूहिक कार्यों में शामिल न होने का मुआवजा | २९४ |
| ११ : ऋण लेना | २९९ |
| १२ : धरोहरसम्बन्धी नियम | ३०५ |
| १३ : दास और श्रमिक सम्बन्धी नियम | ३११ |
| १४ : मजदूरी के नियम और साझीदारी का हिस्सा | ३१६ |
| १५ : क्रय-विक्रय का बयाना | ३२० |
| १६ : दान किये हुये धन को न देना; अस्वामि-विक्रय, स्व-स्वामि-सम्बन्ध | ३२३ |
| १७ : साहस | ३२८ |
| १८ : वाक्पारुष्य | ३३१ |
| १९ : दण्डपारुष्य | ३३४ |
| २० : द्यूत-समाह्वय और प्रकीर्णक | ३३९ |
( ४ ) कण्टक-शोधन : चौथा अधिकरण
१ : शिल्पियों से प्रजा की रक्षा | ३४५ २ : व्यापारियों से प्रजा की रक्षा | ३५२ ३ : दैवी आपत्तियों से प्रजा की रक्षा के उपाय | ३५६