भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 831

प्र० १७८ : अ० २ ] प्रलम्भन योग में उत्पादन ७४७

(१) पारिभद्रकत्वग्वज्रकदलीतिलकल्कप्रदिग्धं शरीरमग्निना ज्वलति । (२) पीलुत्वङ्मषीमयः पिण्डो हस्ते ज्वलति । मण्डूकवसादिग्धोऽग्निना ज्वलति । (३) तेन प्रदिग्धमङ्गं कुशाम्रफलतैलसिक्तं समुद्रमण्डूकीफेनकसर्जरस-चूर्णयुक्तं वा ज्वलति । (४) मण्डूकवसासिद्धेन पयसा कुलीरादीनां वसया समभागं तैलं सिद्ध-मभ्यङ्गो गात्राणामग्निप्रज्वालनम् । मण्डूकवसादिग्धोऽग्निना ज्वलति । (५) वेणूमूलशैवललिप्तमङ्गं मण्डूकवसादिग्धमग्निना ज्वलति । (६) पारिभद्रकप्रतिबलावञ्जुलवज्रकदलीमूलकल्केन मण्डूकवसा-दिग्धेन तैलेनाभ्यक्तपादोऽङ्गारेषु गच्छति । (७) उपोदका प्रतिबला वञ्जुलः पारिभद्रकः । एतेषां मूलकल्केन मण्डूकवसया सह ॥


नीम की छाल की स्याही, इनमें से प्रत्येक चूर्ण को देह पर मलने से बिना किसी पीड़ा या जलन के शरीर पर आग जलने लगती है ।

( १ ) नीम की छाल, थूहर, केला और तिल के कल्क से पोते हुए शरीर पर बिना किसी पीड़ा के अग्नि जलने लगती है ।

( २ ) पीलु वृक्ष की छाल की स्याही का बना हुआ गोला, बिना अग्नि-संसर्ग के ही, हाथ में जलने लगता है। मेढक की चर्बी से सना हुआ वही गोला आग के संसर्ग से जलने लगता है।

( ३ ) उस गोले को अंग में लपेट कर कुशा के तेल और आम की गुठली के तेल से शरीर में चुपड़े अथवा समुद्री मेढ़की, समुद्रफेन और राल, इन सब के चूर्ण को देह में लगाया जाय तो अग्नि का संसर्ग होते ही देह जलने लगती है ।

( ४ ) मेढ़क की चर्बी के साथ पके हुए दूध तथा केंकड़े की चर्बी में उतना ही तेल मिलाकर यदि उससे मालिश की जाय तो शरीर में अग्नि की लपटें उठने लगती हैं । मेढ़क की चर्बी से सना हुआ व्यक्ति अग्नि का संसर्ग पाते ही जल उठता है ।

( ५ ) बाँस की जड़ और सेंवार से लिपा हुआ अंग तथा मेढक की चर्बी से लिपा हुआ अंग अग्नि के संसर्ग से जलने लगता है ।

( ६ ) नीम ( पारिभद्रक ), खरेंटी ( प्रतिबला ), वंजुल ( तेंदुआ, बेत, अशोक ) थूहर और केला, इन सब पेड़ों की जड़ों का कल्क बनाकर तथा उसमें मेढक की चर्बी एवं तेल मिला लिया जाय और तब उस योग की पैरों में मालिस की जाय तो अंगारों कें ऊपर चला जा सकता है ।

( ७ ) पोदीना ( उपोदका ), खरेंटी, वंजुल और नीम, इनके पेड़ों की जड़ों का कल्क बनाकर उसमें मेढक की चर्बी मिला दी जाय तो उस तेल का साफ पैरों