कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण
साधयेत्तैलमेतेन पादावभ्यज्य निर्मलौ ।
अङ्गारराशौ विचरेद्यथा कुसुमसञ्चये ॥
(१) हंसक्रौञ्चमयूराणामन्येषां वा महाशकुनीनामुदकप्लवानां पुच्छेषु बद्धा नलदीपिका रात्रावुल्कादर्शनम् ।
(२) वैद्युतं भस्माग्निशमनम् ।
(३) स्त्रीपुष्पपायिता माषा व्रजकुलीमूलं मण्डूकवसामिश्रं चुल्ल्यां दीप्तायामपाचनम् । चुल्लीशोधनं प्रतीकारः ।
(४) पीलुमयो मणिरग्निगर्भः सुवर्चलामूलग्रन्थिः सूत्रग्रन्थिर्वा पिचुपरिवेष्टितो मुखादग्निधूमोत्सर्गः ।
(५) कुशाम्रफलतैलसिक्तोऽग्निर्वर्षप्रवातेषु ज्वलति ।
(६) समुद्रफेनकस्तैलयुक्तोऽम्भसि प्लवमानो ज्वलति ।
(७) प्लवङ्गमानामस्थिषु कल्माषवेणुना निर्मथितोऽग्निर्नोदकेन शाम्यति, उदकेन च ज्वलति ।
में मालिश करने से धधकते अंगारों के ढेर में वैसे ही घूमा जा सकता है, जैसे कि फूलों के ढेर में ।
( १ ) यदि हंस, क्रौंच, मयूर और अन्य बत्तख आदि जलचर पक्षियों की पूंछों पर नलदीपिका ( नरकट पर रखी हुई छोटी-सी जलती हुई बत्ती ) लगायी जाय तो वह रात में दूर से भयप्रद उल्का के समान दिखाई देती है ।
( २ ) बिजली गिरने से जली हुई लकड़ी की राख अग्नि को शांत कर देती है ।
( ३ ) स्त्री के रज से मिले हुए उड़द और मेढक की चर्बी से मिली हुई गोष्ठ ( गायों की जगह ) में पैदा होने वाली बड़े कटहल की जड़, इन दोनों को आग पर चढ़ाकर कितना भी पकाया जाय, पर नहीं पकती । चूल्हे से उतार कर इनको साफ कर देना ही इनका प्रतीकार है ।
( ४ ) पीलु की लकड़ी से बना हुआ मटका अग्निगर्भ ( तत्काल ही अग्नि को खींचने वाला ) होता है । अलसी की जड़ की गांठ या अलसी के सूतों की गांठ रूई से लपेट देने पर मुँह से आग और धुआँ छोड़ने का साधन है ।
( ५ ) कुश, आम और तेल के सहारे जलायी हुयी आग आँधी और वर्षा में भी जलती रहती ।
( ६ ) पानी में तैरते हुए समुद्र झाग में यदि तेल मिला दिया जाय तो वह जलते हुए तैरता रहेगा ।
( ७ ) बंदर की हड्डियों में विचित्र बाँस के मंथन से पैदा की गई अग्नि जल से नहीं बुझ सकती है, बल्कि जल के संसर्ग से वह और भी धधकने लगती है ।