भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० १७८ : अ० २ ] प्रलम्भन योग में उत्पादन ७४९

(१) शस्त्रहतस्य शूलप्रोतस्य वा पुरुषस्य वामपार्श्वपर्शुकास्थिषु कल्माषवेणुना निर्मथितोऽग्निः, स्त्रियाः पुरुषस्य वास्थिषु मनुष्यपर्शुक्रया निर्मथितोऽग्नियंत्र त्रिप्रसव्यं गच्छति, न चात्रान्योऽग्निर्ज्वलति ।

(२) चुचुन्दरी खञ्जरीटः खारकीटश्च पिष्यते ।
अश्वमूत्रेण संसृष्टा निगलानां तु भञ्जनम् ॥

(३) अयस्कान्तो वा पाषाणः ।
(४) कुलीराण्डदर्दुरखारकीटसाप्रदेहेन द्विगुणो दारकगर्भः कङ्कभास-पार्श्वोत्पलोदकपिष्टश्चतुष्पदद्विपदानां पादलेपः, उलूकगृध्रवसाभ्यामुष्ट्र-चर्मोपानहावभ्यज्य वटपत्रैः प्रतिच्छाद्य पञ्चाशद्योजनान्यश्रान्तो गच्छति । श्येनकङ्ककाकगृध्रहंसक्रौञ्चवीचिरल्लानां मज्जानो रेतांसि वा योजन-शताय । सिंहव्याघ्रद्वीपिकाकोलूकानां मज्जानो रेतांसि वा, सार्ववर्णिकानि गर्भपतनान्युष्ट्रिकायामभिषूय श्मशाने प्रेतशिशून् वा तत्समुत्थितं मेदो योजनशताय ।


(१) तलवार, भाला या त्रिशूल आदि से मारे हुए पुरुष की बाईं पसली की हड्डियों में विचित्र बाँस के मंथन से पैदा की गई अग्नि, या स्त्री अथवा पुरुष की हड्डियों में मनुष्यों की पसली से मंथन कर पैदा हुई अग्नि, इन दोनों अग्नियों को जहाँ पर तीन बार वाईं ओर से घुमा दिया जाय, वहाँ पर कोई आग नहीं जल सकती है।

(२) छुछुन्दर, खंजन और खारकीट, इन तीनों को घोड़े के पेशाब के साथ अलग-अलग पीस कर फिर एक साथ मिला दिया जाय तो वह मिश्रण बेड़ी, हथकड़ी, आदि तोड़ने के काम में आ सकता है।

(३) अथवा अयस्कांत नामक मणि से भी लोहे की जंजीरें तोड़ी जा सकती हैं।

(४) केंकड़े के अंडे, मेढक, खारकीट की चर्बी से बढ़ाये हुए सूकरगर्भ को कंक पक्षी, गिद्ध की पसलियों तथा कमल के जल से पीस कर, उस औषधि को चौपायों या दुपायों के पैरों में लेप कर दिया जाय तो बिना थकावट के पचास योजन तक चला जा सकता है, उल्लू, तथा गिद्ध की चर्बी को ऊँट के चमड़े से बने जूतों पर चुपड़ कर और बरगद के पत्तों से ढँककर फिर उन्हीं जूतों को पहिन कर पचास योजन तक बिना थकावट के सफर किया जा सकता है; बाज, सफेद चील (कंक), कौआ, गीध, हंस, क्रौंच और वीचिरल्ल की चर्बी और वीर्य को मिलाकर पूर्वोक्त ढंग से पैरों तथा जूतों में लेप किया जाय तो बिना थके-अलसाये सौ योजन सफर किया जा सकता है; शेर, बाघ, भेड़िया, कौआ और उल्लू, इन सबकी चर्बी तथा वीर्य, अथवा सभी वर्णों के गिरे हुए गर्भो को मिट्टी के किसी बर्तन में अथवा