कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण
(१) अनिष्टै रद्भुतोत्पातैः परस्योद्वेगमाचरेत् । आराज्यायेति निर्वादः समानः कोप उच्यते ॥
इति औपनिषदिके चतुर्दशेऽधिकरणे प्रलम्भनेऽद्भुतोत्पादनं नाम द्वितीयोऽध्यायः; आदितः षट्चत्वारिंशदधिकशततमः ।
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मरे हुए छोटे बच्चों को श्मशान भूमि में ही अभिषव करके उनके शरीर से निकली हुई चर्बी को पैर, जूते आदि में लेप करके बिना थकावट ही सौ योजन तक जाया जा सकता है ।
( १ ) इस प्रकार विजिगीषु राजा को चाहिए कि इन आश्चर्यजनक अद्भुत तथा अनिष्टकारक उत्पातों से वह अपने शत्रु को अच्छी तरह बेचैन करे । यद्यपि इस प्रकार का व्यापार अनिष्टकारी, और कलंकित कर देने वाला होता है, फिर भी पारस्परिक वैमनस्य बढ़ जाने के कारण, उसको उपयोग में लाना ही पड़ता है । इसलिए यहाँ पर इसका निरूपण किया गया ।
औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में अद्भुतोत्पादन नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।
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