कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पन्द्रहवां अधिकरण
(१) शास्त्रस्य प्रकरणानुपूर्वी विधानम्—‘विद्यासमुद्देशः, वृद्धसंयोगः, इन्द्रियजयः, अमात्योत्पत्तिः' (अधि० १. अध्या० १) इत्येवमादिकमिति ।
(२) वाक्ययोजना योगः—‘चतुर्वर्णाश्रमो लोकः' (अधि० १. अध्या० ४) इति ।
(३) पदावधिकः पदार्थः—‘मूलहरः' इति पदम् । ‘यः पितृपैतामहमर्थ-मन्यायेन भक्षयति स मूलहरः' ( अधि० २. अध्या० ९ ) इत्यर्थः ।
(४) हेतुरर्थसाधको हेत्वर्थः—‘अर्थमूलौ हि धर्मकामौ' ( अधि० १. अध्या० ७ ) इति ।
(५) समासवाक्यमुद्देशः—‘विद्याविनयहेतुरिन्द्रियजयः' ( अधि० १. अध्या० ६ ) इति ।
(६) व्यासवाक्यं निर्देशः—‘कर्णत्वगक्षिजिह्वाघ्राणेन्द्रियाणां शब्दस्पर्श-रूपरसगन्धेष्वविप्रतिपत्तिरिन्द्रियजयः' (अधि० १ अध्या० ६) इति ।
(७) एवं वर्तितव्यमित्युपदेशः—‘धर्मार्थाविरोधेन कामं सेवेत न निः-सुखः स्यात्' (अधि० १, अध्या० ७ ) इति ।
(१) प्रकरण के अनुसार शास्त्र की आनुपूर्वी का कथन करना विधान कहलाता है, जैसे : विद्यासमुद्देश, वृद्धसंयोग, इन्द्रियजय और अमात्योत्पत्ति आदि ।
(२) वाक्य-योजना को योग कहते हैं, जैसे : ‘चतुर्वर्णाश्रमो लोकः’ चारों वर्णाश्रम के लोग ।
(३) केवल पद के अर्थ को पदार्थ कहते हैं, जैसे : ‘मूलहर’ यह एक पद है उसका यह अर्थ कि ‘पैतृक सम्पत्ति को अन्याय से नष्ट कर दे या अपहरण कर ले’ । यह ‘मूलहर’ पद का अर्थ है ।
(४) अर्थ को सिद्ध करने वाला हेतु हेत्वर्थ कहलाता है, जैसे धर्म और काम अर्थ पर ही निर्भर है ।
(५) संक्षिप्त वाक्य का कथन उद्देश कहलाता है, जैसे विद्या और विनय इन्द्रियजय पर निर्भर है ।
(६) विस्तृत वाक्य का कथन करना निर्देश कहलाता है, जैसे : नाक, त्वचा, आँख, जीभ, कान को शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध आदि की ओर से बचाना ही इन्द्रियजय है ।
(७) ‘इस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए’ ऐसा कहना उपदेश कहलाता है, जैसे : धर्म और अर्थ के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, इसके प्रतिकूल चलने वाला सुखी नहीं रहता है ।