भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० १८० : अ० १ ] अर्थशास्त्र की युक्तियाँ ७६७

(१) एवमसावाहैत्यपदेशः—'मन्त्रिपरिषदं द्वादशामात्यान् कुर्वीतेति मानवाः, षोडशेति बार्हस्पत्याः, विंशतिमित्यौशनसाः, यथासामर्थ्यमिति कौटिल्यः' (अधि० १. अध्या० १५) ।

(२) उक्तेन साधनमतिदेशः—'दत्तस्याप्रदानमृणादानेन व्याख्यातम्' (अधि० ३. अध्या० १६) इति ।

(३) वक्तव्येन साधनं प्रदेशः—'सामदानभेददण्डैर्वा यथापत्सु व्याख्यास्यामः' (अधि० ७. अध्या० १४) इति ।

(४) दृष्टेनादृष्टस्य साधनमुपमानम्—'निवृत्तपरिहारान् पितेवानुगृह्णीयात्' (अधि० २. अध्या० १) इति ।

(५) यदनुक्तमर्थादापद्यते सार्थापत्तिः—'लोकयात्राविद् राजानमात्मद्रव्यप्रकृतिसम्पन्नं प्रियहितद्वारेणाश्रयेत' (अधि० ५. अध्या० ४) नाप्रियहितद्वारेणाश्रयेतेत्यर्थादापन्नं भवतीति ।


( १ ) 'अमुक व्यक्ति ने इस विषय में ऐसा कहा है' इस प्रकार दूसरे के मत को प्रकट करना अपदेश कहलाता है; जैसे : मनु के अनुयायी विद्वानों का कहना है कि मंत्रि-परिषद् में बारह अमात्य होने चाहिए । बृहस्पति के अनुयायियों के मत से उनकी संख्या सोलह, उशना के अनुयायियों के मत से बीस और कौटिल्य के मत से सामर्थ्य के अनुसार अमात्यों की संख्या होनी चाहिए ।

( २ ) कही हुई बात से, न कही हुई बात को सिद्ध कर देना अतिदेश कहलाता है जैसे; दी गई वस्तुओं को न लौटाने पर ऋणदान-विषयक नियमों को समझ लेना चाहिए ।

( ३ ) आगे कही जाने वाली बात से न कही गई बात को सिद्ध कर देना प्रदेश कहलाता है; जैसे : साम, दान, भेद और दण्ड के द्वारा वैसा ही करना चाहिए, जैसे आपत्प्रकरण अध्याय में आगे कहा जायेगा ।

( ४ ) देखी हुई वस्तु से न देखी हुई वस्तु को सिद्ध करना उपमान कहलाता है; जैसे : यदि पुरवासी उस परिहार द्रव्य को चुकता कर दें तो राजा को पिता के समान उन पर अनुग्रह करना चाहिए ।

( ५ ) न कही हुई जो बात अर्थ से ही प्राप्त हो जाय उसे अर्थापत्ति कहते हैं, जैसे लोक व्यवहार में पटु व्यक्तियों को चाहिए कि वे आत्मद्रव्य-प्रकृतिसंपन्न राजा का आश्रय उसके प्रिय और हितैषी लोगों के द्वारा प्राप्त करने की चेष्टा करें । अर्थात् 'अप्रिय और अहितकर लोगों के द्वारा आश्रय न लें', यह आशय उक्त सूत्र में अर्थापत्ति के द्वारा ही जाना जा सकता है ।