भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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७६८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पन्द्रहवाँ अधिकरण

(१) उभयतो हेतुमानर्थः संशयः–‘क्षीणलुब्धप्रकृतिमपचरितप्रकृतिं वा’ (अधि० ७. अध्या० ५) इति । (२) प्रकरणान्तरेण समानोऽर्थः प्रसङ्गः–‘कृषिकर्मप्रदिष्टायां भूमाविति समानं पूर्वेण’ ( अधि १. अध्या० ११ ) इति । (३) प्रतिलोमेन साधनं विपर्ययः–‘विपरीतमतुष्टस्य’ ( अधि० १. अ० १६ ) इति । (४) येन वाक्यं समाप्यते, स वाक्यशेषः–‘छिन्नपक्षस्येव राज्ञश्चेष्टानाशश्चेति’ ( अधि० ८. अध्या० १) । तत्र शकुनेरिति वाक्यशेषः । (५) परवाक्यमप्रतिषिद्धमनुमतम्–‘पक्षावुरस्यं प्रतिग्रह इत्यौशनसो व्यूहविभागः’ (अधि० १०. अध्या० ६) इति । (६) अतिशयवर्णना व्याख्यानम्–‘विशेषतश्च सङ्घानां सङ्घधर्मिणां च राजकुलानां द्यूतनिमित्तो भेदः तन्निमित्तो विनाश इत्यसत्प्रग्रहः पापिष्ठतमो व्यसनानां तन्त्रदौर्बल्यात्’ (अधि० ८. अध्या० ३) इति । (७) गुणतः शब्दनिष्पत्तिर्निर्वचनम्–‘व्यस्यत्येनं श्रेयस इति व्यसनम्’ (अधि० ८. अध्या० १) इति ।


( १ ) एक ही बात जब दोनों विरोधी पक्षों की ओर से समान लगे तो उसे संशय कहते हैं; जैसे : क्षीण-क्षुब्ध-प्रकृति और अपचरित प्रकृति, इन दोनों राजाओं में से पहिले किस राजा पर आक्रमण करना चाहिए ?

( २ ) दूसरे प्रकरण के साथ अर्थ की समानता होना प्रसंग कहलाता है, जैसे : खेती के लिए निर्दिष्ट भूमि के संबंध में पूर्ववत् नियम समझना चाहिए ।

( ३ ) विपरीत बातों से किसी वस्तु का निर्देश करना विपर्यय कहलाता है, जैसे : इससे विपरीत भाव होने पर उसको अपने से प्रसन्न समझे ।

( ४ ) जिससे वाक्य की समाप्ति हो उसे वाक्यशेष कहते हैं; जैसे : पंख-कटे पक्षी की तरह राजा की समस्त चेष्टायें नष्ट हो जाती हैं । यहाँ पर ‘पक्षी’ ( शकुनि ) पद वाक्यशेष है ।

( ५ ) प्रतिषेध न किया हुआ दूसरे का वाक्य अनुमत कहलाता है, जैसे : पक्ष, उरस्य और प्रतिग्रह इस प्रकार का व्यूह-विभाग उशना आचार्य ने किया है ।

( ६ ) सिद्ध अर्थ का अनेक युक्तियों के द्वारा समर्थन करना व्याख्यान कहलाता है, जैसे : और विशेषतः एकमत होकर एक साथ रहने वाले राजकुलों का द्यूत के कारण मतभेद हो जाने से दोनों का नाश हो जाता है । दुर्जन लोगों का साथ या सत्कार तथा मद्यपान अन्य सभी व्यसनों से बड़ा व्यसन है; क्योंकि उससे राजा का सारा शासनतन्त्र दुर्बल हो जाता है ।

( ७ ) अर्थान्वयपूर्वक किसी शब्द की सिद्धि करना निर्वचन कहलाता है; जैसे :