भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 854

७७० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पन्द्रहवां अधिकरण

(१) पश्चादेवं विहितमित्यनागतावेक्षणम्—‘तुलाप्रतिमानं पौतवाध्यक्षे वक्ष्यामः’ (अधि० २. अध्या० १३) इति ।

(२) पुरस्तादेवं विहितमित्यतिक्रान्तावेक्षणम्—‘अमात्यसम्पदुक्ता पुरस्तात्’ (अधि० ६. अध्या० १) इति ।

(३) एवं नान्यथेति नियोगः—‘तस्माद् धर्ममर्थं चास्योपदिशेन्नाधर्ममनर्थं च’ (अधि० १. अध्या० १७) इति ।

(४) अनेन वानेन वेति विकल्पः—‘दुहितरो वा धर्मिष्ठेषु विवाहेषु जाताः’ (अधि० ३. अध्या० ५) इति ।

(५) अनेन चानेन चेति समुच्चयः—‘स्वसञ्जातः पितृबन्धूनां च दायादः’ (अधि० ३. अध्या० ७) इति ।

(६) अनुक्तकरणमूह्यम्—‘यथावद् दाता प्रतिग्रहीता च नोपहतौ स्यातां, तथानुशयं कुशलाः कल्पयेयुः’ (अधि० ३. अध्या० १६) इति ।

(७) एवं शास्त्रमिदं युक्तमेताभिस्तन्त्रयुक्तिभिः । अवाप्तौ पालने चोक्तं लोकस्यास्य परस्य च ॥


(१) ‘पीछे से इस प्रकार का विधान किया जायेगा’, इस प्रकार कहना अनागतावेक्षण कहलाता है; जैसे तौलने के तरीकों का निरूपण आगे पौतवाध्यक्ष प्रकरण में किया जायेगा ।

(२) ‘इस का निरूपण पहिले किया जा चुका है’ ऐसा कहना अतिक्रांतावेक्षण कहलाता है; जैसे : अमात्यों के गुणों का निरूपण पहिले किया जा चुका है ।

(३) ‘अमुक कार्य इस ढंग से करना चाहिये, अन्यथा नहीं’ ऐसा कहना नियोग कहलाता है; जैसे : इसलिये सरल बुद्धि बालकों को सदा धर्म और अर्थ का ही उपदेश करना चाहिए; अधर्म और अनर्थ का कदापि नहीं ।

(४) ‘अमुक कार्य इस तरह से किया जाना चाहिए अथवा इस तरह से ?,’ ऐसा कहना विकल्प कहलाता है; जैसे : उस सम्पत्ति के अधिकारी उसके पुत्र हों अथवा वे लड़कियाँ, जो धार्मिक विवाहों से पैदा हुई हैं ?

(५) ‘अमुक कार्य इस तरह भी हो सकता है, और इस तरह भी’ ऐसा कहना समुच्चय कहलाता है; जैसे : पिता या उसके बान्धवों से उत्पन्न किया हुआ बालक उन दोनों की सम्पत्ति का दायभागी होता है ।

(६) न कही हुई बात को कर लेना ऊह्य कहलाता है; जैसे : निपुण धर्मस्थ व्यक्तियों को उचित है कि वे अनुरूप ( दान ) का इस प्रकार निर्णय करें, जिससे देने और लेने वाले, दोनों को कोई हानि न पहुँचे ।

(७) इस प्रकार इस शास्त्र में बत्तीस तन्त्र-युक्तियों का निरूपण किया गया