भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० १८० : अ० १ ] अर्थशास्त्र की युक्तियाँ ७७१

(१) धर्ममर्थं च कामं च प्रवर्तयति पाति च ।
अधर्मानर्थ विद्वेषानिदं शास्त्रं निहन्ति च ॥
(२) येन शास्त्रं च शस्त्रं च नन्दराजगता च भूः ।
अमर्षेणोद्धृतान्याशु तेन शास्त्रमिदं कृतम् ॥
(३) दृष्ट्वा विप्रतिपत्तिं बहुधा शास्त्रेषु भाष्यकाराणाम् ।
स्वयमेव विष्णुगुप्तश्चकार सूत्रं च भाष्यं च ॥

इति कौटिलीये अर्थशास्त्रे तन्त्रयुक्तौ पञ्चदशाधिकरणे तन्त्रयुक्तिर्नाम प्रथमोऽध्यायः; आदितश्चतुःशदुत्तरशततमः ।

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एतावता कौटिलीयस्यार्थशास्त्रस्य तन्त्रयुक्तिः पञ्चदशमधिकरणं समाप्तम्

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है। इस लोक और परलोक की प्राप्ति तथा रक्षा करने में यही शास्त्र सहायक बताया गया है ।

( १ ) यही अर्थशास्त्र धर्म, अर्थ तथा काम में प्रवृत्त करता है, उनकी रक्षा करता है और अर्थ के विरोधी अधर्मों को नष्ट करता है ।

( २ ) जिसने शास्त्र, शस्त्र और नन्दराजा के अधीनस्थ भूमि का शीघ्र उद्धार अपने क्रोध किया है, उसी विष्णुगुप्त कौटिल्य ने इस अर्थशास्त्र-विषयक ग्रन्थ की रचना की है ।

( ३ ) प्राचीन अर्थ-शास्त्रों में बहुधा भाष्यकारों के मतभेदों को देखकर स्वयं ही विष्णुगुप्त कौटिल्य ने इस अर्थशास्त्र के सूत्रों और उनके भाष्य का निर्माण किया है ।

तन्त्रयुक्ति नामक पन्द्रहवें अधिकरण में तन्त्रयुक्ति नामक पहला अध्याय समाप्त

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