कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७७८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
द्वयोरपीर्ष्यतोर्द्वैधीभावं कुर्वीत ॥ ६८ ॥
न व्यसनपरस्य कार्यावाप्तिः ॥ ६९ ॥ इन्द्रियवशवर्ती चतुरङ्गवानपि विनश्यति ॥ ७० ॥ नास्ति कार्यं द्यूतप्रवृत्तस्य ॥ ७१ ॥ मृगयापरस्य धर्मार्थौ विनश्यतः ॥ ७२ ॥ अर्थैषणा न व्यसनेषु गण्यते ॥ ७३ ॥ न कामासक्तस्य कार्यानुष्ठानम् ॥ ७४ ॥ अग्निदाहादपि विशिष्टं वाक्पारुष्यम् ॥ ७५ ॥ दण्डपारुष्यात् सर्वजनद्वेष्यो भवति ॥ ७६ ॥ अर्थतोषिणं श्रीः परित्यजति ॥ ७७ ॥
अमित्रो दण्डनीत्यामायत्तः ॥ ७८ ॥ दण्डनीतिमधितिष्ठन् प्रजाः संरक्षति ॥ ७९ ॥ दण्डः सम्पदा योजयति ॥ ८० ॥ दण्डाभावे मन्त्रिवर्गाभावः ॥ ८१ ॥ न दण्डादकार्याणि कुर्वन्ति ॥ ८२ ॥ दण्डनीत्यामायत्तमात्मरक्षणम् ॥ ८३ ॥ आत्मनि रक्षिते सर्वं रक्षितं भवति ॥ ८४ ॥ आत्मायत्तौ वृद्धि-विनाशौ ॥ ८५ ॥ दण्डो हि विज्ञाने प्रणीयते ॥ ८६ ॥ दुर्बलोऽपि राजा नावमन्तव्यः ॥ ८७ ॥ नास्त्यग्नेर्दौर्बल्यम् ॥ ८८ ॥
दण्डे प्रतीयते वृत्तिः ॥ ८९ ॥ वृत्तिमूलमर्थलाभः ॥ ९० ॥ अर्थमूलौ
अपने से वैर रखने वाले दो राजाओं के बीच फूट डाल दे ॥ ६८ ॥
व्यसनों के चंगुल में पड़े हुए राजा की कभी भी कार्यसिद्धि नहीं होती ॥ ६९ ॥ इन्द्रयों के वश में पड़ा हुआ राजा, चतुरंग सेना के होने पर भी, विनष्ट हो जाता है ॥ ७० ॥ जुये में फँसे हुए राजा की कार्यसिद्धि नहीं होती ॥ ७१ ॥ शिकार में व्यसन रखने वाले राजा के धर्म और अर्थ दोनों नष्ट हो जाते हैं ॥ ७२ ॥ अर्थ की अभिलाषा को व्यसन में नहीं गिना जाता ॥ ७३ ॥ कामासक्त राजा का कोई कार्य नहीं बन पाता ॥ ७४ ॥ वाणी की कठोरता अग्निदाह से भी बढ़ कर होती है ॥ ७५ ॥ कठोर दण्ड वाला राजा समस्त प्रजा का शत्रु हो जाता है ॥ ७६ ॥ अर्थतोषी राजा को लक्ष्मी छोड़ देती है ॥ ७७ ॥
शत्रु को वश में करना दण्डनीति पर निर्भर है ॥ ७८ ॥ दण्डनीति का आश्रय लेता हुआ राजा समस्त प्रजा की रक्षा करता है ॥ ७९ ॥ दण्ड से सम्पत्ति बढ़ती है ॥ ८० ॥ दण्डशक्ति के अभाव में मन्त्रिसमूह विच्छिन्न हो जाता है ॥ ८१ ॥ दण्डशक्ति के कारण वे लोग न करने योग्य कार्यों को नहीं करते हैं ॥ ८२ ॥ अपनी सुरक्षा भी दण्डनीति पर निर्भर है ॥ ८३ ॥ अपनी सुरक्षा किये जाने के बाद ही दूसरे की रक्षा की जा सकती है ॥ ८४ ॥ उत्थान और विनाश, दोनों अपने ही हाथों में हैं ॥ ८५ ॥ भली-भांति सोच-विचार करके दण्ड का प्रयोग किया जाना चाहिए ॥ ८६ ॥ किसी राजा को दुर्बल समझ कर उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए ॥ ८७ ॥ अग्नि को कौन दुर्बल कह सकता है ॥ ८८ ॥
दण्ड के आधार पर ही व्यवहार का ज्ञान होता है ॥ ८९ ॥ अर्थ की प्राप्ति