कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्य-प्रणीत सूत्र
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धर्मकामौ ॥ ९१ ॥ अर्थमूलं कार्यम् ॥ ९२ ॥ यदल्पप्रयत्नात् कार्यसिद्धि-र्भवति ॥ ९३ ॥ उपायपूर्वं न दुष्करं स्यात् ॥ ९४ ॥ अनुपायपूर्वं कार्यं कृतमपि नश्यति ॥ ९५ ॥ कार्यार्थिनामुपाय एव सहायः ॥ ९६ ॥ कार्यं पुरुषकारेण लक्ष्यं सम्पद्यते ॥ ९७ ॥ पुरुषकारमनुवर्तते दैवम् ॥ ९८ ॥ दैवं विनाऽतिप्रयत्नं करोति यत् तद् विफलम् ॥ ९९ ॥ असमाहितस्य वृत्तिर्न विद्यते ॥ १०० ॥
पूर्वं निश्चित्य पश्चात् कार्यमारभेत ॥ १०१ ॥ कार्यान्तरे दीर्घसूत्रता न कर्तव्या ॥ १०२ ॥ न चलचित्तस्य कार्यावाप्तिः ॥ १०३ ॥ हस्तगतावमाननात् कार्यव्यतिक्रमो भवति ॥ १०४ ॥ दोषवर्जितानि कार्याणि दुर्ल-भानि ॥ १०५ ॥ दुरनुबन्धं कार्यं नारभेत ॥ १०६ ॥
कालवित् कार्यं साधयेत् ॥ १०७ ॥ कालातिक्रमात् काल एव फलं पिबति ॥ १०८ ॥ क्षणं प्रति कालविक्षेपं न कुर्यात् सर्वकृत्येषु ॥ १०९ ॥ देशफलविभागौ ज्ञात्वा कार्यमारभेत ॥ ११० ॥ दैवहीनं कार्यं सुसाधमपि दुःसाधं भवति ॥ १११ ॥
नीतिज्ञो देशकालौ परीक्षेत ॥ ११२ ॥ परीक्ष्यकारिणि श्रीश्चिरं
व्यवहारमूलक है ॥ ९० ॥ धर्म और काम अर्थमूलक होते हैं ॥ ९१ ॥ कार्य ही अर्थ का मूल है ॥ ९२ ॥ इसी से थोड़ा भी प्रयत्न करने पर कार्य की सिद्धि हो जाती है ॥ ९३ ॥ उपाय से किया जाने वाला कोई भी कार्य कठिन नहीं होता ॥९४॥ जो कार्य उपाय से नहीं किया जाता वह किया कराया भी नष्ट हो जाता है ॥ ९५ ॥ कार्य-सिद्धि चाहने वाले लोगों के लिए उपाय ही परम सहायक है ॥९६॥ पुरुषार्थ से कार्य को लक्ष्य बनाया जा सकता है ॥ ९७ ॥ भाग्य भी पुरुषार्थ का अनुगमन करता है ॥ ९८ ॥ भाग्य के बिना, बड़े प्रयत्न से किया गया कार्य भी विफल हो जाता है ॥ ९९ ॥ असावधान व्यक्ति में व्यवहारकुशलता नहीं होती ॥ १०० ॥
निश्चय करने के बाद ही कार्य को आरम्भ करे ॥ १०१ ॥ एक के बाद दूसरे कार्य को करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए ॥ १०२ ॥ चंचल चित्त वाले व्यक्ति की कार्यसिद्धि नहीं होती ॥ १०३ ॥ हाथ में आयी हुई वस्तु का तिरस्कार कर देने पर काम बिगड़ जाता है ॥१०४॥ विरले ही ऐसे कार्य हैं, जो दोषरहित हों ॥१०५॥ दुःखपूर्ण तथा कष्टसाध्य कार्यों को आरम्भ ही नहीं करना चाहिए ॥ १०६ ॥
समय की गति-विधि जानने वाला व्यक्ति कार्य को सिद्ध करे ॥ १०७ ॥ कार्य की अवधि बीत जाने पर काल ही उस कार्य के फल को पी जाता है ॥ १०८ ॥ अतः किसी भी कार्य में क्षण-भर का विलम्ब न करे ॥ १०६ ॥ देश और फल का विवेचन करके ही कार्य का आरंभ करे ॥ ११० ॥ दैव के विपरीत होने पर सरल कार्य भी कठिन हो जाता है ॥ १११ ॥
नीतिज्ञ व्यक्ति को चाहिये कि वह देश-काल का भलीभांति विचार कर