कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८० कौटिल्य का अर्थशास्त्र
तिष्ठति ॥ ११३ ॥ सर्वाश्च सम्पदः सर्वोपायेन परिग्रहेत् ॥ ११४ ॥ भाग्यवन्तमपरीक्ष्यकारिणं श्रीः परित्यजति ॥ ११५ ॥ ज्ञानानुमानैश्च परीक्षा कर्तव्या ॥ ११६ ॥ यो यस्मिन् कर्मणि कुशलस्तं तस्मिन्नेव योजयेत् ॥ ११७ ॥ दुःसाधमपि सुसाधं करोत्युपायज्ञः ॥ ११८ ॥ अज्ञानिना कृतमपि न बहु मन्तव्यम् ॥ ११९ ॥ यादृच्छिकत्वात् कृमिरपि रूपान्तराणि करोति ॥१२०॥ सिद्धस्यैव कार्यस्य प्रकाशनं कर्तव्यम् ॥ १२१ ॥ ज्ञानवतामपि दैवमानुषदोषात् कार्याणि दुष्यन्ति ॥ १२२ ॥ दैवं शान्तिकर्मणा प्रतिषेद्धव्यम् ॥ १२३ ॥ मानुषीं कार्यविपत्तिं कौशलेन विनिवारयेत् ॥ १२४ ॥ कार्यविपत्तौ दोषान् वर्णयन्ति बालिशाः ॥ १२५ ॥ कार्यार्थिना दाक्षिण्यं न कर्तव्यम् ॥ १२६ ॥ क्षीरार्थी वत्सो मातुरूधः प्रतिहन्ति ॥ १२७ ॥ अप्रयत्नात् कार्यविपत्तिर्भवेत् ॥ १२८ ॥ न दैवप्रमाणानां कार्यसिद्धिः ॥ १२९ ॥ कार्यबाह्यो न पोषयत्याश्रितान् ॥१३०॥ यः कार्यं न पश्यति सोऽन्धः ॥ १३१ ॥ प्रत्यक्षपरोक्षानुमानैः कार्याणि परीक्षेत ॥ १३२ ॥ अपरीक्ष्यकारिणं श्रीः परित्यजति ॥ १३३ ॥ परीक्ष्य
ले ॥ ११२ ॥ विचारशील व्यक्ति के पास लक्ष्मी चिरकाल तक बनी रहती है ॥११३॥ सामदामादि सब उपायों के द्वारा सभी प्रकार की सम्पत्ति का संचय करे ॥ ११४ ॥ भाग्यशाली होने पर भी अविचारशील व्यक्ति को लक्ष्मी छोड़ देती है ॥ ११५ ॥ प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा प्रत्येक वस्तु की परीक्षा करनी चाहिए ॥ ११६ ॥
जो जिस कार्य को करने में निपुण हो उसको उसी कार्य में नियुक्त करना चाहिए ॥ ११७ ॥ उपायों को जानने वाला व्यक्ति कठिन कार्य को भी सहज बना देता है ॥ ११८ ॥ अज्ञानी व्यक्ति के द्वारा किये गये कार्य को अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए ॥११९॥ कभी-कभी एक साधारण कीड़ा भी रूप बदल लेता है ॥१२०॥ जो कार्य संपन्न हो गया हो उसको ही प्रमाणित किया जाना चाहिए ॥ १२१ ॥
विज्ञ पुरुषों के भी कार्य दैवदोष तथा मानुषदोषों से दूषित ( असफल ) हो जाते हैं ॥१२२॥ शांति-कर्मों के अनुष्ठान द्वारा दैव का प्रतीकार करना चाहिए ॥१२३॥ मानुष-विपत्तियों का निवारण अपने कौशल से करना चाहिए ॥ १२४ ॥ किसी कार्य में विपत्ति के आ जाने पर मूर्ख व्यक्ति उसमें दोष दिखाते हैं ॥ १२५ ॥
कार्यसिद्धि के आकांक्षी व्यक्ति को चाहिए कि वह भोला भाला न बना रहे ॥ १२६ ॥ बछड़ा भी दूध के लिए माता के अयनों ( दूध ) पर आघात करता है ॥ १२७ ॥ प्रयत्न न करने पर निश्चित ही कार्यों में विपत्ति आ जाती है ॥ १२८ ॥ दैव को प्रमाण मानने वाले की कभी भी कार्यसिद्धि नहीं होती ॥ १२९ ॥ कार्य से पृथक् रहने वाला व्यक्ति अपने आश्रितों का पोषण नहीं कर सकता ॥ १३० ॥ जो जो अपने कार्यों को नहीं देखता वह अंधा है ॥ १३१ ॥ प्रत्यक्ष, परोक्ष और अनुमान