भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७८१

तार्या विपत्तिः ॥ १३४ ॥ स्वशक्तिं ज्ञात्वा कार्यमारभेत ॥ १३५ ॥ स्वजनं तर्पयित्वा यः शेषभोजी सोऽमृतभोजी ॥ १३६ ॥ सर्वानुष्ठानादायमुखानि वर्धन्ते ॥ १३७ ॥ नास्ति भीरोः कार्यचिन्ता ॥ १३८ ॥ स्वामिनः शीलं ज्ञात्वा कार्यार्थी कार्यं साधयेत् ॥१३९॥ धेनोः शीलज्ञः क्षीरं भुङ्क्ते ॥ १४० ॥ क्षुद्रे गुह्यप्रकाशनमात्मवान् न कुर्यात् ॥ १४१ ॥ आश्रितैरप्यवमन्यते मृदुस्वभावः ॥ १४२ ॥ तीक्ष्णदण्डः सर्वैरुद्वेजनीयो भवति ॥ १४३ ॥ यथार्हदण्डकारी स्यात् ॥ १४४ ॥ अल्पसारं श्रुतवन्तमपि न बहु मन्यते लोकः ॥ १४५ ॥ अतिभारः पुरुषमवसादयति ॥ १४६ ॥ यः संसदि परदोषं शंसति स स्वदोषं प्रख्यापयति ॥ १४७ ॥ आत्मानमेव नाशयत्यनात्मवतां कोपः ॥ १४८ ॥ नास्त्यप्राप्यं सत्यवताम् ॥ १४९ ॥ साहसेन न कार्यसिद्धिर्भवति


प्रमाणों से कार्यों की परीक्षा करनी चाहिए ॥ १३२ ॥ बिना विचारे कार्य करने वाले पुरुष को लक्ष्मी छोड़ देती है ॥ १३३ ॥ भली-भांति विचार करके विपत्ति को दूर करना चाहिए ॥ १३४ ॥ अपनी शक्ति का अन्दाजा लगा कर ही किसी कार्य को आरम्भ करना चाहिए ॥ १३५ ॥ स्वजनों ( पारिवारिक तथा भृत्य ) को भर पेट भोजन कराके जो अवशिष्ट अन्न को खाता है वह अमृत को खाता है ॥ १३६ ॥ सब तरह के कार्यों को करने से आमदनी के रास्ते खुल जाते हैं ॥ १३७ ॥

कामचोर या अनुद्यमी व्यक्ति को अपने कार्यों की कोई चिन्ता नहीं होती ॥ १३८ ॥

कार्यार्थी को चाहिए कि वह अपने स्वामी के स्वभाव को जान कर ही कार्य को सफल बनाये ॥ १३९ ॥ जो व्यक्ति गाय के स्वभाव से परिचित होता है, वही उसके दूध का उपभोग करता है ॥ १४० ॥

विचारवान् व्यक्ति को चाहिए कि वह क्षुद्र विचार के व्यक्तियों पर अपनी गुह्य बातों को प्रकट न करे ॥ १४१ ॥ सरल स्वभाव के राजा का उसके आश्रित व्यक्ति ही तिरस्कार कर देते हैं ॥ १४२ ॥ तीव्र स्वभाव के राजा से सभी व्यक्ति बेचैन रहते हैं ॥ १४३ ॥ अतः राजा ऐसा होना चाहिए, जो उचित दण्ड का निर्धारण करे ॥ १४४ ॥ शास्त्रज्ञ, किन्तु दुर्बल राजा का प्रजा अधिक सम्मान नहीं करती ॥ १४५ ॥ अधिक भार पुरुष को खिन्न कर देता है ॥ १४६ ॥

जो व्यक्ति सभास्थल पर किसी दूसरे व्यक्ति के अवगुणों का प्रख्यापन करने की चेष्टा करता है वह प्रकारान्तर से अपनी ही अयोग्यता का परिचय देता है ॥ १४७ ॥ स्वयं को वश में न रखने वाले क्रोधी पुरुष को उसका क्रोध ही नष्ट कर डालता है ॥ १४८ ॥

सत्य का आचरण करने वाले व्यक्ति के लिए दुर्लभ कुछ नहीं है ॥ १४९ ॥