कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
॥ १५० ॥ व्यसनार्तो विस्मरत्यप्रवेशेन ॥ १५१ ॥ नास्त्यनन्तरायः काल- विक्षेपे ॥ १५२ ॥ असंशयविनाशात् संशयविनाशः श्रेयान् ॥ १५३ ॥ परधनानि निक्षेप्तुः केवलं स्वार्थम् ॥ १५४ ॥ दानं धर्मः ॥ १५५ ॥ नार्यागतोऽर्थवद् विपरीतोऽनर्थभावः ॥ १५६ ॥ यो धर्मार्थौ न विवर्धयति स कामः ॥१५७॥ तद्विपरीतोऽनर्थसेवी ॥१५८॥ ऋजुस्वभावपरो जनेषु दुर्लभः ॥ १५९ ॥ अवमानेनागतमैश्वर्यमव- मन्यते साधुः ॥ १६० ॥ बहूनपि गुणानैको दोषो ग्रसति ॥ १६१ ॥ महा- त्मना परेण साहसं न कर्तव्यम् ॥ १६२ ॥ कदाचिदपि चरित्रं न लङ्घयेत् ॥ १६३ ॥ क्षुधार्तो न तृणं चरति सिंहः ॥ १६४ ॥ प्राणादपि प्रत्ययो रक्षितव्यः ॥ १६५ ॥ पिशुनः श्रोता पुत्रदारैरपि त्यज्यते ॥ १६६ ॥ बालादप्यर्थजातं शृणुयात् ॥१६७॥ सत्यमप्यश्रद्धेयं न वदेत् ॥१६८॥ नाल्पदोषाद् बहुगुणास्त्यज्यन्ते ॥ १६९ ॥ विपश्चित्स्वपि सुलभा दोषाः ॥ १७० ॥ नास्ति रत्नमखण्डितम् ॥ १७१ ॥ मर्यादातीतं न कदाचिदपि
केवल साहस से कार्य सिद्ध नहीं होते ॥ १५०॥ विपत्तियों के टल जाने पर विपद्ग्रस्त पुरुष विपत्तियों को भूल जाता है ॥ १५१ ॥ अवसर चूक जाने पर कार्यों में अवश्य ही बाधा उपस्थित हो जाती है ॥ १५२ ॥ अवश्यंभावी (असंशय) विनाश की अपेक्षा संदिग्ध (संशययुक्त) विनाश अच्छा है ॥ १५३ ॥
किसी स्वार्थवश ही दूसरे के धन को अमानत पर रखा जाता है ॥ १५४ ॥
दान करना धर्म है ॥ १५५ ॥ वैश्य वृत्ति से किया हुआ यह धर्म (दान देना) सफल नहीं होता। मनुष्य के लिए दान धर्म का न करना सर्वथा अनर्थकारी है ॥ १५६ ॥ जो, धर्म और अर्थ का अपकर्ष नहीं करता उसी को 'काम' कहा जाता है ॥ १५७ ॥ धर्म और अर्थ के अपकर्षक काम के आसेवन से निश्चित ही अनर्थ होता है ॥ १५८ ॥
मनुष्यों में ऐसा पुरुष दुर्लभ होता है, जो सर्वथा सरल स्वभाव का हो ॥१५९॥ तिरस्कार से उपलब्ध ऐश्वर्य को, सत्पुरुष, ठुकरा देते हैं ॥ १६० ॥ अनेक गुणों को एक ही दोष ग्रसित कर लेता है ॥ १६१ ॥ श्रेष्ठ धर्मात्मा शत्रु के साथ युद्ध नहीं करना चाहिए ॥ १६२ ॥ सदाचार का उल्लंघन न करना चाहिए ॥ १६३ ॥ यद्यपि सिंह भूखा हो तब भी तिनके नहीं खाता ॥ १६४ ॥ प्राणों की बलि देकर भी अपने विश्वास की रक्षा करनी चाहिए ॥ १६५ ॥ चुगली करने और सुनने वाले पुरुष को उसके स्त्री-पुत्र भी छोड़ देते हैं ॥ १६६ ॥
बालक की भी उचित बात को ग्रहण करना चाहिए ॥ १६७ ॥ ऐसी सच्चाई नहीं बरतनी चाहिए, जिसका विश्वास ही न किया जा सके ॥ १६८ ॥ थोड़े से दोष से बहुत सारे गुणों को नहीं छोड़ा जा सकता ॥ १६९ ॥ विद्वान् पुरुषों में भी दोष का हो जाना संभव है ॥ १७० ॥ (उसी प्रकार जैसे) कोई भी रत्न समूचा नहीं