भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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चाणक्य-प्रणीत सूत्र

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विश्वसेत् ॥ १७२ ॥ अप्रिये कृतं प्रियमपि द्वेष्यं भवति ॥ १७३ ॥ नमन्त्यपि तुलाकोटिः कूपोदकक्षयं करोति ॥ १७४ ॥ सतां मतं नातिक्रमेत् ॥ १७५ ॥ गुणवदाश्रयान्निर्गुणोऽपि गुणी भवति ॥ १७६॥ क्षीराश्रितं जलं क्षीरमेव भवति ॥ १७७॥ मृत्पिण्डोऽपि पाटलिगन्धमुत्पादयति ॥ १७८ ॥ रजतं कनकस्सङ्गात् कनकं भवति ॥ १७९ ॥ उपकर्तर्यपकर्तुमिच्छत्यबुधः ॥ १८० ॥ न पापकर्मणामाक्रोशभयम् ॥ १८१ ॥ उत्साहवतां शत्रवोऽपि वशीभवन्ति ॥ १८२ ॥ विक्रमधना राजानः ॥ १८३ ॥ नास्त्यलसस्यैहिकामुष्मिकम् ॥ १८४ ॥ निरुत्साहाद् दैवं पतति ॥ १८५ ॥ मत्स्यार्थीव जलमुपयुज्यार्थं गृह्णीयात् ॥ १८६ ॥ अविश्वस्तेषु विश्वासो न कर्तव्यः ॥ १८७ ॥ विषं विषमेव सर्वकालम् ॥ १८८ ॥ अर्थसमादाने वैरिणां सङ्ग एव न कर्तव्यः ॥ १८९ ॥ अर्थसिद्धौ वैरिणं न विश्वसेत् ॥ १९० ॥ अर्थाधीन एव नियतसम्बन्धः ॥ १९१ ॥ शत्रोरपि सुतः सखा रक्षितव्यः ॥ १९२ ॥

होता ॥ १७१ ॥ मर्यादा से अधिक विश्वास कभी न करना चाहिए ॥ १७२ ॥ शत्रु संबंध में किया गया अच्छा कार्य, बुरा ही समझा जाता है ॥ १७३ ॥ झुकती हुई भी ढींकली की वल्ली कुएँ के जल को उलीच देती है ॥ १७४ ॥

श्रेष्ठ पुरुषों के अभिमत का अतिक्रमण न करना चाहिए ॥ १७५ ॥ गुणी पुरुष के आश्रय से गुणहीन भी गुणी हो जाता है ॥ १७६ ॥ दूध में मिला हुआ जल भी दूध ही हो जाता है ॥ १७७ ॥ मिट्टी का ढेला पाटलि पुष्प के संसर्ग से उसकी गंध को उत्पन्न करता है ॥ १७८ ॥ चांदी भी, सोने के साथ मिलकर सोना ही हो जाती है ॥ १७९ ॥

मूर्ख व्यक्ति उपकारक व्यक्ति का भी अपकार करना चाहता है ॥ १८० ॥ पापकर्म करने वाले को निन्दा-भय नहीं होता ॥ १८१ ॥ उत्साही पुरुषों के शत्रु भी वश में हो जाते हैं ॥ १८२ ॥ राजाओं का मुख्य धन है विक्रम (बल) ॥ १८३ ॥ आलसी व्यक्ति को न ऐहिक सुख प्राप्त होता है और न पारलौकिक ॥ १८४ ॥ उत्साहहीन होने पर भाग्य भी साथ नहीं देता ॥ १८५ ॥ उपयोग में आने योग्य अर्थ को उसी प्रकार ग्रहण करना चाहिए, जैसे मछियारा मछली को ॥१८६॥ अविश्वस्त पुरुष पर कभी विश्वास न करना चाहिए ॥ १८७ ॥ विष तो प्रत्येक अवस्था में विष ही रहता है ॥ १८८ ॥

अर्थ-संग्रह करते समय शत्रु को कदापि भी साथ न रखना चाहिए ॥ १८९ ॥ अर्थसिद्ध हो जाने पर भी शत्रु का विश्वास न करना चाहिए ॥ १९० ॥ नियत सम्बन्ध अर्थ के ही अधीन होता है ॥ १९१ ॥ यदि शत्रु का भी पुत्र अपना मित्र हो तो उसकी रक्षा करनी चाहिए ॥ १९२ ॥