भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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७८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र

यावच्छत्रोश्छिद्रं पश्यति तावद्धस्तेन वा स्कन्धेन वा बाह्यः ॥ १९३ ॥
शत्रुं छिद्रे प्रहरेत् ॥ १९४ ॥ आत्मच्छिद्रं न प्रकाशयेत् ॥ १९५ ॥
छिद्रप्रहारिणः शत्रवः ॥ १९६ ॥ हस्तगतमपि शत्रुं न विश्वसेत् ॥१९७॥
स्वजनस्य दुर्वृत्तं निवारयेत् ॥ १९८ ॥ स्वजनावमानोऽपि मनस्विनां दुःख-
मावहति ॥ १९९ ॥ एकाङ्गदोषः पुरुषमवसादयति ॥ २०० ॥
शत्रुं जयति सुवृत्तता ॥ २०१ ॥ निकृतिप्रिया नीचाः ॥ २०२ ॥
नीचस्य मतिर्न दातव्या ॥ २०३ ॥ तेषु विश्वासो न कर्तव्यः ॥ २०४ ॥
सुपूजितोऽपि दुर्जनः पीडयत्येव ॥ २०५ ॥ चन्दनादीनपि दावोऽग्निर्दह-
त्येव ॥ २०६ ॥
कदाऽपि पुरुषं नावमन्येत ॥ २०७ ॥ क्षन्तव्यमिति पुरुषं न बाधेत ॥ २०८ ॥
भर्त्राधिकं रहस्युक्तं वक्तुमिच्छन्त्यबुद्धयः ॥ २०९ ॥ अनुरागस्तु फलेन सूच्यते ॥ २१० ॥ आज्ञाफलमैश्वर्यम् ॥ २११ ॥ दातव्यमपि बालिशः परिक्लेशेन दास्यति ॥ २१२ ॥ महदैश्वर्यं प्राप्याप्यधृतिमान् विनश्यति ॥ २१३ ॥ नास्त्यधृतेरैहिकामुष्मिकम् ॥ २१४ ॥


जब तक शत्रु के दोष या निर्बलता (छिद्र) का पता नहीं लग जाता तब तक उसको हाथ-कंधों पर रखना चाहिए ॥ १९३ ॥

जहाँ भी शत्रु की दुर्बलता दिखायी दे वहीं उस पर प्रहार करना चाहिये ॥ १९४ ॥ अपने दोष या अपनी दुर्बलता को कभी भी प्रकट नहीं करना चाहिए ॥ ॥१९५॥ जो दोष या दुर्बलता पर प्रहार करते हैं उन्हें शत्रु समझना चाहिए ॥१९६॥ अपनी मुट्ठी में भी आये हुए शत्रु का विश्वास न करना चाहिए ॥ १९७ ॥ स्वजनों के दुर्व्यवहार को रोकना चाहिए ॥१९८॥ स्वजनों का अपमान भी श्रेष्ठ पुरुषों के लिए दुःखदायी होता है ॥ १९९ ॥ एक साधारण दोष भी पुरुष को नष्ट कर देता है ॥ २०० ॥

सद्व्यवहार से शत्रु को भी जीता जा सकता है ॥ २०१ ॥ नीच पुरुषों को अपमानित होना ही भला लगता है ॥ २०२ ॥ नीच पुरुष को कभी भी सुमति न देनी चाहिए ॥ २०३ ॥ उन पर विश्वास भी न करना चाहिए ॥ २०४ ॥ सत्कार किये जाने पर भी दुर्जन पीड़ा ही पहुँचाता है ॥ २०५ ॥ जंगल में लगी आग चन्दन आदि को भी जला ही लेती है ॥ २०६ ॥

किसी भी पुरुष का कभी भी तिरस्कार न करना चाहिए ॥ २०७ ॥ किसी भी पुरुष को कभी भी बाधित न करके क्षमा कर देना चाहिए ॥ २०८ ॥

एकान्त में कही गयी अपने मालिक की बात को, मूर्ख व्यक्ति, बढ़ा-चढ़ा कर कहता है ॥ २०९ ॥ प्रेम का परिचय उसके फल से सूचित होता है ॥ २१० ॥ बुद्धि का ही फल ऐश्वर्य है ॥ २११ ॥ देने योग्य वस्तु को भी मूर्ख पुरुष बड़े कष्ट से दे