भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७४५

न दुर्जनैः सह संसर्गः कर्तव्यः ॥ २१५ ॥ शौण्डहस्तगतं पयोऽप्यवमन्येत ॥ २१६ ॥ कार्यसंकटेष्वर्थव्यवसायिनी बुद्धिः ॥ २१७ ॥ मितभोजनं स्वास्थ्यम् ॥ २१८ ॥ पथ्यमपथ्यं वाऽजीर्णे नाश्नीयात् ॥ २१९ ॥ जीर्णभोजिनं व्याधिर्नोपसर्पति ॥ २२० ॥ जीर्णशरीरे वर्धमानं व्याधि नोपेक्षेत ॥ २२१ ॥ अजीर्णे भोजनं दुःखम् ॥ २२२ ॥ शत्रोरपि विशिष्यते व्याधिः ॥ २२३ ॥ दानं निधानमनुगामि ॥ २२४ ॥ पटुतरे तृष्णापरे सुलभमतिसन्धानम् ॥ २२५ ॥ तृष्णया मतिश्छाद्यते ॥ २२६ ॥ कार्यबहुत्वे बहुफलमायतिकं कुर्यात् ॥ २२७ ॥ स्वयमेवावस्कन्नं कार्यं निरीक्षेत ॥ २२८ ॥ मूर्खेषु साहसं नियतम् ॥ २२९ ॥ मूर्खेषु विवादो न कर्तव्यः ॥२३०॥ मूर्खेषु मूर्खवत्कथयेत् ॥ २३१ ॥ आयसैरायसं छेद्यम् ॥ २३२ ॥ नास्त्यधीमतः सखा ॥ २३३ ॥


पाता है ॥ २१२ ॥ धैर्यहीन व्यक्ति महान् ऐश्वर्य को प्राप्त करने पर भी नष्ट हो जाता है ॥ २१३ ॥ धैर्यहीन पुरुष को न तो ऐहिक सुख प्राप्त होता है और न पारलौकिक ॥ २१४ ॥

दुर्जन की संगति न करनी चाहिए ॥ २१५ ॥ कलाल के हाथ में यदि दूध भी हो तो उसकी कद्र नहीं होती ॥ २१६ ॥ कार्यों में संकट उपस्थित हो जाने पर जो बुद्धि अर्थ का निश्चय करती है, वही वास्तविक बुद्धि है ॥ २१७ ॥

परिमित भोजन करना ही स्वास्थ्य का लक्षण है ॥ २१८ ॥ अजीर्ण (बदहजमी) होने पर पथ्य या अपथ्य कुछ भी न खाना चाहिए ॥ २१९ ॥ एक बार का भोजन पच जाने के बाद जो भोजन करता है उसको कोई भी व्याधि नहीं लगती ॥ २२० ॥ वृद्ध शरीर में बढ़ती हुई व्याधि की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए ॥ २२१ ॥ अजीर्णावस्था में भोजन करना दुःखदायी होता है ॥ २२२ ॥ व्याधि शत्रु से भी बढ़कर कष्टकर होती है ॥ २२३ ॥

जैसा कोष हो वैसा ही दान दिया जाना चाहिए ॥ २२४ ॥ अति तृष्णा वाले व्यक्ति को वश में कर लेना आसान होता है ॥ २२५ ॥ तृष्णा, बुद्धि को ढक लेती है ॥ २२६ ॥ अनेक कार्यों के उपस्थित हो जाने पर उसी कार्य को पहले करना चाहिए, जो भविष्य में अधिक फल देने वाला है ॥ २२७ ॥ आक्रमण आदि के कार्य का राजा को स्वयमेव निरीक्षण करना चाहिए ॥ २२८ ॥

मूर्खों में लड़ाई-झगड़ा करने का माद्दा ( साहस ) अवश्य होता है ॥ २२९ ॥ मूर्खों से विवाद न करना चाहिए ॥ २३० ॥ मूर्खों के साथ मूर्ख की तरह कहना चाहिए ॥ २३१ ॥ लोहे को लोहे से ही काटा जा सकता है ॥ २३२ ॥ बुद्धिहीन व्यक्ति का कोई मित्र नहीं होता ॥ २३३ ॥

५० कौ०