भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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७८६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र


धर्मेण धार्यते लोकः ॥ २३४ ॥ प्रेतमपि धर्माधर्मावनुगच्छतः ॥ २३५ ॥ दया धर्मस्य जन्मभूमिः ॥ २३६ ॥ धर्ममूले सत्यदाने ॥ २३७ ॥ धर्मेण जयति लोकान् ॥ २३८ ॥ मृत्युरपि धर्मिष्ठं रक्षति ॥ २३९ ॥ धर्माद्विपरीतं पापं यत्र प्रसज्यते तत्र धर्मावमतिर्महती प्रसज्यते ॥ २४० ॥ उपस्थितविनाशानां प्रकृत्या कारेण कार्येण लक्ष्यते ॥ २४१ ॥ आत्मविनाशं सूचयत्यधर्मबुद्धिः ॥ २४२ ॥ पिशुनवादिनो न रहस्यम् ॥ २४३ ॥ पररहस्यं नैव श्रोतव्यम् ॥ २४४ ॥ वल्लभस्य कारकत्वमधर्मयुक्तम् ॥ २४५ ॥ स्वजनेष्वतिक्रमो न कर्तव्यः ॥ २४६ ॥ माताऽपि दुष्टा त्याज्या ॥ २४७ ॥ स्वहस्तोऽपि विषदिग्धश्छेद्यः ॥ २४८ ॥ परोऽपि च हितो बन्धुः ॥ २४९ ॥ कक्षादप्यौषधं गृह्यते ॥ २५० ॥ नास्ति चौरेषु विश्वासः ॥ २५१ ॥ अप्रतीकारेष्वनादरो न कर्तव्यः ॥ २५२ ॥ व्यसनं मनागपि बाधते ॥ २५३ ॥ अमरवदर्थजातमर्जयेत् ॥ २५४ ॥ अर्थवान् सर्वलोकस्य बहुमतः ॥ २५५ ॥ महेन्द्रमप्यर्थहीनं न बहु मन्यते लोकः ॥ २५६ ॥ दारिद्र्यं खलु पुरुषस्य जीवितं मरणम् ॥ २५७ ॥ विरूपोऽर्थवान् सुरूपः ॥ २५८ ॥ अदातारमप्यर्थवन्तमर्थिनो न त्यजन्ति ॥ २५९ ॥ अकुलीनोऽपि धनी


धर्म ही संसार को धारण किये हुए है ॥ २३४ ॥ धर्म और अधर्म दोनों मृत पुरुष के साथ जाते हैं ॥ २३५ ॥ दया ही धर्म की जन्मभूमि है ॥ २३६ ॥ राज्य और दान धर्ममूलक होते हैं ॥ २३७ ॥ धर्म के द्वारा प्राणियों को जीता जा सकता है ॥ २३८ ॥ मृत्यु भी धर्मात्मा पुरुष की रक्षा करती है ॥ २३९ ॥ जहाँ-जहाँ धर्म के विरुद्ध पाप का प्रसार होता है वहाँ-वहाँ धर्म का बड़ा अपकार होता है ॥ २४० ॥ स्वभाव या कार्य से आसन्न विनाश की परिस्थिति को जाना जाता है ॥ २४१ ॥ अधर्मबुद्धि ही अधर्मात्मा के विनाश की सूचना दे देती है ॥ २४२ ॥ चुगलखोर व्यक्ति की बात छिपी नहीं रहती ॥ २४३ ॥ दूसरे की गुप्त बात को न सुनना चाहिए ॥ २४४ ॥ स्वामी का कठोर होना अधर्मयुक्त है ॥ २४५ ॥

स्वजनों का अतिक्रमण न करना चाहिए ॥ २४६ ॥ माता भी यदि दुष्ट हो तो उसको छोड़ देना चाहिए ॥ २४७ ॥ विष से भरा हुआ यदि अपना हाथ भी हो तो उसे काट देना चाहिए ॥ २४८ ॥ हित करने वाला बाहरी व्यक्ति भी अपना भाई है ॥ २४९ ॥ सूखे जंगल से भी औषधि को प्राप्त किया जा सकता है ॥ २५० ॥ चोरों पर विश्वास नहीं करना चाहिए ॥ २५१ ॥ बाधारहित कर्म के करने में उपेक्षा न करनी चाहिए ॥ २५२ ॥ थोड़ा भी व्यसन बड़ा कष्टकर होता है ॥ २५३ ॥

स्वयं को अमर समझ कर अर्थों का अर्जन करना चाहिए ॥ २५४ ॥ धनवान् व्यक्ति सबका मान्य होता है ॥ २५५ ॥ अर्थहीन इन्द्र को भी संसार बड़ा नहीं समझता ॥ २५६ ॥ पुरुष की दरिद्रता, जीवितावस्था में ही मृत्यु है ॥ २५७ ॥ कुरूप