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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

७८६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र


धर्मेण धार्यते लोकः ॥ २३४ ॥ प्रेतमपि धर्माधर्मावनुगच्छतः ॥ २३५ ॥ दया धर्मस्य जन्मभूमिः ॥ २३६ ॥ धर्ममूले सत्यदाने ॥ २३७ ॥ धर्मेण जयति लोकान् ॥ २३८ ॥ मृत्युरपि धर्मिष्ठं रक्षति ॥ २३९ ॥ धर्माद्विपरीतं पापं यत्र प्रसज्यते तत्र धर्मावमतिर्महती प्रसज्यते ॥ २४० ॥ उपस्थितविनाशानां प्रकृत्या कारेण कार्येण लक्ष्यते ॥ २४१ ॥ आत्मविनाशं सूचयत्यधर्मबुद्धिः ॥ २४२ ॥ पिशुनवादिनो न रहस्यम् ॥ २४३ ॥ पररहस्यं नैव श्रोतव्यम् ॥ २४४ ॥ वल्लभस्य कारकत्वमधर्मयुक्तम् ॥ २४५ ॥ स्वजनेष्वतिक्रमो न कर्तव्यः ॥ २४६ ॥ माताऽपि दुष्टा त्याज्या ॥ २४७ ॥ स्वहस्तोऽपि विषदिग्धश्छेद्यः ॥ २४८ ॥ परोऽपि च हितो बन्धुः ॥ २४९ ॥ कक्षादप्यौषधं गृह्यते ॥ २५० ॥ नास्ति चौरेषु विश्वासः ॥ २५१ ॥ अप्रतीकारेष्वनादरो न कर्तव्यः ॥ २५२ ॥ व्यसनं मनागपि बाधते ॥ २५३ ॥ अमरवदर्थजातमर्जयेत् ॥ २५४ ॥ अर्थवान् सर्वलोकस्य बहुमतः ॥ २५५ ॥ महेन्द्रमप्यर्थहीनं न बहु मन्यते लोकः ॥ २५६ ॥ दारिद्र्यं खलु पुरुषस्य जीवितं मरणम् ॥ २५७ ॥ विरूपोऽर्थवान् सुरूपः ॥ २५८ ॥ अदातारमप्यर्थवन्तमर्थिनो न त्यजन्ति ॥ २५९ ॥ अकुलीनोऽपि धनी


धर्म ही संसार को धारण किये हुए है ॥ २३४ ॥ धर्म और अधर्म दोनों मृत पुरुष के साथ जाते हैं ॥ २३५ ॥ दया ही धर्म की जन्मभूमि है ॥ २३६ ॥ राज्य और दान धर्ममूलक होते हैं ॥ २३७ ॥ धर्म के द्वारा प्राणियों को जीता जा सकता है ॥ २३८ ॥ मृत्यु भी धर्मात्मा पुरुष की रक्षा करती है ॥ २३९ ॥ जहाँ-जहाँ धर्म के विरुद्ध पाप का प्रसार होता है वहाँ-वहाँ धर्म का बड़ा अपकार होता है ॥ २४० ॥ स्वभाव या कार्य से आसन्न विनाश की परिस्थिति को जाना जाता है ॥ २४१ ॥ अधर्मबुद्धि ही अधर्मात्मा के विनाश की सूचना दे देती है ॥ २४२ ॥ चुगलखोर व्यक्ति की बात छिपी नहीं रहती ॥ २४३ ॥ दूसरे की गुप्त बात को न सुनना चाहिए ॥ २४४ ॥ स्वामी का कठोर होना अधर्मयुक्त है ॥ २४५ ॥

स्वजनों का अतिक्रमण न करना चाहिए ॥ २४६ ॥ माता भी यदि दुष्ट हो तो उसको छोड़ देना चाहिए ॥ २४७ ॥ विष से भरा हुआ यदि अपना हाथ भी हो तो उसे काट देना चाहिए ॥ २४८ ॥ हित करने वाला बाहरी व्यक्ति भी अपना भाई है ॥ २४९ ॥ सूखे जंगल से भी औषधि को प्राप्त किया जा सकता है ॥ २५० ॥ चोरों पर विश्वास नहीं करना चाहिए ॥ २५१ ॥ बाधारहित कर्म के करने में उपेक्षा न करनी चाहिए ॥ २५२ ॥ थोड़ा भी व्यसन बड़ा कष्टकर होता है ॥ २५३ ॥

स्वयं को अमर समझ कर अर्थों का अर्जन करना चाहिए ॥ २५४ ॥ धनवान् व्यक्ति सबका मान्य होता है ॥ २५५ ॥ अर्थहीन इन्द्र को भी संसार बड़ा नहीं समझता ॥ २५६ ॥ पुरुष की दरिद्रता, जीवितावस्था में ही मृत्यु है ॥ २५७ ॥ कुरूप

चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७८७

कुलीनाद्विशिष्टः ॥ २६० ॥ नास्त्यवमानभयमनार्यस्य ॥ २६१ ॥ न चेतन- वतां वृत्तिभयम् ॥ २६२ ॥ न जितेन्द्रियाणां विषयभयम् ॥ २६३ ॥ न कृतार्थानां मरणभयम् ॥ २६४ ॥ कस्यचिदर्थं स्वमिव मन्यते साधुः ॥ २६५ ॥ परविभवेष्वादरो न कर्तव्यः ॥ २६६ ॥ परविभवेष्वादरोऽपि नाशमूलम् ॥ २६७ ॥ पलालमपि परद्रव्यं न हर्तव्यम् ॥ २६८ ॥ परद्रव्यापहरणमात्मद्रव्यनाशहेतुः ॥ २६९ ॥ न चौर्यात्परं मृत्युपाशः ॥ २७० ॥ यवागुरपि प्राणधारणं करोति काले ॥ २७१ ॥ न मृतस्यौषधं प्रयोजनम् ॥ २७२ ॥ समकाले स्वयमपि प्रभु- त्वस्य प्रयोजनं भवति ॥ २७३ ॥ नीचस्य विद्याः पापकर्मणि योजयन्ति ॥ २७४ ॥ पयःपानमपि विष- वर्धनं भुजङ्गस्य नामृतं स्यात् ॥ २७५ ॥ न हि धान्यसमो ह्यर्थः ॥ २७६ ॥ न क्षुधासमः शत्रुः ॥ २७७ ॥ अकृतेर्नियता क्षुत् ॥ २७८ ॥ नास्त्यभक्ष्यं क्षुधितस्य ॥ २७९ ॥ इन्द्रियाणि जरावशं कुर्वन्ति ॥ २८० ॥ सानुक्रोशं भर्तारमाजीवेत्


धनवान् भी रूपवान् समझा जाता है ॥ २५८ ॥ न देने वाले धनवान् को भी याचक लोग नहीं छोड़ते ॥ २५९ ॥ निम्नकुल में पैदा हुआ भी धनी पुरुष उच्चकुलोत्पन्न पुरुष से बड़ा समझा जाता है ॥ २६० ॥ नीच पुरुष को अपने तिरस्कार का भय नहीं होता ॥ २६१ ॥ चतुर पुरुष को जीविका का भय नहीं होता ॥ २६२ ॥ जितेन्द्रिय पुरुष को विषयों का भय नहीं होता ॥ २६३ ॥ आत्मदर्शी पुरुष को मृत्यु का भय नहीं होता ॥ २६४ ॥

जो सज्जन पुरुष होता है वह पराये अर्थ को अपने ही अर्थ की भाँति मानता है ॥ २६५ ॥ दूसरे के वैभव की लिप्सा न करनी चाहिए ॥ २६६ ॥ दूसरे के वैभव की लिप्सा करना भी नाश का कारण होता है ॥ २६७ ॥ पलालमात्र भी (थोड़ा भी) दूसरे के द्रव्य का अपहरण न करना चाहिए ॥ २६८ ॥ दूसरे के द्रव्य का अपहरण करना अपने द्रव्य का नाश करना है ॥ २६९ ॥ चोरी से बढ़कर कोई भी दुखदायी बन्धन नहीं है ॥ २७० ॥ उचित समय पर प्राप्त लपसी (यवागू) भी प्राणरक्षक होती है ॥ २७१ ॥ मृतक व्यक्ति का औषधि से कोई प्रयोजन नहीं होता ॥ २७२ ॥ समय आने पर ऐश्वर्य की आवश्यकता होती है ॥ २७३ ॥

नीच पुरुष की विद्यायें उसे पापकर्म में प्रवृत्त करती हैं ॥ २७४ ॥ सर्प को दूध पिलाने पर उसका विष ही बढ़ता है, वह अमृत नहीं बनता ॥ २७५ ॥ अन्न से बढ़कर दूसरा धन नहीं है ॥ २७६ ॥ भूख से बढ़कर दूसरा शत्रु नहीं है ॥ २७७ ॥ अकर्मण्य व्यक्ति को कभी-न-कभी भूख का कष्ट भोगना ही पड़ता है ॥ २७८ ॥ भूखे मनुष्य के लिए कुछ भी अभक्ष्य नहीं है ॥ २७९ ॥

इन्द्रियाँ मनुष्य को वृद्धावस्था में अपने वश में कर लेती हैं ॥ २८० ॥ कृपालु

७८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र

॥ २८१ ॥ लुब्धसेवी पावकेच्छया खद्योतं धमति ॥ २८२ ॥ विशेषज्ञं स्वामिनमाश्रयेत् ॥ २८३ ॥ पुरुषस्य मैथुनं जरा ॥२८४॥ स्त्रीणाममैथुनं जरा ॥२८५॥ न नीचोत्तमयोर्विवाहः ॥ २८६ ॥ अगम्यागमनादायुर्यशःपुण्यानि क्षीयन्ते ॥२८७॥ नास्त्यहंकारसमः शत्रुः ॥ २८८ ॥ संसदि शत्रुं न परिक्रोशेत् ॥२८९॥ शत्रुव्यसनं श्रवणसुखम् ॥ २९० ॥ अधनस्य बुद्धिर्न विद्यते ॥ २९१ ॥ हितमप्यधनस्य वाक्यं न गृह्यते ॥ २९२ ॥ अधनः स्वभार्ययाऽप्यवमन्यते ॥ २९३ ॥ पुष्पहीनं सहकारमपि नोपासते भ्रमराः ॥ २९४ ॥ विद्याधनमधनानाम् ॥ २९५ ॥ विद्या चौरैरपि न ग्राह्या ॥ २९६ ॥ विद्यया ख्यापिता ख्यातिः ॥ २९७ ॥ यशःशरीरं न विनश्यति ॥ २९८ ॥ यः परार्थमुपसर्पति स सत्पुरुषः ॥ २९९ ॥ इन्द्रियाणां प्रशमं शास्त्रम् ॥ ३०० ॥ अशास्त्रकार्यवृत्तौ शास्त्रांकुशं निवारयति ॥ ३०१ ॥ नीचस्य विद्या नोपेतव्या ॥ ३०२ ॥ म्लेच्छभाषणं न शिक्षेत ॥ ३०३ ॥ म्लेच्छानामपि सुवृत्तं ग्राह्यम् ॥३०४॥ गुणे न मत्सरः कर्तव्यः ॥३०५॥ शत्रोरपि सुगुणो ग्राह्यः ॥ ३०६ ॥ विषादप्यमृतं ग्राह्यम् ॥ ३०७ ॥


स्वामी की सेवा करके जीविकोपार्जन करना चाहिए ॥ २८१ ॥ कृपण स्वामी के सेवक की वही दशा होती है जो आग प्राप्त करने के लिए जुगुन्तू को पंखे से झलने वाले की होती है ॥२८२॥ विद्वान् (विशेषज्ञ) स्वामी का आश्रय प्राप्त करना चाहिए ॥२८३॥

अधिक मैथुन से पुरुष शीघ्र ही वृद्ध हो जाता है ॥२८४॥ मैथुन न करने से स्त्री शीघ्र वृद्ध हो जाती है ॥ २८५ ॥ नीच और उच्च व्यक्तियों में परस्पर विवाह-संबंध नहीं हो सकता ॥ २८६ ॥ वेश्या आदि ( अगम्य ) स्त्रियों के साथ सहवास करने से आयु, यश और पुण्य नष्ट हो जाते हैं ॥ २८७ ॥

अहंकार से बढ़कर दूसरा शत्रु नहीं है ॥ २८८ ॥ सभा में शत्रु की निन्दा न करनी चाहिए ॥ २८९ ॥ शत्रु का दुःख सुनकर कानों को आनन्द मिलता है ॥२९०॥ निर्धन पुरुष को बुद्धि नहीं होती ॥ २९१ ॥ धनहीन व्यक्ति की हितकर बात को भी नहीं सुना जाता ॥ २९२ ॥ निर्धन व्यक्ति की स्त्री भी पति का अपमान कर बैठती है ॥ २९३ ॥ पुष्परहित आम के पास भौंरे नहीं जाते ॥ २९४ ॥ निर्धन के लिए विद्या ही एकमात्र धन है ॥ २९५ ॥ विद्याधन को चोर भी नहीं चुरा सकता ॥ २९६ ॥ विद्या के द्वारा ही ख्याति प्राप्त होती है ॥ २९७ ॥ यशरूपी शरीर का कभी नाश नहीं होता ॥ २९८ ॥

जो मनुष्य परोपकार के लिए आगे बढ़ता है, वही सत्पुरुष है ॥ २९९ ॥ शास्त्र-ज्ञान से इन्द्रियां शान्त होती हैं ॥ ३०० ॥ अयुक्त कार्यों में प्रवृत्त व्यक्ति को शास्त्र का अंकुश ही संयम में लगाता है ॥ ३०१ ॥ नीच पुरुष की विद्या की अवहेलना नहीं करनी चाहिए ॥ ३०२ ॥ म्लेच्छ भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ ३०३ ॥

चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७८९

अवस्थया पुरुषः सम्मान्यते ॥३०८॥ स्थान एव नराः पूज्यन्ते ॥३०९॥ आर्यवृत्तमनुतिष्ठेत् ॥ ३१० ॥ कदापि मर्यादां नातिक्रमेत् ॥ ३११ ॥ नास्त्यर्थः पुरुषरत्नस्य ॥ ३१२ ॥ न स्त्रीरत्नसमं रत्नम् ॥ ३१३ ॥ सुदुर्लभं रत्नम् ॥ ३१४ ॥
अयशोभयं भयेषु ॥ ३१५ ॥ नास्त्यलसस्य शास्त्रागमः ॥ ३१६ ॥ न स्त्रैणस्य स्वर्गाप्तिर्धर्मकृत्यं च ॥ ३१७ ॥
स्त्रियोऽपि स्त्रैणमवमन्यते ॥ ३१८ ॥ न पुष्ठार्थी सिंचति शुष्कतरुम् ॥ ३१९ ॥ अद्रव्यप्रयत्नो बालुकाक्वथनादनन्यः ॥ ३२० ॥ न महाजन-हासः कर्तव्यः ॥ ३२१ ॥ कार्यसम्पदं निमित्तानि सूचयन्ति ॥ ३२२ ॥ नक्षत्रादपि निमित्तानि विशेषयन्ति ॥ ३२३ ॥ न त्वरितस्य नक्षत्रपरीक्षा ॥ ३२४ ॥
परिचये दोषा न छाद्यन्ते ॥३२५॥ स्वयमशुद्धः परानाशङ्कते ॥३२६॥ स्वभावो दुरतिक्रमः ॥ ३२७ ॥


म्लेच्छ व्यक्ति की भी अच्छी बात को अपना लेना चाहिए ॥ ३०४ ॥ दूसरे के अच्छे गुणों से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए ॥ ३०५ ॥ शत्रु में भी यदि अच्छे गुण दिखायी दें तो उन्हें ग्रहण कर लेना चाहिए ॥ ३०६ ॥ विष में यदि अमृत हो तो उसे भी ले लेना चाहिए ॥ ३०७ ॥

अवस्था के अनुसार ही पुरुष को सम्मान प्राप्त होता है ॥ ३०८ ॥ अपने स्थान पर बने रहने से ही व्यक्ति को सम्मान मिलता है ॥ ३०९ ॥ मनुष्य को चाहिए कि वह सदा श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण का अनुसरण करे ॥ ३१० ॥ मर्यादा का कभी भी उल्लंघन न करना चाहिए ॥ ३११ ॥ पुरुषरत्न का कोई मूल्य नहीं है ॥ ३१२ ॥ स्त्रीरत्न से बढ़कर दूसरा रत्न नहीं है ॥ ३१३ ॥ रत्न का मिलना बड़ा कठिन होता है ॥ ३१४ ॥

समस्त भयों में अपयश का भय बड़ा है ॥ ३१५ ॥ आलसी पुरुष को कभी शास्त्र की प्राप्ति नहीं होती ॥ ३१६ ॥ स्त्री में आसक्त पुरुष को न तो स्वर्ग मिलता है और न उसके द्वारा कोई धर्मकार्य हो पाता है ॥ ३१७ ॥

स्त्रियाँ भी स्त्रैण पुरुष का अपमान कर देती हैं ॥ ३१८ ॥ फूलों का इच्छुक व्यक्ति सूखे पेड़ को नहीं सींचता ॥ ३१९ ॥ धन के बिना किसी कार्य का उद्योग करना बालू से तेल निकालने के समान है ॥ ३२० ॥ महापुरुषों का उपहास नहीं करना चाहिए ॥ ३२१ ॥ किसी कार्य के लक्षण ही उसकी सिद्धि या असिद्धि की सूचना दे देते हैं ॥ ३२२ ॥ इसी प्रकार नक्षत्रों से भी भावी सिद्धि या असिद्धि की सूचना मिल जाती है ॥ ३२३ ॥ अपने कार्य की सिद्धि शीघ्र चाहने वाला व्यक्ति नक्षत्रगणना पर अपने भाग्य की परीक्षा नहीं करता ॥ ३२४ ॥

परिचय हो जाने पर दोष छिपे नहीं रह सकते ॥ ३२५ ॥ अशुद्ध विचारों का

७९०

कौटिल्य का अर्थशास्त्र

अपराधानुरूपो दण्डः ॥ ३२८ ॥ कथानुरूपं प्रतिवचनम् ॥ ३२९ ॥ विभवानुरूपमाभरणम् ॥३३०॥ कुलानुरूपं वृत्तम् ॥ ३३१ ॥ कार्यानुरूपः प्रयत्नः ॥३३२॥ पात्रानुरूपं दानम् ॥३३३॥ वयोऽनुरूपो वेषः ॥३३४॥ स्वाम्यनुकूलो भृत्यः ॥ ३३५ ॥

भर्तृवशवर्तिनी भार्या ॥ ३३६ ॥ गुरुवशानुवर्ती शिष्यः ॥ ३३७ ॥ पितृवशानुवर्ती पुत्रः ॥ ३३८ ॥ अत्युपचारः शङ्कितव्यः ॥३३९॥ स्वामिन-मेवानुवर्तेत ॥ ३४० ॥

मातृताडितो वत्सो मातरमेवानुरोदिति ॥ ३४१ ॥

स्नेहवतः स्वल्पो हि रोषः ॥ ३४२ ॥ आत्मच्छिद्रं न पश्यति परच्छिद्र-मेव पश्यति बालिशः ॥ ३४३ ॥

सोपचारः कैतवः ॥ ३४४ ॥ काम्यैर्विशेषैरुपचरणमुपचारः ॥३४५॥ चिरपरिचितानामत्युपचारः शङ्कितव्यः ॥ ३४६ ॥ गौर्दुष्कराश्वसहस्रादेका-किनी श्रेयसी ॥ ३४७ ॥ श्वो मयूरादद्य कपोतो वरः ॥ ३४८ ॥


व्यक्ति दूसरों पर भी सन्देह करता है ॥ ३२६ ॥ स्वभाव को बदलना बड़ा कठिन है ॥ ३२७ ॥

अपराध के अनुसार ही दण्ड देना चाहिए ॥ ३२८ ॥ प्रश्न के अनुसार ही उत्तर देना चाहिए ॥३२९॥ संपत्ति के अनुसार ही आभूषण धारण करने चाहिए ॥३३०॥ अपने कुल की मर्यादा के अनुसार ही कार्य करना चाहिए ॥ ३३१ ॥ कार्य के अनुसार ही प्रयत्न करना चाहिए ॥ ३३२ ॥ पात्र के अनुसार ही दान देना चाहिए ॥३३३॥ अवस्था के अनुसार ही वेष धारण करना चाहिए ॥ ३३४ ॥ स्वामी के अनुसार ही सेवक को कार्य करना चाहिए ॥ ३३५ ॥

पति के वश में रहने वाली पत्नी ही भार्या ( भरण-पोषण की अधिकारिणी ) होती है ॥ ३३६ ॥ शिष्य को सदा गुरु के अधीन रहना चाहिए ॥ ३३७ ॥ पुत्र को सदा पिता के अधीन रहना चाहिए ॥ ३३८ ॥ अत्यधिक आदर शंका का कारण होता है ॥ ३३९ ॥ सेवक को सदा स्वामी की आज्ञा का अनुगमन करना चाहिए ॥ ३४० ॥

माता के द्वारा ताड़ित बच्चा, माता के ही आगे रोता है ॥ ३४१ ॥

स्नेही व्यक्ति का कोप क्षणिक होता है ॥ ३४२ ॥ मूर्ख व्यक्ति अपने दोषों को नहीं, दूसरों के ही दोषों को देखता है ॥ ३४३ ॥

उपचार के साथ छल होता है ॥ ३४४ ॥ किसी विशेष अभिलाषा की पूर्ति के लिए की जाने वाली सेवा को 'उपचार' कहते हैं ॥ ३४५ ॥ सुपरिचित व्यक्ति का अतिशय आदर-दर्शन संशयकारी होता है ॥ ३४६ ॥ एक साधारण गाय भी सौ कुत्तों से बढ़कर होती है ॥ ३४७ ॥ कल मिलने वाले मोर की अपेक्षा आज मिलने वाला कबूतर ही अच्छा है ॥ ३४८ ॥

चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७९१

अतिसंगो दोषमुत्पादयति ॥ ३४९ ॥ सर्वं जयत्यक्रोधः ॥ ३५० ॥ यद्यपकारिणि कोपः कोषे कोप एव कर्तव्यः॥ ३५१ ॥ मतिमत्सु मूर्खमित्र-गुरुवल्लभेषु विवादो न कर्तव्यः ॥ ३५२ ॥ नास्त्यपिशाचमैश्वर्यम् ॥ ३५३ ॥ नास्ति धनवतां शुभकर्मसु श्रमः ॥ ३५४ ॥ नास्ति गतिश्रमो यानवताम् ॥ ३५५ ॥ अलौहमयं निगडं कलत्रम् ॥ ३५६ ॥ यो यस्मिन् कुशलः स तस्मिन् योक्तव्यः ॥ ३५७ ॥ दुष्टकलत्रं मनस्विनां शरीरकर्शनम् ॥ ३५८ ॥ अप्रमत्तो दारान्निरोक्षेत ॥ ३५९॥ स्त्रीषु किञ्चिदपि न विश्वसेत् ॥ ३६० ॥ न समाधिः स्त्रीषु लोकज्ञता च ॥ ३६१ ॥ गुरूणां माता गरीयसी ॥ ३६२ ॥ सर्वावस्थासु माता भर्तव्या ॥ ३६३ ॥ वैदुष्यमलंकारेणाच्छाद्यते ॥ ३६४ ॥ स्त्रीणां भूषणं लज्जा ॥ ३६५ ॥ विप्राणां भूषणं वेदः ॥ ३६६ ॥ सर्वेषां भूषणं धर्मः ॥ ३६७ ॥ भूषणानां भूषणं सविनया विद्या ॥ ३६८ ॥ अनुपद्रवं देशमावसेत् ॥ ३६९ ॥ साधुजनबहुलो देशः ॥ ३७० ॥ राज्ञो भेतव्यं सार्वकालम् ॥ ३७१ ॥ न राज्ञः परं दैवतम् ॥ ३७२ ॥ सूदूरमपि

अत्यधिक साथ से बुराई पैदा हो जाती है ॥ ३४९ ॥ क्रोध न करने वाले व्यक्ति की सर्वत्र विजय होती है ॥ ३५० ॥ यदि अपकारी व्यक्ति पर क्रोध करना हो तो पहले क्रोध पर ही क्रोध करना चाहिए ॥ ३५१ ॥ बुद्धिमान् मनुष्य, मूर्ख, मित्र, गुरु और प्रियजनों के साथ व्यर्थ का विवाद न करें ॥ ३५२ ॥

ऐश्वर्य में पैशाचिकता होती है ॥ ३५३ ॥ धनिकों को शुभकार्य करने में श्रम नहीं करना पड़ता ॥ ३५४ ॥ सवारी पर चलने वाले को थकावट का अनुभव नहीं होता ॥ ३५५ ॥ स्त्री बिना लोहे की बेड़ी है ॥ ३५६ ॥

जो मनुष्य जिस कार्य में निपुण हो, उसको उसी काम में नियुक्त करना चाहिए ॥ ३५७ ॥ दुष्ट स्त्री मनस्वी पुरुष के शरीर को कृश बना देती है ॥ ३५८ ॥ अप्रमत्त होकर सदा स्त्री का निरीक्षण करना चाहिए ॥ ३५९ ॥ स्त्रियों पर जरा भी विश्वास न करना चाहिए ॥ ३६० ॥ स्त्रियों में न विवेक होता है और न लोक-व्यवहार का ज्ञान ॥ ३६१ ॥ गुरुजनों में माता का स्थान सर्वोच्च होता है ॥ ३६२ ॥ अतएव प्रत्येक अवस्था में माता का भरण-पोषण करना चाहिए ॥ ३६३ ॥

अलंकार ( बनावटीपन ), पाण्डित्य को ढांप देता है ॥ ३६४ ॥ स्त्री का आभूषण लज्जा है ॥ ३६५ ॥ ब्राह्मणों का आभूषण वेद ( ज्ञान ) है ॥ ३६६ ॥ सब लोगों का आभूषण धर्म है ॥ ३६७ ॥ समस्त आभूषणों का आभूषण विनयसंपन्न विद्या है ॥ ३६८ ॥

जिस देश में उपद्रव न हो, वहाँ बसना चाहिए ॥ ३६९ ॥ जिस देश में सज्जन पुरुषों का निवास हो वहीं बसना चाहिए ॥ ३७० ॥ राजा से सदा डरना चाहिए

७९२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र

दहति राजवह्निः ॥ ३७३ ॥ रिक्तहस्तो न राजानमभिगच्छेत् ॥ ३७४ ॥ गुरुं च दैवं च ॥ ३७५ ॥ कुटुम्बिनो भेतव्यम् ॥ ३७६ ॥ गन्तव्यं च सदा राजकुलम् ॥ ३७७ ॥ राजपुरुषैः सम्बन्धं कुर्यात् ॥ ३७८ ॥ राजदासी न सेवितव्या ॥ ३७९ ॥ न चक्षुषाऽपि राजानं निरीक्षेत् ॥ ३८० ॥

पुत्रे गुणवति कुटुम्बिनः स्वर्गः ॥ ३८१ ॥ पुत्रा विद्यानां पारं गमयितव्याः ॥ ३८२ ॥ जनपदार्थं ग्रामं त्यजेत् ॥ ३८३ ॥ ग्रामार्थं कुटुम्बस्त्यज्यते ॥ ३८४ ॥ अतिलाभः पुत्रलाभः ॥ ३८५ ॥ दुर्गतेः पितरौ रक्षति स पुत्रः ॥३८६॥ कुलं प्रख्यापयति पुत्रः ॥३८७॥ नानपत्यस्य स्वर्गः ॥३८८॥

या प्रसूते सा भार्या ॥३८९॥ तीर्थसमवाये पुत्रवतीमनुगच्छेत् ॥३९०॥ सतीर्थगमनाद् ब्रह्मचर्यं नश्यति ॥ ३९१ ॥ न परक्षेत्रे बीजं विनिक्षिपेत् ॥ ३९२ ॥ पुत्रार्था हि स्त्रियः ॥ ३९३ ॥ स्वदासीपरिग्रहो हि दासभावः ॥ ३९४ ॥

उपस्थितविनाशः पथ्यवाक्यं न शृणोति ॥ ३९५ ॥ नास्ति देहिनां सुखदुःखाभावः ॥ ३९६ ॥ मातरमिव वत्साः सुखदुःखानि कर्तारमेवानुगच्छन्ति ॥ ३९७ ॥


॥ ३७१ ॥ राजा से बड़ा कोई देवता नहीं है ॥ ३७२ ॥ राजवह्नि दूर से ही भस्म कर डालती है ॥ ३७३ ॥ राजा, देवता और गुरु के पास खाली हाथ न जाना चाहिए ॥ ३७४-३७५ ॥ कुटुम्ब के व्यक्ति से सदा डरना चाहिए ॥ ३७६ ॥ राज-दरबार में हमेशा जाना चाहिए ॥ ३७७ ॥ राजपुरुषों से सम्बन्ध बनाये रखना चाहिए ॥ ३७८ ॥ राजदासी से किसी तरह का सम्बन्ध न रखना चाहिए ॥३७९॥ राजा की ओर आँख उठाकर न देखना चाहिए ॥ ३८० ॥

गुणवान् पुत्र से परिवार स्वर्ग बन जाता है ॥ ३८१ ॥ पुत्र को सब विद्याओं में पारंगत बनाना चाहिए ॥ ३८२ ॥ जनपद के हित के आगे ग्रामहित को त्याग देना चाहिए ॥ ३८३ ॥ ग्रामहित के लिए परिवार-हित की उपेक्षा कर देनी चाहिए ॥ ३८४ ॥ पुत्रलाभ सर्वोच्च लाभ है ॥ ३८५ ॥ दुर्गति से माता-पिता की रक्षा करने वाला पुत्र ही होता है ॥३८६॥ सुपुत्र से ही कुल की ख्याति होती है ॥३८७॥ पुत्रहीन व्यक्ति को स्वर्ग नहीं मिलता ॥ ३८८ ॥

सन्तान को जन्म देने वाली स्त्री ही भार्या है ॥ ३८९ ॥ अनेक स्त्रियों के एक साथ ऋतुमती होने पर उस स्त्री के पास जाना चाहिए, जो पहले पुत्रवती हो ॥३९०॥ रजस्वला स्त्री के साथ संभोग करने से ब्रह्मचर्य नष्ट होता है ॥ ३९१ ॥ परस्त्री के गर्भ में वीर्य का निक्षेप नहीं करना चाहिए ॥ ३९२ ॥ पुत्र-प्राप्ति के लिए ही स्त्रियों का वरण किया जाता है ॥ ३९३ ॥ अपनी दासी के साथ परिग्रह करना अपने को दास बना लेना है ॥ ३९४ ॥

जिसका विनाश निकट होता है, वह हित की बात को नहीं सुनता ॥ ३९५ ॥

चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७९३

तिलमात्रमप्युपकारं शैलवन्मन्यते साधुः ॥ ३९८ ॥ उपकारोऽनार्येष्व- कर्तव्यः ॥ ३९९ ॥ प्रत्युपकारभयादनार्यः शत्रुर्भवति ॥ ४०० ॥ स्वल्प- मप्युपकारकृते प्रत्युपकारं कर्तुमार्यो न स्वपिति ॥ ४०१ ॥ न कदाऽपि देवताऽवमन्तव्या ॥ ४०२ ॥

न चक्षुषः समं ज्योतिरस्ति ॥४०३॥ चक्षुर्हि शरीरिणां नेता ॥४०४॥ अपचक्षुषः किं शरीरेण ॥ ४०५ ॥

नाप्सु मूत्रं कुर्यात् ॥ ४०६ ॥ न नग्नो जलं प्रविशेत् ॥ ४०७ ॥ यथा शरीरं तथा ज्ञानम् ॥ ४०८ ॥ यथा बुद्धिस्तथा विभवः ॥ ४०९ ॥ अग्ना- वग्निं न निक्षिपेत् ॥ ४१० ॥ तपस्विनः पूजनीयाः ॥ ४११ ॥ परदारात्न गच्छेत् ॥ ४१२ ॥ अन्नदानं भ्रूणहत्यामपि मार्ष्टि ॥ ४१३ ॥ न वेदबाह्यो धर्मः ॥ ४१४ ॥ कदाचिदपि धर्मं निषेवेत् ॥ ४१५ ॥

स्वर्गं नयति सूनृतम् ॥ ४१६ ॥ नास्ति सत्यात् परं तपः ॥ ४१७ ॥ सत्यं स्वर्गस्य साधनम् ॥ ४१८ ॥ सत्येन धार्यते लोकः ॥ ४१९ ॥ सत्याद् देवो वर्षति ॥ ४२० ॥


प्रत्येक देहधारी व्यक्ति के लिए सुख और दुःख लगे रहते हैं ॥ ३९६ ॥ जैसे बछड़ा माता के पास जा पहुँचता है वैसे ही सुख और दुःख अपने कर्ता के पास जा पहुँचते हैं ॥ ३९७ ॥

सज्जन पुरुष तिलतुल्य उपकार को पहाड़ जैसा मानता है ॥ ३९८ ॥ दुष्ट पुरुष का उपकार न करना चाहिए ॥ ३९९ ॥ क्योंकि प्रत्युपकारभय से दुष्ट पुरुष शत्रु बन जाता है ॥ ४०० ॥ सज्जन पुरुष थोड़े भी उपकार का महान् प्रत्युपकार करने के लिए उद्यत रहता है ॥ ४०१ ॥ देवता का कभी भी अपमान न करना चाहिए ॥ ४०२ ॥

आंख के समान दूसरी ज्योति नहीं है ॥ ४०३ ॥ नेत्र, देहधारियों का नेता है ॥ ४०४ ॥ नेत्रहीन व्यक्ति का शरीर धारण करना व्यर्थ है ॥ ४०५ ॥

जल में मूत्रत्याग नहीं करना चाहिए ॥ ४०६ ॥ नग्न होकर पानी में न उतरना चाहिए ॥ ४०७ ॥ जैसा शरीर होता है, उसमें वैसा ही ज्ञान रहता है ॥ ४०८ ॥ जैसी बुद्धि होती है, वैसा ही वैभव प्राप्त होता है ॥ ४०९ ॥ आग में आग न डालनी चाहिए ( तेजस्वी पर क्रोध न करना चाहिए ) ॥ ४१० ॥ तपस्वियों की सदा पूजा करनी चाहिए ॥ ४११ ॥ पराई स्त्री के साथ समागम न करना चाहिए ॥ ४१२ ॥ अन्नदान से भ्रूण ( गर्भस्थ शिशु ) हत्या का भी पाप मिट जाता है ॥ ४१३ ॥ वेद-स्वीकृत धर्म ही वास्तविक धर्म है ॥ ४१४ ॥ जिस तरह भी हो, धर्म का आचरण करना चाहिए ॥ ४१५ ॥

मीठी और सच्ची वाणी मनुष्य को स्वर्ग ले जाती है ॥ ४१६ ॥ सत्य से बढ़कर कोई तप नहीं है ॥ ४१७ ॥ सत्य ही स्वर्ग का साधन है ॥ ४१८ ॥ सत्य पर ही संसार टिका है ॥ ४१९ ॥ सत्य से ही इन्द्र जल बरसाता है ॥ ४२० ॥

७९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र

नानृतात् पातकं परम् ॥ ४२१ ॥ न मीमांस्या गुरवः ॥४२२॥ खलत्वं नोपेयात् ॥ ४२३ ॥ नास्ति खलस्य मित्रम् ॥ ४२४ ॥ लोकयात्रा दरिद्रं बाधते ॥ ४२५ ॥ अतिशूरो दानशूरः ॥ ४२६ ॥ गुरुदेवब्राह्मणेषु भक्तिर्भूषणम् ॥४२७॥ सर्वस्य भूषणं विनयः ॥ ४२८ ॥ अकुलीनोऽपि विनीतः कुलीनाद् विशिष्टः ॥ ४२९ ॥ आचारादायुर्वर्धते कीर्तिश्च ॥ ४३० ॥ प्रियमप्यहितं न वक्तव्यम् ॥ ४३१ ॥ बहुजनविरुद्धमेकं नानुवर्तेत ॥ ४३२ ॥ न दुर्जनेषु भागधेयः कर्तव्यः ॥ ४३३ ॥ न कृतार्थेषु नीचेषु सम्बन्धः ॥ ४३४ ॥ ऋणशत्रुव्याधिश्वशेषः कर्तव्यः ॥ ४३५ ॥ भृत्यानुवर्तनं पुरुषस्य रसायनम् ॥ ४३६ ॥ नार्थिष्ववज्ञा कार्या ॥ ४३७ ॥ दुष्करं कर्म कारयित्वा कर्तारमवमन्यते नीचः ॥ ४३८ ॥ नाकृतज्ञस्य नरकान्निवर्तनम् ॥ ४३९ ॥ जिह्वायत्तौ वृद्धिविनाशौ ॥ ४४० ॥ विषामृतयोराकरी जिह्वा ॥ ४४१ ॥ प्रियवादिनो न शत्रुः ॥ ४४२ ॥ स्तुता अपि देवतास्तुष्यन्ति ॥ ४४३ ॥ अनृतमपि दुर्वचनं चिरं तिष्ठति ॥ ४४४ ॥ राजद्विष्टं न च वक्तव्यम् ॥ ४४५ ॥ श्रुतिसुखात्कोकिलालापात् तुष्यन्ति ॥ ४४६ ॥


झूठ से बढ़कर कोई पाप नहीं है ॥ ४२१ ॥ गुरूजनों की आलोचना नहीं करनी चाहिए ॥ ४२२ ॥ दुष्टता को अंगीकार न करना चाहिए ॥ ४२३ ॥ दुष्ट मनुष्य का कोई मित्र नहीं होता ॥ ४२४ ॥ दरिद्र मनुष्य को जीवन-निर्वाह करना कठिन होता है ॥ ४२५ ॥

दानवीर ही सबसे बड़ा वीर है ॥ ४२६ ॥ गुरु, देवता और ब्राह्मणों में भक्ति रखना मानवता का आभूषण है ॥ ४२७ ॥ विनय सबका आभूषण है ॥ ४२८ ॥ जो कुलीन न होता हुआ भी विनीत हो वह अविनीत कुलीन की अपेक्षा बड़ा है ॥ ४२९ ॥

सदाचार से आयु और यश दोनों की वृद्धि होती है ॥ ४३० ॥ प्रिय होने पर भी अहितकर वाणी को न बोलना चाहिए ॥ ४३१ ॥ अनेक लोगों के विरोधी एक व्यक्ति का अनुगमन नहीं करना चाहिए ॥ ४३२ ॥ दुर्जन व्यक्तियों के साथ अपना भाग्य नहीं जोड़ना चाहिए ॥ ४३३ ॥ कृतार्थ (सफल) नीच पुरुष से सम्बन्ध न करना चाहिए ॥ ४३४ ॥ ऋण, शत्रु और रोग को सर्वथा समाप्त कर देना चाहिए ॥ ४३५ ॥ कल्याण मार्ग पर चलना ही मनुष्य के लिए उत्तम रसायन है ॥ ४३६ ॥

याचक से घृणा न करनी चाहिए ॥ ४३७ ॥ नीच मनुष्य दुष्कर्म कराके, कर्ता को अपमानित करता है ॥ ४३८ ॥ कृतघ्न मनुष्य के लिए नरक के अतिरिक्त कोई गति नहीं है ॥ ४३९ ॥

अपनी उन्नति और अवनति अपनी वाणी के अधीन है ॥ ४४० ॥ वाणी ही विष तथा अमृत की खान है ॥ ४४१ ॥ प्रिय वचन बोलने वाले का कोई शत्रु नहीं है

चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७९५

स्वधर्महेतुः सत्पुरुषः ॥ ४४७ ॥ नास्त्यर्थिनो गौरवम् ॥ ४४८ ॥ स्त्रीणां भूषणं सौभाग्यम् ॥ ४४९ ॥ शत्रोरपि न पातनीया वृत्तिः ॥४५०॥ अप्रयत्नोदकं क्षेत्रम् ॥ ४५१ ॥ एरण्डमवलम्ब्य कुञ्जरं न कोपयेत् ॥४५२॥ अतिप्रवृद्धा शाल्मली वारणस्तम्भो न भवति ॥ ४५३ ॥ अतिदीर्घोऽपि कर्णिकारो न मुसली ॥ ४५४ ॥ अतिदीप्तोऽपि खद्योतो न पावकः ॥४५५॥ न प्रवृद्धत्वं गुणहेतुः ॥ ४५६ ॥ सुजीर्णोऽपि पिचुमन्दो न शङ्कुलायते ॥ ४५७ ॥ यथा बीजं तथा निष्पत्तिः ॥ ४५८ ॥ यथा श्रुतं तथा बुद्धिः ॥ ४५९ ॥ यथा कुलं तथाऽऽचारः ॥ ४६० ॥ संस्कृतः पिचुमन्दः सहकारो न भवति ॥ ४६१ ॥ न चागतं सुखं त्यजेत् ॥ ४६२ ॥ स्वयमेव दुःखमधिगच्छति ॥ ४६३ ॥ रात्रिचारणं न कुर्यात् ॥ ४६४ ॥ न चार्धरात्रं स्वपेत् ॥ ४६५ ॥ तद्विद्भिङ्गुः परीक्षेत ॥ ४६६ ॥ परगृहमकारणतो न प्रविशेत् ॥ ४६७ ॥ ज्ञात्वाऽपि दोषमेव करोति लोकः ॥ ४६८ ॥


॥ ४४२ ॥ स्तुति से देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ४४३ ॥ असत्य दुर्वचन चिरकाल तक स्मरण होता रहता है ॥ ४४४ ॥ राजा से द्वेष करने वाली बात न बोलनी चाहिए ॥ ४४५ ॥ काली कोयल के भी, कानों को सुख देने वाले वचन सबको भाते हैं (कोयल के समान, कानों को सुख देने वाली वाणी का प्रयोग करना चाहिए) ॥ ४४६ ॥

स्वधर्म पर अवस्थित रहने के कारण पुरुष भी सत्यपुरुष हो जाता है ॥ ४४७ ॥ याचक का कोई गौरव नहीं होता ॥ ४४८ ॥ सुहाग स्त्री का आभूषण है ॥ ४४९ ॥ शत्रु की भी जीविका को नष्ट न करना चाहिए ॥ ४५० ॥ जहाँ बिना प्रयत्न के जल सुलभ हो वही अपना खेत है ॥ ४५१ ॥ एरण्ड वृक्ष के सहारे पर हाथी को कुपित करना उचित नहीं है ॥ ४५२ ॥ बहुत बड़ा होने पर भी सेमल के वृक्ष से हाथी को नहीं बाँधा जा सकता ॥ ४५३ ॥ बहुत बड़ा हुआ भी कनेर का वृक्ष मूसल बनाने के काम में नहीं आता ॥ ४५४ ॥ जुगुनू कितना भी अधिक चमकीला क्यों न हो, आग का काम नहीं दे सकता ॥ ४५५ ॥ बहुत बड़ा समृद्धिशाली हो जाने पर भी कोई गुणवान् नहीं हो पाता ॥ ४५६ ॥

बहुत पुराना होने पर भी नीम के वृक्ष का सरोता नहीं बन सकता ॥ ४५७ ॥ जैसा बीज होता है वैसा ही उससे फल उत्पन्न होता है ॥ ४५८ ॥ योग्यता के ही अनुरूप बुद्धि होती है ॥ ४५९ ॥ जैसा कुल होता है वैसा ही आचार होता है ॥ ४६० ॥ कितना ही संस्कार क्यों न किया जाय, नीम आम नहीं बन सकता ॥ ४६१ ॥ जो सुख प्राप्त हो उसको न छोड़ना चाहिए ॥ ४६२ ॥ कर्मानुसार ही मनुष्य को दुःख मिलता है ॥ ४६३ ॥

रात के समय व्यर्थ न घूमना चाहिए ॥ ४६४ ॥ आधी रात को शयन न करना

७९६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र


शास्त्रप्रधाना लोकवृत्तिः ॥ ४६९ ॥ शास्त्राभावे शिष्टाचारमनुगच्छेत् ॥ ४७० ॥ नाचरिताच्छास्त्रं गरीयः ॥ ४७१ ॥ दूरस्थमपि चारचक्षुः पश्यति राजा ॥ ४७२ ॥ गतानुगतिको लोकः ॥ ४७३ ॥ यमनुजीवेत् तं नापवदेत् ॥ ४७४ ॥ तपःसार इन्द्रियनिग्रहः ॥४७५॥ दुर्लभः स्त्रीबन्धनान्मोक्षः ॥ ४७६ ॥ स्त्री नाम सर्वाशुभानां क्षेत्रम् ॥ ४७७ ॥ न च स्त्रीणां पुरुषपरीक्षा ॥ ४७८ ॥ स्त्रीणां मनः क्षणिकम् ॥४७९॥ अशुभद्वेषिणः स्त्रीषु न प्रसक्ताः ॥ ४८० ॥ यज्ञफलज्ञास्त्रिवेदविदः ॥ ४८१ ॥ स्वर्गस्थानं न शाश्वतं यावत् पुण्यफलम् ॥ ४८२ ॥ न च स्वर्गपतनात् परं दुःखम् ॥ ४८३ ॥ देही देहं त्यक्त्वा ऐन्द्रं पदं न वाञ्छति ॥ ४८४ ॥ दुःखानामौषधं निर्वाणम् ॥४८५॥ अनार्यसम्बन्धाद्वरमार्यशत्रुता ॥४८६॥ निहन्ति दुर्वचनं कुलम् ॥४८७॥ न पुत्रसंस्पर्शात् परं सुखम् ॥ ४८८ ॥


चाहिए ॥ ४६५ ॥ विद्वानों के सामने ब्रह्म की चर्चा करनी चाहिए ॥ ४६६ ॥ अकारण दूसरे के घर में न जाना चाहिए ॥ ४६७ ॥ जान-बूझकर भी लोग अपराध ही करते हैं ॥ ४६८ ॥

लोकव्यवहार शास्त्रानुकूल होना चाहिए ॥ ४६९ ॥ शास्त्रज्ञान न होने पर श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण का अनुगमन करना चाहिए ॥ ४७० ॥ सदाचार से बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है ॥ ४७१ ॥

गुप्तचरों के द्वारा राजा दूर की वस्तु को देख लेता है ॥ ४७२ ॥ लोक, परम्परा का अनुगमन करता है ॥ ४७३ ॥

जिसके द्वारा जीविकोपार्जन होता है उसकी निन्दा न करनी चाहिए ॥ ४७४ ॥ इन्द्रियनिग्रह तप का सार है ॥ ४७५ ॥

स्त्री के बन्धन से छूटना बड़ा दुष्कर है ॥ ४७६ ॥ स्त्री समस्त अशुभों की जन्म-दात्री है ॥ ४७७ ॥

स्त्री, पुरुष की परीक्षा नहीं कर सकती ॥ ४७८ ॥ स्त्री का मन क्षण-क्षण बदलता रहता है ॥ ४७९ ॥ अशुभ कर्मों को न चाहने वाले लोग स्त्रियों में आसक्त नहीं होते ॥ ४८० ॥

वेदत्रयी ( ऋक्, यजु, साम ) को जानने वाला ही यज्ञ के फल को जानता है ॥ ४८१ ॥ स्वर्गप्राप्ति स्थायी नहीं होती, क्योंकि उसकी अवधि तब तक होती है, जब तक पुण्य का फल शेष रहता है ॥ ४८२ ॥ स्वर्गपतन से बढ़कर दुःख नहीं है ॥ ४८३ ॥ शरीर त्याग करके जीव इन्द्रासन को नहीं चाहता ॥ ४८४ ॥ समस्त दुःखों की औषधि मोक्ष है ॥ ४८५ ॥

चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७९७

विवादे धर्ममनुस्मरेत् ॥४८९॥ निशान्ते कार्यं चिन्तयेत् ॥४९०॥ प्रदोषे न संयोगः कर्तव्यः ॥४९१॥ उपस्थितविनाशो दुर्नयं मन्यते ॥४९२॥ क्षीराथिनः किं करिण्या ॥४९३॥ न दानसमं वश्यम् ॥४९४॥ परायत्तेषूत्कण्ठां न कुर्यात् ॥४९५॥ असत्समृद्धिरसद्भिरेव भुज्यते ॥४९६॥ निम्बफलं काकैरेव भुज्यते ॥४९७॥ नाम्भोधिस्तृष्णामपोहति ॥४९८॥

बालुका अपि स्वगुणमाश्रयन्ते ॥४९९॥ सन्तोऽसत्सु न रमन्ते ॥५००॥ हंसः प्रेतवने न रमते ॥५०१॥

अर्थार्थं प्रवर्तते लोकः ॥५०२॥ आशया बध्यते लोकः ॥५०३॥ न चाशापरैः श्रीः सह तिष्ठति ॥५०४॥ आशापरे न धैर्यम् ॥५०५॥

दैन्यान्मरणमुत्तमम् ॥५०६॥ आशा लज्जां व्यपोहति ॥५०७॥

न मात्रा सह वासः कर्तव्यः ॥५०८॥ आत्मा न स्तोतव्यः ॥५०९॥ न दिवा स्वप्नं कुर्यात् ॥५१०॥ न चासन्नमपि पश्यत्यैश्वर्यान्धो न श्रृणोतीष्टं वाक्यम् ॥५११॥


अनार्य व्यक्ति की मित्रता से आर्यव्यक्ति की शत्रुता अच्छी है ॥४८६॥ दुर्वाणि सारे कुल को नष्ट कर देती है ॥४८७॥ पुत्र के आलिंगन से बढ़कर कोई सुख नहीं है ॥४८८॥

विवाद के समय धर्म के अनुसार कार्य करना चाहिए ॥४८९॥ नित्य प्रातः-काल अपने (दिन के) कार्यों पर विचार करना चाहिए ॥४९०॥ संध्याकाल में संभोग वर्जित है ॥४९१॥ जिसका विनाशकाल निकट होता है वह अन्याय पर उतर आता है ॥४९२॥ दूध चाहने वाले को हथिनो की आवश्यकता नहीं होती ॥४९३॥ दान के समान कोई वशीकरण नहीं ॥४९४॥ परायी वस्तु की इच्छा न करनी चाहिए ॥४९५॥ दुर्जनों की समृद्धि को दुर्जन ही भोगते हैं ॥४९६॥ नीम के फल को कौवे ही खाते हैं ॥४९७॥ समुद्र प्यास नहीं बुझाता ॥४९८॥

बालू भी अपने गुण का अनुसरण करती है ॥४९९॥ भले लोग बुरे लोगों से आनन्दित नहीं होते ॥५००॥ हंस श्मशान में रहना पसन्द नहीं करते ॥५०१॥

सारा संसार धन के पीछे दौड़ता है ॥५०२॥ सभी सांसारिक प्राणी आशा के बन्धन से बँधे है ॥५०३॥ आशा में निमग्न पुरुष को लक्ष्मी नहीं मिलती ॥५०४॥ आशावान् मनुष्य धैर्यशाली नहीं होता ॥५०५॥

दरिद्र होकर जीवित रहने की अपेक्षा मर जाना ही अच्छा है ॥५०६॥ आशा, लज्जा को मिटा देती है ॥५०७॥

एकान्त में माता के भी साथ न रहे ॥५०८॥ अपने मुख से अपनी प्रशंसा न करनी चाहिए ॥५०९॥ दिन में सोना न चाहिए ॥५१०॥ ऐश्वर्य में अन्धा मनुष्य न तो अपने समीप की वस्तु को देखता है और न हितकारी बात को सुनता है ॥५११॥

७९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र

स्त्रीणां न भर्तुः परं दैवतम् ॥ ५१२ ॥ तदनुवर्तनमुभयसुखम् ॥५१३॥ अतिथिमभ्यागतं पूजयेद् यथाविधिः ॥ ५१४ ॥ नास्ति हव्यस्य व्याघातः ॥ ५१५ ॥ शत्रुर्भाववत् प्रतिभाति ॥ ५१६ ॥ मृगतृष्णा जलवद् भाति ॥ ५१७ ॥ दुर्मेधसामसच्छास्त्रं मोहयति ॥ ५१८ ॥ सत्संगः स्वर्गवासः ॥ ५१९ ॥ आर्यः स्वमिव परं मन्यते ॥ ५२० ॥ रूपानुवर्ती गुणः ॥५२१॥ यत्र सुखेन वर्तते तदेव स्थानम् ॥ ५२२ ॥ विश्वासघातिनो न निष्कृतिः ॥ ५२३ ॥ दैवयत्तं न शोचेत् ॥ ५२४ ॥ आश्रितदुःखमात्मन इव मन्यते साधुः ॥ ५२५ ॥ हृद्गतमाच्छाद्यान्यद् वदत्यनार्यः ॥ ५२६ ॥ बुद्धिहीनः पिशाचतुल्यः ॥ ५२७ ॥ असहायः पथि न गच्छेत् ॥ ५२८ ॥ पुत्रो न स्तोतव्यः ॥ ५२९ ॥ स्वामी स्तोतव्योऽनुजीविभिः ॥ ५३० ॥ धर्मकृत्येष्वपि स्वामिन एव घोषयेत् ॥ ५३१ ॥ राजाज्ञां नातिलङ्घयेत् ॥ ५३२ ॥ यथाऽऽज्ञप्तं तथा कुर्यात् ॥ ५३३ ॥ नास्ति बुद्धिमतां शत्रुः ॥ ५३४ ॥ आत्मच्छिद्रं न प्रकाशयेत् ॥५३५॥


स्त्री के लिए पति बढ़कर कोई देवता नहीं है ॥ ५१२ ॥ पति के इच्छानुसार चलने वाली स्त्री को इहलोक और परलोक, दोनों का सुख प्राप्त होता है ॥ ५१३ ॥ अपने यहाँ आये हुए अतिथि का विधिवत् सत्कार करना चाहिए ॥ ५१४ ॥ देवताओं के निमित्त से दिया हुआ द्रव्य कभी भी नष्ट नहीं होता ॥ ५१५ ॥ शत्रु भी कभी मित्र के समान दिखायी देता है ॥ ५१६ ॥ तृष्णा के कारण मृग चमकती हुई बालू को जल समझ बैठता है ॥ ५१७ ॥ दुर्बुद्धि मनुष्य को असत् शास्त्र मोह लेते हैं ॥ ५१८ ॥ सत्संग ही स्वर्गवास है ॥ ५१९ ॥ श्रेष्ठ व्यक्ति सबको अपने ही समान समझता है ॥ ५२० ॥ रूप के अनुसार ही मनुष्य में गुण होता है ॥ ५२१ ॥ जहाँ सुख से रहा जा सके, वही उत्तम स्थान है ॥ ५२२ ॥

विश्वासघाती मनुष्य के उद्धार के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं ॥ ५२३ ॥ जो बात दैव के अधीन है उसके सम्बन्ध में सोच-विचार न करना चाहिए ॥ ५२४ ॥ सज्जन व्यक्ति आश्रितों के दुःख को अपना ही दुःख समझते हैं ॥ ५२५ ॥ हृदय की बात को छिपाकर बनावटी बातें करने वाला अनार्य है ॥ ५२६ ॥ बुद्धिहीन मनुष्य पिशाच के समान है ॥ ५२७ ॥ बिना साथ के यात्रा न करनी चाहिए ॥ ५२८ ॥ अपने पुत्र की प्रशंसा न करनी चाहिए ॥ ५२९ ॥

सेवक लोगों को चाहिए कि वे अपने स्वामी का गुणगान करते रहें ॥ ५३० ॥ अपने धर्मकार्यों में भी वे स्वामी का गुणगान करते रहें ॥५३१॥ राजा की आज्ञा का कभी भी उल्लंघन न करना चाहिए ॥ ५३२ ॥ उसकी जैसी आज्ञा हो तदनुसार करना चाहिए ॥ ५३३ ॥

बुद्धिमान् मनुष्य का कोई शत्रु नहीं है ॥ ५३४ ॥ अपनी गुप्त बात किसी पर

चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७९९

क्षमावानेव सर्वं साधयति ॥ ५३६ ॥ आपदर्थं धनं रक्षेत् ॥ ५३७ ॥ साहस- वतां प्रियं कर्तव्यम् ॥ ५३८ ॥ श्वः कार्यमद्य कुर्वीत ॥ ५३९ ॥ आपराह्निकं पूर्वाह्ने एव कर्तव्यम् ॥ ५४० ॥ व्यवहारानुलोमो धर्मः ॥ ५४१ ॥ सर्वज्ञता लोकज्ञता ॥ ५४२ ॥ शास्त्र- ज्ञोऽप्यलोकज्ञो मूर्खतुल्यः ॥ ५४३ ॥ शास्त्रप्रयोजनं तत्त्वदर्शनम् ॥ ५४४ ॥ तत्त्वज्ञानं कार्यमेव प्रकाशयति ॥ ५४५ ॥ व्यवहारे पक्षपातो न कार्यः ॥ ५४६ ॥ धर्मादपि व्यवहारो गरीयान् ॥ ५४७ ॥ आत्मा हि व्यवहारस्य साक्षी ॥ ५४८ ॥ सर्वसाक्षी ह्यात्मा ॥ ५४९ ॥ न स्यात् कूटसाक्षी ॥ ५५० ॥ कूटसाक्षिणो नरके पतन्ति ॥ ५५१ ॥ प्रच्छन्नपापानां साक्षिणो महाभूतानि ॥ ५५२ ॥ आत्मनः पापमात्मैव प्रकाशयति ॥ ५५३ ॥ व्यवहारेऽन्तर्गतमाचारः सूचयति ॥ ५५४ ॥ आकारसंवरणं देवानामशक्यम् ॥ ५५५ ॥ चौरराजपुरुषेभ्यो वित्तं रक्षेत् ॥ ५५६ ॥ दुर्दर्शना हि राजानः प्रजाः नाशयन्ति ॥ ५५७ ॥


प्रकट न करनी चाहिए ॥ ५३५ ॥ क्षमाशील मनुष्य अपना सब कार्य साध लेता है ॥ ५३६ ॥ आपत्काल के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए ॥ ५३७ ॥ साहसी पुरुष कर्तव्यप्रिय होता है ॥ ५३८ ॥

जो कार्य कल करना है, उसको आज ही कर लेना चाहिए ॥ ५३९ ॥ जो कार्य दोपहर के बाद करना है उसको दोपहर के पहले ही कर लेना चाहिए ॥ ५४० ॥

व्यवहार के अनुसार ही धर्म होता है ॥ ५४१ ॥ सांसारिक बातों का ज्ञाता ही सर्वज्ञ कहलाता है ॥ ५४२ ॥ शास्त्रज्ञ होता हुआ भी जो लोकज्ञ न हो, वह मूर्ख के समान है ॥ ५४३ ॥ यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति ही शास्त्र का प्रयोजन है ॥ ५४४ ॥ कार्य ही यथार्थ ज्ञान के प्रकाशक हैं ॥ ५४५ ॥

व्यवहार ( न्याय ) में पक्षपात न करना चाहिए ॥ ५४६ ॥ व्यवहार धर्म से भी बड़ा होता है ॥ ५४७ ॥ व्यवहार का साक्षी आत्मा है ॥ ५४८ ॥ समस्त प्राणियों में आत्मा साक्षीरूप में विद्यमान रहता है ॥ ५४९ ॥ कपट-साक्षी न होना चाहिए ॥ ५५० ॥ झूठे साक्षी नरक में जाते हैं ॥ ५५१ ॥ छिपकर किये गये पापों के साक्षी पंच महाभूत ( पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश ) हैं ॥ ५५२ ॥ अपने पापों को पापी स्वयमेव प्रकट करता है ॥ ५५३ ॥ व्यवहार के समय मन की बात को आकृति ही प्रकट कर देती है ॥ ५५४ ॥

मनोगत भावों की अभिसूचक आकृति को देवता भी नहीं छिपा सकते ॥ ५५५ ॥

चोरों और राजपुरुषों से अपने धन की रक्षा करनी चाहिए ॥ ५५६ ॥ जिन

८०० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र

सुदर्शना हि राजानः प्रजा रञ्जयन्ति ॥ ५५८ ॥ न्याययुक्तं राजानं मातरं मन्यन्ते प्रजाः ॥ ५५९ ॥ तादृशः स राजा इह सुखं ततः स्वर्गमाप्नोति ॥ ५६० ॥

अहिंसालक्षणो धर्मः ॥ ५६१ ॥ स्वशरीरमपि परशरीरं मन्यते साधुः ॥ ५६२ ॥ मांसभक्षणमयुक्तं सर्वेषाम् ॥ ५६३ ॥

न संसारभयं ज्ञानवताम् ॥ ५६४ ॥ विज्ञानदीपेन संसारभयं निवर्तते ॥ ५६५ ॥

सर्वमनित्यं भवति ॥ ५६६ ॥ कृमिशकृन्मूत्रभाजनं शरीरं पुण्यपापजन्महेतुः ॥ ५६७ ॥ जन्ममरणादिषु दुःखमेव ॥ ५६८ ॥

तेभ्यस्तर्तुं प्रयतेत ॥ ५६९ ॥ तपसा स्वर्गमाप्नोति ॥ ५७० ॥ क्षमायुक्तस्य तपो विवर्धते ॥ ५७१ ॥ तस्मात् सर्वेषां कार्यसिद्धिर्भवति ॥ ५७२ ॥

इति चाणक्यसूत्राणि — : ० : —


राजाओं के दर्शन, प्रजा को कठिनाई से प्राप्त होते हैं उसकी प्रजा नष्ट हो जाती है ॥ ५५७ ॥

जो राजा बराबर प्रजा के सुख-दुःख को सुनते हैं उनसे प्रजा प्रसन्न रहती है ॥ ५५८ ॥ न्यायपरायण राजा को, प्रजा माता के समान मानती है ॥ ५५९ ॥ इस प्रकार का प्रजाप्रिय राजा ऐहिक सुख और पारलौकिक स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥ ५६० ॥

अहिंसा ही धर्म है ॥ ५६१ ॥ सज्जन पुरुष अपने शरीर को भी पराया ही मानते हैं ॥ ५६२ ॥ मांस-भक्षण सबके लिए अनुचित है ॥ ५६३ ॥ ज्ञानी पुरुषों को संसार का भय नहीं होता ॥ ५६४ ॥ विज्ञान ( ब्रह्मज्ञान ) के दीपक से संसार-भय भाग जाता है ॥ ५६५ ॥

यह दिखायी देने वाला सब कुछ अनित्य है ॥ ५६६ ॥ कृमि-कीट तथा मल-मूत्र का घर शरीर पुण्य-पाप का जन्मस्थल है ॥ ५६७ ॥ यह जन्म-मरण आदि दुःख ही दुःख है ॥ ५६८ ॥

इस जन्म-मरणादि से छुटकारा पाने का उपाय करना चाहिए ॥ ५६९ ॥ सब से स्वर्ग की प्राप्ति होती है ॥ ५७० ॥ क्षमाशील पुरुष का तप बढ़ता रहता है ॥ ५७१ ॥ तपश्चर्या से सबके कार्य सिद्ध होते हैं ॥ ५७२ ॥

चाणक्यसूत्र समाप्त

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पारिभाषिक शब्दावली

प्राचीन भारत की राजनीति और शासन के क्षेत्र में आचार्य कौटिल्य का अर्थ-शास्त्र एक विश्वकोश जितना महत्त्व रखता है। उसमें धर्म, कर्म, शिक्षा, नीति, समाज, विज्ञान, कृषि, चिकित्सा और यहाँ तक कि मन्त्र-तन्त्र आदि जितने भी विषय हैं उन सभी का समावेश है। इस सर्वांगीण और सर्वतोमुखी विशिष्टता के कारण अर्थशास्त्र की शब्दावली में अनेकता के दर्शन होते हैं।

अर्थशास्त्र-विषयक पुरातन उद्देश्य को दृष्टि में रख कर यहाँ लगभग पौने आठ सौ शब्दों की एक सूची इस हेतु दी जा रही है कि शासन के विभिन्न क्षेत्रों में अंग्रेजी शब्दों के स्थान पर जो भारतीय भाषाओं और विशेषतया संस्कृत भाषा के शब्दों का नवीनीकरण हुआ है, अर्थशास्त्र के पाठकों को उसकी जानकारी प्राप्त हो सके।

प्राचीन अर्थशास्त्र का महत्त्व वर्त्तमान शासन-संबंधी सभी कार्यक्षेत्रों में व्याप्त है। इस दृष्टि से और आचार्य कौटिल्य की सर्वथा वैयक्तिक विचारधारा को समझने के लिए भी यह पारिभाषिक शब्दावली उपयोगी सिद्ध होगी।

यह शब्दावली सरकार के शिक्षा-विभाग से तैयार की गयी पारिभाषिक शब्द-सूचियों, श्री मोनियर विलियम्स, श्री वामन शिवराम आप्टे, श्री लक्ष्मण शास्त्री, राहुलजी तथा डा० रघुवीर के शब्दकोशों, डा० शामशास्त्री, एवं महामहोपाध्याय गणपति शास्त्री कृत अर्थशास्त्र के अंग्रेजी, संस्कृत अनुवादों और डा० जायसवाल की पुस्तक हिन्दू पॉलिटी पर आधारित है।

अंकनी—लेखनी—पेंसिलअंतिमेत्यम्—अंतिम चेतावनी—अल्टिमेटम
अंकयमित—मुहर लगा पत्र—स्टांप्डअंशधर—हिस्सेदार—शेयर होल्डर
अंकेक्षित लेखा—लेखा-परीक्षक द्वारा जाँच किया हुआ हिसाब—ऑडिटेड एकाउंटअकृतक्षेत्र—कृषि के अयोग्य भूमि
अंगरक्षक—शरीररक्षक—बॉडीगार्डअकृषित—जो भूमि जोती-बोई न गई हो—अनकल्टिवेटेड
अंतग्रस्त—विपत्तिग्रस्त—इंवाल्व्डअक्ष—धुरी-एक्सिस
अंतपाल राज्य—दो देशों की सीमाओं के बीच स्थित राज्य—बफर स्टेटअक्षपटल—आय-व्यय के लेखे का प्रधान, विभाग या कर्मचारी ( पटल—अधिदेवन )
अंतरंग सचिव—निजी सचिव—प्राइवेट सेक्रेटरीअक्षपटलाध्यक्ष—महागणक, महागणनिक—एकाउंटेंट जनरल
अंतर्वाणिज्य—आभ्यंतर व्यापार—इंटरनल ट्रेडअक्षशाला—सुवर्ण आदि का शोधन करने एवं गणना करने वालों का स्थान

५१ कौ०

| अधिकरण—आधार विषय | अधिशिक्षक—मुख्य अधिष्ठाता—रेक्टर |

८०२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र

अग्निवारक—अग्नि का प्रभाव रोकने वाला—फायरप्रूफअधिकारी राज्य—कर्मचारी तन्त्र—ब्यूरोक्रेसी
अग्निशामक—अग्नि को शांत करने वाला—फायरब्रिगेडअधिकोष—रुपया जमा करने और माँगने पर ब्याज सहित लौटा देने वाली संस्था—बैंक
अग्रदाय—इम्प्रेस्डअधिग्रहण—अधिकार या अभियाचन द्वारा किसी की संपत्ति आदि को ले लेना—ऐक्विजिशन
अग्रदाय धन--इम्प्रेस्ड मनी
अग्रसर—आगे बढ़ा हुआ—फारवर्ड
अग्रसारित—आगे बढ़ा दिया गया पत्र आदि—फॉरवर्डेडअधिदेय—भत्ता—अलाउन्स
अधिनायक—तानाशाह—डिक्टेटर
अटवीवल—कोल-भील लोगों की सेनाअधिनियम—पारित विधि—ऐक्ट
अणुदर्शी—सूक्ष्मदर्शी—माइक्रोस्कोपअधिपत्र—लिखित आदेश—वारंट
अति उत्पादन—खपत या माँग से अधिक मात्रा में पण्य वस्तुओं का उत्पादन—ओवर प्रॉडक्शनअधिप्रभार—निर्धारित परिणाम से अधिक शुल्क—ओवरचार्ज
अधिभार—अधिक कर—सरचार्ज
अतिचरण—सीमा का उल्लंघन—ट्रांसग्रेसनअधिमास—मलमास—लीप-ईयर
अधियुक्त—नियोजित—एम्प्लॉयड
अत्यय—वैध अर्थदण्डअधिराज्य—स्वतंत्र उपनिवेश—डोमीनियन
अद्यावधिक—आज तक का—अप-टु-डेट
अधमर्ण—जिसने किसी से ऋण लिया हो, कर्जदार—डेटरअधिवक्ता—वकील—एडवोकेट
अधिवारन—डामिसियल
अधिकर—अतिरिक्त कर—सुपर टैक्सअधिविन्ना—प्रथम विवाहिता पत्नी
अधिकरण—आधार विषयअधिशिक्षक—मुख्य अधिष्ठाता—रेक्टर
अधिकर्ता—निदेशक; संचालक—डायरेक्टरअधिशेष—बचत—सरप्लस
अधिकर्मी—अधिकारी—ओवरसीयरअधिष्ठाता—नियामक अधिकारी—प्रसाइडिंग आफिसर
अधिकार—कार्यभार—सर चार्ज
अधिकारपत्र—शासत द्वारा प्राप्त पत्र—चार्टरअसूधिचना—अधिकृत सूचना—नोटिफिकेशन
अधिकारिक सेना—विजित देश पर तब तक अधिकार बनाये रखनेवाली सेना, जब तक कि नियमित शासन व्यवस्था कायम नहीं हो जाती—आर्मी आफ आकुपेशनअधीक्षक—कार्यालय या विभाग का अधिकारी—सुपरिटेंडेंट
अध्यक्ष—प्रमुख—चेयरमैन
अभ्यर्थित—क्लेम्ड
अधिकारी—पदाधिकारी—अफसरअभ्यर्थी—दावेदार—क्लेमेंट

पारिभाषिक शब्दावली

८०३

अध्यादेश—विशेष स्थिति में लागू किया गया आदेश—आर्डिनेंस

अध्यारोप—इम्यूटेशन

अनय—दुष्टनीति

अनर्हता—अयोग्यता—डिस्क्वालिफिकेशन

अनारूढ—पैदल—डिस्माउण्टेड

अनावर्त्तक—जो (अनुदान) एक ही बार दिया जाय—नाॅन-रेकरिंग

अनावर्ती—फिर न लौटनेवाला—एपीरिओडिक

अनीकस्थ—निपुण हस्तिशिक्षक

अनीकिनी—सेना का सबसे बड़ा भाग, जिसमें १०-१५ हजार सैनिक हों—डिवीजन

अनुग्रह—राजा के द्वारा प्रजा को प्रदत्त उपकार

अनुग्रह परिहार—आर्थिक रियायतें

अनुग्रहधन—सेवा का उपहार—ग्रेचुइटी

अनुच्छेद—संविदा आदि का वह विशिष्ट अंश, जिसमें एक विषय और उसके प्रतिबंधों आदि का उल्लेख हो—पैराग्राफ

अनुज्ञप्ति—अनुज्ञापत्र—लाइसेंस

अनुज्ञाधारी—लाइसेंसदार

अनुदेश—हिदायत—इंस्ट्रक्शन

अनुपूरक—छूट या कमी को पूरा करने के लिए बाद में बढ़ाया हुआ—सप्लिमेंटरी

अनुबन्ध—बंधन—क्राँन्ट्रक्ट

अनुबन्ध पत्र—करारनामा—इंडेंचर

अनुबल—पृष्ठरक्षक सेना—रेयरगार्ड

अनुभाजन—ऐपोर्शन

अनुरक्षक—एस्कॉर्ट


अनुवेशपत्र—परीक्षित पारपत्र—वीजा

अनुशय—क्रय-विक्रय-संबंधी विवाद

अनूप—जलमय प्रदेश

अनैतिक—इम्मोरल

अनौपचारिक —इनफारमल

अन्तपाल—सीमान्त अधिकारी

अन्तर्वेशिक—अन्तःपुर का प्रमुख अधिकारी

अन्तर्धि—शत्रु तथा विजिगीषु के बीच का राज्य

अपचारक—दूसरे की सीमा में अनधिकार प्रवेश—ट्रेसपासर

अपर न्यायाधीश —अतिरिक्त न्यायाधीश—एडीशनल जज

अपर सचिव—अतिरिक्त सचिव—एडिशनॅल सेक्रेटरी

अपराधी—दोषी—गिल्टी

अपरिदेय—जिसकी अदला-बदली न की जा सके—नाॅन-ट्रांसफरेबल

अपलाभ—अनुचित लाभ—प्रोफिटियरिङ्ग

अपहार—प्राप्त आय को खाते में न चढ़ाना निर्धारित धन का व्यय न करना और बचत धन का अपव्यय करना

अपेक्षाभूमि—परती भूमि—फालोलैंड

अप्रतिभाव्य—वह अपराध, जिसमें किसी के जामिन बनने या जमानत देने को तैयार होने पर भी अपराधी को अस्थायी रूप से रिहा कर देने की गुञ्जायश न हो—नाॅन-बेलेबिल

अप्रत्यक्षकर—जो कर विक्रेय वस्तुओं की बढ़ी हुई कीमत के रूप में उप भोक्ताओं से लिया जाता है—इण्डाइरेक्ट टैक्स

अप्रत्यादेय—जो फिर प्राप्त या वसूल न किया जा सके—इर्रिकव्हरेबिल

४०४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र


अप्राप्तव्यवहार—नाबालिग
अभक्ति—अश्रद्धा—डिस्लोयल्टी
अभिकथन—अप्रमाणित आरोप—एलेगेशन
अभिकरण—अभिकर्ता के कार्य करने का स्थान—एजेंसी
अभिकर्ता-—कार्यवाहक, घटक—एजेंट
अभिग्रहण—अपना कहकर स्वीकार करना—एक्वीजीशन
अभिज्ञा—मान्यता—रेकॉगनिशान, आइडेण्टिटी
अभिज्ञात—मान्यता प्राप्त—रेकॉगनाइज्ड
अभिज्ञान—पहिचान—आइडेन्टिफिकेशन
अभिज्ञापक—उद्घोषक—एनाउंसर
अभिज्ञापत्र—पहचान पत्र—आइडेण्टिटी-कार्ड
अभिधान—कथन—एपीलेशन्स
अभिनिर्णय—अन्तिम निर्णय—वर्डिक्ट
अभिन्यास—किसी योजना के अनुसार गृह, उद्यान आदि का निर्माण करना—ले-आउट
अभिभावक—संरक्षक—गार्जियन
अभियन्ता—यन्त्रविद—इंजीनियर
अभियान—आक्रमण करने की क्रिया
अभियोक्ता—वादी—कॉम्पिलनेण्ट
अभियोग—दोषारोपण—ऐक्यूजेशन
अभिवक्ता—वकील—प्लीडर
अभिरक्षक—सुरक्षा की दृष्टि से किसी वस्तु या व्यक्ति को अपने संरक्षण में रखने वाला—कस्टोडियन
अभिरक्षा—हिरासत—कस्टोडी
अभिलेख—रिकार्ड
अभिलेख कार्यालय—रिकार्ड आफिस
अभिलेखपाल—कीपर आफ रिकार्ड्स


अभिषद्—सीनेट की प्रबन्ध समिति—सिण्डिकेट
अभिसूचना—हिदायत—इंस्ट्रक्शन
अभिस्रावणी—भट्टी—डिस्टलरी
अभुक्त—जिसका उपभोग या भुगतान न किया गया हो—अनकैश्ड
अभ्यंश—नियतांश—कोटा
अभ्यस्त अपराधी—आदतन दोषी—हैविचुअल ऑफेण्डर
अभ्युक्ति—टीका—रिमार्क
अभ्युद्देश—रिफ्रेन्स
अम्ल—तेजाब—एसिड
अमित्रसंपत्—शत्रु के प्रमुख दोष
अय—अभीष्ट फल की प्राप्ति
अराजक—बिना शासक वाली आदर्शवादियों की शासन-प्रणाली
अर्थदूषण—आर्थिक क्षति
अर्थशास्त्र—पृथिवी की प्राप्ति और पालन का प्रतिपादन करने वाली विद्या
अर्थापन—व्याख्या—इण्टरप्रेटेशन
अर्हता—योग्यता—क्वालिफिकेशन
अवकाशग्रहण—विश्राम लेना—रिटायरमेंट
अवज्ञा—अवहेलना—डिस्-ओविडिएंस
अवघाता—वह व्यक्ति जो असली मालिक की अविद्यमानता में मकान आदि की निगरानी करे—केयरटेकर
अवधायी सरकार—अवधायक सरकार वह सरकार, जो निर्वाचन होने के बाद नई सरकार के कार्यभार ग्रहण कर लेने तक शासन-व्यवस्था की निगरानी करती है—केयरटेकर गवर्नमेंट
अवधान—देखभाल—केयर

पारिभाषिक शब्दावली

८०५

अवधायक अधिकारी—किसी कार्य या कार्यालय का अधिकारी—आफिस इनचार्ज
अवमान—अवज्ञा—कंटेप्ट
अवमूल्यन—किसी सरकार द्वारा अन्य देशों की मुद्राओं की तुलना में अपने देश की मुद्रा का मूल्य घटा दिया जाना—डीवेलुएशन
अवयस्क—नाबालिग (१८ वर्ष से कम)—माइनर
अवर—जूनियर
अवरागार—लोकसभा—लोअर हाउस
अवरुद्ध—नजरबन्द
अवरोधन भत्ता—रूकौनी भत्ता—डिटेंशन अलाउंस
अवशेष—बचा हुआ—बैलेंस ओपनिंग
अवेक्षण—लुक आउट
अवैतनिक—ऑनररी
अवैध—नियमविरुद्ध—इल्लीगल
अवसर ग्रहण—अवसर प्राप्त-रिटायरमेंट
अवस्थान प्रक्रम—ठहरने का स्थान—स्टेशन
अवहार—छूट ( कर )—रिबेट
अव्ययित शेष—किसी काम के लिए निर्धारित या जमा किये हुए धन का वह अंश, जो व्यय न किये जाने के कारण बच गया हो—अनस्पेंट बैलेंस
अशोधित शेष—किसी ऋण आदि का वह बचा हुआ अंश जिसका भुगतान या अदायगी न हुई हो—अनरिडीम्ड बैलेंस
अष्टकुल—आठ सदस्यों की न्यायकारी काउंसिल


असैनिक—सिविल
असैनिकीकरण—किसी स्थान या क्षेत्र को सैन्यविहीन कर देना—डीमिलिटेरिजेशन
अस्थायी संधि—आर्मिस्टिस

आकाशी—एरियल
आक्रय—फेरीवाला—हॉकर
आख्यापक—अनाउंसर
आख्यापना—अनाउंसमेंट
आज्ञप्ति—दीवानी मुकदमे में न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय—डिक्री
आतिथ्य शुल्क—आयात माल पर कर
आतंक युद्ध—प्रचार आदि के द्वारा ऐसा आतंक उत्पन्न कर देना कि जिससे शत्रु का साहस और युद्ध-क्षमता शीण पड़ जाय—वार ऑफ नर्ज
आदेय—वह धन, जो दूसरों से मिलना हो या जो अपनी संपत्ति बेच कर प्राप्त किया जाय—असेट्स
आधि—धरोहर—पॉन
आधिकारिक—सरकारी—ऑफिसियल
आन्वीक्षकी—आत्मविद्या
आपत्सहायकार्य—दुष्काल या बाढ़, भूकंप आदि के संकट-काल में, आर्त तथा असहाय जनता की सहायता के लिए आरंभ किया गया सार्वजनिक निर्माण कार्य—रिलीफ वर्क
आपात—आकस्मिक संकट—इमरजेंसी
आपृच्छा—रेफरेंडम
आबकारी—एक्साइज
आभारोक्ति—एक्नॉलेजमेंट
आयकर—इनकम टैक्स