कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
नानृतात् पातकं परम् ॥ ४२१ ॥ न मीमांस्या गुरवः ॥४२२॥ खलत्वं नोपेयात् ॥ ४२३ ॥ नास्ति खलस्य मित्रम् ॥ ४२४ ॥ लोकयात्रा दरिद्रं बाधते ॥ ४२५ ॥ अतिशूरो दानशूरः ॥ ४२६ ॥ गुरुदेवब्राह्मणेषु भक्तिर्भूषणम् ॥४२७॥ सर्वस्य भूषणं विनयः ॥ ४२८ ॥ अकुलीनोऽपि विनीतः कुलीनाद् विशिष्टः ॥ ४२९ ॥ आचारादायुर्वर्धते कीर्तिश्च ॥ ४३० ॥ प्रियमप्यहितं न वक्तव्यम् ॥ ४३१ ॥ बहुजनविरुद्धमेकं नानुवर्तेत ॥ ४३२ ॥ न दुर्जनेषु भागधेयः कर्तव्यः ॥ ४३३ ॥ न कृतार्थेषु नीचेषु सम्बन्धः ॥ ४३४ ॥ ऋणशत्रुव्याधिश्वशेषः कर्तव्यः ॥ ४३५ ॥ भृत्यानुवर्तनं पुरुषस्य रसायनम् ॥ ४३६ ॥ नार्थिष्ववज्ञा कार्या ॥ ४३७ ॥ दुष्करं कर्म कारयित्वा कर्तारमवमन्यते नीचः ॥ ४३८ ॥ नाकृतज्ञस्य नरकान्निवर्तनम् ॥ ४३९ ॥ जिह्वायत्तौ वृद्धिविनाशौ ॥ ४४० ॥ विषामृतयोराकरी जिह्वा ॥ ४४१ ॥ प्रियवादिनो न शत्रुः ॥ ४४२ ॥ स्तुता अपि देवतास्तुष्यन्ति ॥ ४४३ ॥ अनृतमपि दुर्वचनं चिरं तिष्ठति ॥ ४४४ ॥ राजद्विष्टं न च वक्तव्यम् ॥ ४४५ ॥ श्रुतिसुखात्कोकिलालापात् तुष्यन्ति ॥ ४४६ ॥
झूठ से बढ़कर कोई पाप नहीं है ॥ ४२१ ॥ गुरूजनों की आलोचना नहीं करनी चाहिए ॥ ४२२ ॥ दुष्टता को अंगीकार न करना चाहिए ॥ ४२३ ॥ दुष्ट मनुष्य का कोई मित्र नहीं होता ॥ ४२४ ॥ दरिद्र मनुष्य को जीवन-निर्वाह करना कठिन होता है ॥ ४२५ ॥
दानवीर ही सबसे बड़ा वीर है ॥ ४२६ ॥ गुरु, देवता और ब्राह्मणों में भक्ति रखना मानवता का आभूषण है ॥ ४२७ ॥ विनय सबका आभूषण है ॥ ४२८ ॥ जो कुलीन न होता हुआ भी विनीत हो वह अविनीत कुलीन की अपेक्षा बड़ा है ॥ ४२९ ॥
सदाचार से आयु और यश दोनों की वृद्धि होती है ॥ ४३० ॥ प्रिय होने पर भी अहितकर वाणी को न बोलना चाहिए ॥ ४३१ ॥ अनेक लोगों के विरोधी एक व्यक्ति का अनुगमन नहीं करना चाहिए ॥ ४३२ ॥ दुर्जन व्यक्तियों के साथ अपना भाग्य नहीं जोड़ना चाहिए ॥ ४३३ ॥ कृतार्थ (सफल) नीच पुरुष से सम्बन्ध न करना चाहिए ॥ ४३४ ॥ ऋण, शत्रु और रोग को सर्वथा समाप्त कर देना चाहिए ॥ ४३५ ॥ कल्याण मार्ग पर चलना ही मनुष्य के लिए उत्तम रसायन है ॥ ४३६ ॥
याचक से घृणा न करनी चाहिए ॥ ४३७ ॥ नीच मनुष्य दुष्कर्म कराके, कर्ता को अपमानित करता है ॥ ४३८ ॥ कृतघ्न मनुष्य के लिए नरक के अतिरिक्त कोई गति नहीं है ॥ ४३९ ॥
अपनी उन्नति और अवनति अपनी वाणी के अधीन है ॥ ४४० ॥ वाणी ही विष तथा अमृत की खान है ॥ ४४१ ॥ प्रिय वचन बोलने वाले का कोई शत्रु नहीं है