कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्य-प्रणीत सूत्र ७९५
स्वधर्महेतुः सत्पुरुषः ॥ ४४७ ॥ नास्त्यर्थिनो गौरवम् ॥ ४४८ ॥ स्त्रीणां भूषणं सौभाग्यम् ॥ ४४९ ॥ शत्रोरपि न पातनीया वृत्तिः ॥४५०॥ अप्रयत्नोदकं क्षेत्रम् ॥ ४५१ ॥ एरण्डमवलम्ब्य कुञ्जरं न कोपयेत् ॥४५२॥ अतिप्रवृद्धा शाल्मली वारणस्तम्भो न भवति ॥ ४५३ ॥ अतिदीर्घोऽपि कर्णिकारो न मुसली ॥ ४५४ ॥ अतिदीप्तोऽपि खद्योतो न पावकः ॥४५५॥ न प्रवृद्धत्वं गुणहेतुः ॥ ४५६ ॥ सुजीर्णोऽपि पिचुमन्दो न शङ्कुलायते ॥ ४५७ ॥ यथा बीजं तथा निष्पत्तिः ॥ ४५८ ॥ यथा श्रुतं तथा बुद्धिः ॥ ४५९ ॥ यथा कुलं तथाऽऽचारः ॥ ४६० ॥ संस्कृतः पिचुमन्दः सहकारो न भवति ॥ ४६१ ॥ न चागतं सुखं त्यजेत् ॥ ४६२ ॥ स्वयमेव दुःखमधिगच्छति ॥ ४६३ ॥ रात्रिचारणं न कुर्यात् ॥ ४६४ ॥ न चार्धरात्रं स्वपेत् ॥ ४६५ ॥ तद्विद्भिङ्गुः परीक्षेत ॥ ४६६ ॥ परगृहमकारणतो न प्रविशेत् ॥ ४६७ ॥ ज्ञात्वाऽपि दोषमेव करोति लोकः ॥ ४६८ ॥
॥ ४४२ ॥ स्तुति से देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ४४३ ॥ असत्य दुर्वचन चिरकाल तक स्मरण होता रहता है ॥ ४४४ ॥ राजा से द्वेष करने वाली बात न बोलनी चाहिए ॥ ४४५ ॥ काली कोयल के भी, कानों को सुख देने वाले वचन सबको भाते हैं (कोयल के समान, कानों को सुख देने वाली वाणी का प्रयोग करना चाहिए) ॥ ४४६ ॥
स्वधर्म पर अवस्थित रहने के कारण पुरुष भी सत्यपुरुष हो जाता है ॥ ४४७ ॥ याचक का कोई गौरव नहीं होता ॥ ४४८ ॥ सुहाग स्त्री का आभूषण है ॥ ४४९ ॥ शत्रु की भी जीविका को नष्ट न करना चाहिए ॥ ४५० ॥ जहाँ बिना प्रयत्न के जल सुलभ हो वही अपना खेत है ॥ ४५१ ॥ एरण्ड वृक्ष के सहारे पर हाथी को कुपित करना उचित नहीं है ॥ ४५२ ॥ बहुत बड़ा होने पर भी सेमल के वृक्ष से हाथी को नहीं बाँधा जा सकता ॥ ४५३ ॥ बहुत बड़ा हुआ भी कनेर का वृक्ष मूसल बनाने के काम में नहीं आता ॥ ४५४ ॥ जुगुनू कितना भी अधिक चमकीला क्यों न हो, आग का काम नहीं दे सकता ॥ ४५५ ॥ बहुत बड़ा समृद्धिशाली हो जाने पर भी कोई गुणवान् नहीं हो पाता ॥ ४५६ ॥
बहुत पुराना होने पर भी नीम के वृक्ष का सरोता नहीं बन सकता ॥ ४५७ ॥ जैसा बीज होता है वैसा ही उससे फल उत्पन्न होता है ॥ ४५८ ॥ योग्यता के ही अनुरूप बुद्धि होती है ॥ ४५९ ॥ जैसा कुल होता है वैसा ही आचार होता है ॥ ४६० ॥ कितना ही संस्कार क्यों न किया जाय, नीम आम नहीं बन सकता ॥ ४६१ ॥ जो सुख प्राप्त हो उसको न छोड़ना चाहिए ॥ ४६२ ॥ कर्मानुसार ही मनुष्य को दुःख मिलता है ॥ ४६३ ॥
रात के समय व्यर्थ न घूमना चाहिए ॥ ४६४ ॥ आधी रात को शयन न करना