भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 880, कुल 918 में से

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७९६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र


शास्त्रप्रधाना लोकवृत्तिः ॥ ४६९ ॥ शास्त्राभावे शिष्टाचारमनुगच्छेत् ॥ ४७० ॥ नाचरिताच्छास्त्रं गरीयः ॥ ४७१ ॥ दूरस्थमपि चारचक्षुः पश्यति राजा ॥ ४७२ ॥ गतानुगतिको लोकः ॥ ४७३ ॥ यमनुजीवेत् तं नापवदेत् ॥ ४७४ ॥ तपःसार इन्द्रियनिग्रहः ॥४७५॥ दुर्लभः स्त्रीबन्धनान्मोक्षः ॥ ४७६ ॥ स्त्री नाम सर्वाशुभानां क्षेत्रम् ॥ ४७७ ॥ न च स्त्रीणां पुरुषपरीक्षा ॥ ४७८ ॥ स्त्रीणां मनः क्षणिकम् ॥४७९॥ अशुभद्वेषिणः स्त्रीषु न प्रसक्ताः ॥ ४८० ॥ यज्ञफलज्ञास्त्रिवेदविदः ॥ ४८१ ॥ स्वर्गस्थानं न शाश्वतं यावत् पुण्यफलम् ॥ ४८२ ॥ न च स्वर्गपतनात् परं दुःखम् ॥ ४८३ ॥ देही देहं त्यक्त्वा ऐन्द्रं पदं न वाञ्छति ॥ ४८४ ॥ दुःखानामौषधं निर्वाणम् ॥४८५॥ अनार्यसम्बन्धाद्वरमार्यशत्रुता ॥४८६॥ निहन्ति दुर्वचनं कुलम् ॥४८७॥ न पुत्रसंस्पर्शात् परं सुखम् ॥ ४८८ ॥


चाहिए ॥ ४६५ ॥ विद्वानों के सामने ब्रह्म की चर्चा करनी चाहिए ॥ ४६६ ॥ अकारण दूसरे के घर में न जाना चाहिए ॥ ४६७ ॥ जान-बूझकर भी लोग अपराध ही करते हैं ॥ ४६८ ॥

लोकव्यवहार शास्त्रानुकूल होना चाहिए ॥ ४६९ ॥ शास्त्रज्ञान न होने पर श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण का अनुगमन करना चाहिए ॥ ४७० ॥ सदाचार से बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है ॥ ४७१ ॥

गुप्तचरों के द्वारा राजा दूर की वस्तु को देख लेता है ॥ ४७२ ॥ लोक, परम्परा का अनुगमन करता है ॥ ४७३ ॥

जिसके द्वारा जीविकोपार्जन होता है उसकी निन्दा न करनी चाहिए ॥ ४७४ ॥ इन्द्रियनिग्रह तप का सार है ॥ ४७५ ॥

स्त्री के बन्धन से छूटना बड़ा दुष्कर है ॥ ४७६ ॥ स्त्री समस्त अशुभों की जन्म-दात्री है ॥ ४७७ ॥

स्त्री, पुरुष की परीक्षा नहीं कर सकती ॥ ४७८ ॥ स्त्री का मन क्षण-क्षण बदलता रहता है ॥ ४७९ ॥ अशुभ कर्मों को न चाहने वाले लोग स्त्रियों में आसक्त नहीं होते ॥ ४८० ॥

वेदत्रयी ( ऋक्, यजु, साम ) को जानने वाला ही यज्ञ के फल को जानता है ॥ ४८१ ॥ स्वर्गप्राप्ति स्थायी नहीं होती, क्योंकि उसकी अवधि तब तक होती है, जब तक पुण्य का फल शेष रहता है ॥ ४८२ ॥ स्वर्गपतन से बढ़कर दुःख नहीं है ॥ ४८३ ॥ शरीर त्याग करके जीव इन्द्रासन को नहीं चाहता ॥ ४८४ ॥ समस्त दुःखों की औषधि मोक्ष है ॥ ४८५ ॥

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