भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७९७

विवादे धर्ममनुस्मरेत् ॥४८९॥ निशान्ते कार्यं चिन्तयेत् ॥४९०॥ प्रदोषे न संयोगः कर्तव्यः ॥४९१॥ उपस्थितविनाशो दुर्नयं मन्यते ॥४९२॥ क्षीराथिनः किं करिण्या ॥४९३॥ न दानसमं वश्यम् ॥४९४॥ परायत्तेषूत्कण्ठां न कुर्यात् ॥४९५॥ असत्समृद्धिरसद्भिरेव भुज्यते ॥४९६॥ निम्बफलं काकैरेव भुज्यते ॥४९७॥ नाम्भोधिस्तृष्णामपोहति ॥४९८॥

बालुका अपि स्वगुणमाश्रयन्ते ॥४९९॥ सन्तोऽसत्सु न रमन्ते ॥५००॥ हंसः प्रेतवने न रमते ॥५०१॥

अर्थार्थं प्रवर्तते लोकः ॥५०२॥ आशया बध्यते लोकः ॥५०३॥ न चाशापरैः श्रीः सह तिष्ठति ॥५०४॥ आशापरे न धैर्यम् ॥५०५॥

दैन्यान्मरणमुत्तमम् ॥५०६॥ आशा लज्जां व्यपोहति ॥५०७॥

न मात्रा सह वासः कर्तव्यः ॥५०८॥ आत्मा न स्तोतव्यः ॥५०९॥ न दिवा स्वप्नं कुर्यात् ॥५१०॥ न चासन्नमपि पश्यत्यैश्वर्यान्धो न श्रृणोतीष्टं वाक्यम् ॥५११॥


अनार्य व्यक्ति की मित्रता से आर्यव्यक्ति की शत्रुता अच्छी है ॥४८६॥ दुर्वाणि सारे कुल को नष्ट कर देती है ॥४८७॥ पुत्र के आलिंगन से बढ़कर कोई सुख नहीं है ॥४८८॥

विवाद के समय धर्म के अनुसार कार्य करना चाहिए ॥४८९॥ नित्य प्रातः-काल अपने (दिन के) कार्यों पर विचार करना चाहिए ॥४९०॥ संध्याकाल में संभोग वर्जित है ॥४९१॥ जिसका विनाशकाल निकट होता है वह अन्याय पर उतर आता है ॥४९२॥ दूध चाहने वाले को हथिनो की आवश्यकता नहीं होती ॥४९३॥ दान के समान कोई वशीकरण नहीं ॥४९४॥ परायी वस्तु की इच्छा न करनी चाहिए ॥४९५॥ दुर्जनों की समृद्धि को दुर्जन ही भोगते हैं ॥४९६॥ नीम के फल को कौवे ही खाते हैं ॥४९७॥ समुद्र प्यास नहीं बुझाता ॥४९८॥

बालू भी अपने गुण का अनुसरण करती है ॥४९९॥ भले लोग बुरे लोगों से आनन्दित नहीं होते ॥५००॥ हंस श्मशान में रहना पसन्द नहीं करते ॥५०१॥

सारा संसार धन के पीछे दौड़ता है ॥५०२॥ सभी सांसारिक प्राणी आशा के बन्धन से बँधे है ॥५०३॥ आशा में निमग्न पुरुष को लक्ष्मी नहीं मिलती ॥५०४॥ आशावान् मनुष्य धैर्यशाली नहीं होता ॥५०५॥

दरिद्र होकर जीवित रहने की अपेक्षा मर जाना ही अच्छा है ॥५०६॥ आशा, लज्जा को मिटा देती है ॥५०७॥

एकान्त में माता के भी साथ न रहे ॥५०८॥ अपने मुख से अपनी प्रशंसा न करनी चाहिए ॥५०९॥ दिन में सोना न चाहिए ॥५१०॥ ऐश्वर्य में अन्धा मनुष्य न तो अपने समीप की वस्तु को देखता है और न हितकारी बात को सुनता है ॥५११॥