कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
स्त्रीणां न भर्तुः परं दैवतम् ॥ ५१२ ॥ तदनुवर्तनमुभयसुखम् ॥५१३॥ अतिथिमभ्यागतं पूजयेद् यथाविधिः ॥ ५१४ ॥ नास्ति हव्यस्य व्याघातः ॥ ५१५ ॥ शत्रुर्भाववत् प्रतिभाति ॥ ५१६ ॥ मृगतृष्णा जलवद् भाति ॥ ५१७ ॥ दुर्मेधसामसच्छास्त्रं मोहयति ॥ ५१८ ॥ सत्संगः स्वर्गवासः ॥ ५१९ ॥ आर्यः स्वमिव परं मन्यते ॥ ५२० ॥ रूपानुवर्ती गुणः ॥५२१॥ यत्र सुखेन वर्तते तदेव स्थानम् ॥ ५२२ ॥ विश्वासघातिनो न निष्कृतिः ॥ ५२३ ॥ दैवयत्तं न शोचेत् ॥ ५२४ ॥ आश्रितदुःखमात्मन इव मन्यते साधुः ॥ ५२५ ॥ हृद्गतमाच्छाद्यान्यद् वदत्यनार्यः ॥ ५२६ ॥ बुद्धिहीनः पिशाचतुल्यः ॥ ५२७ ॥ असहायः पथि न गच्छेत् ॥ ५२८ ॥ पुत्रो न स्तोतव्यः ॥ ५२९ ॥ स्वामी स्तोतव्योऽनुजीविभिः ॥ ५३० ॥ धर्मकृत्येष्वपि स्वामिन एव घोषयेत् ॥ ५३१ ॥ राजाज्ञां नातिलङ्घयेत् ॥ ५३२ ॥ यथाऽऽज्ञप्तं तथा कुर्यात् ॥ ५३३ ॥ नास्ति बुद्धिमतां शत्रुः ॥ ५३४ ॥ आत्मच्छिद्रं न प्रकाशयेत् ॥५३५॥
स्त्री के लिए पति बढ़कर कोई देवता नहीं है ॥ ५१२ ॥ पति के इच्छानुसार चलने वाली स्त्री को इहलोक और परलोक, दोनों का सुख प्राप्त होता है ॥ ५१३ ॥ अपने यहाँ आये हुए अतिथि का विधिवत् सत्कार करना चाहिए ॥ ५१४ ॥ देवताओं के निमित्त से दिया हुआ द्रव्य कभी भी नष्ट नहीं होता ॥ ५१५ ॥ शत्रु भी कभी मित्र के समान दिखायी देता है ॥ ५१६ ॥ तृष्णा के कारण मृग चमकती हुई बालू को जल समझ बैठता है ॥ ५१७ ॥ दुर्बुद्धि मनुष्य को असत् शास्त्र मोह लेते हैं ॥ ५१८ ॥ सत्संग ही स्वर्गवास है ॥ ५१९ ॥ श्रेष्ठ व्यक्ति सबको अपने ही समान समझता है ॥ ५२० ॥ रूप के अनुसार ही मनुष्य में गुण होता है ॥ ५२१ ॥ जहाँ सुख से रहा जा सके, वही उत्तम स्थान है ॥ ५२२ ॥
विश्वासघाती मनुष्य के उद्धार के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं ॥ ५२३ ॥ जो बात दैव के अधीन है उसके सम्बन्ध में सोच-विचार न करना चाहिए ॥ ५२४ ॥ सज्जन व्यक्ति आश्रितों के दुःख को अपना ही दुःख समझते हैं ॥ ५२५ ॥ हृदय की बात को छिपाकर बनावटी बातें करने वाला अनार्य है ॥ ५२६ ॥ बुद्धिहीन मनुष्य पिशाच के समान है ॥ ५२७ ॥ बिना साथ के यात्रा न करनी चाहिए ॥ ५२८ ॥ अपने पुत्र की प्रशंसा न करनी चाहिए ॥ ५२९ ॥
सेवक लोगों को चाहिए कि वे अपने स्वामी का गुणगान करते रहें ॥ ५३० ॥ अपने धर्मकार्यों में भी वे स्वामी का गुणगान करते रहें ॥५३१॥ राजा की आज्ञा का कभी भी उल्लंघन न करना चाहिए ॥ ५३२ ॥ उसकी जैसी आज्ञा हो तदनुसार करना चाहिए ॥ ५३३ ॥
बुद्धिमान् मनुष्य का कोई शत्रु नहीं है ॥ ५३४ ॥ अपनी गुप्त बात किसी पर