भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७९३

तिलमात्रमप्युपकारं शैलवन्मन्यते साधुः ॥ ३९८ ॥ उपकारोऽनार्येष्व- कर्तव्यः ॥ ३९९ ॥ प्रत्युपकारभयादनार्यः शत्रुर्भवति ॥ ४०० ॥ स्वल्प- मप्युपकारकृते प्रत्युपकारं कर्तुमार्यो न स्वपिति ॥ ४०१ ॥ न कदाऽपि देवताऽवमन्तव्या ॥ ४०२ ॥

न चक्षुषः समं ज्योतिरस्ति ॥४०३॥ चक्षुर्हि शरीरिणां नेता ॥४०४॥ अपचक्षुषः किं शरीरेण ॥ ४०५ ॥

नाप्सु मूत्रं कुर्यात् ॥ ४०६ ॥ न नग्नो जलं प्रविशेत् ॥ ४०७ ॥ यथा शरीरं तथा ज्ञानम् ॥ ४०८ ॥ यथा बुद्धिस्तथा विभवः ॥ ४०९ ॥ अग्ना- वग्निं न निक्षिपेत् ॥ ४१० ॥ तपस्विनः पूजनीयाः ॥ ४११ ॥ परदारात्न गच्छेत् ॥ ४१२ ॥ अन्नदानं भ्रूणहत्यामपि मार्ष्टि ॥ ४१३ ॥ न वेदबाह्यो धर्मः ॥ ४१४ ॥ कदाचिदपि धर्मं निषेवेत् ॥ ४१५ ॥

स्वर्गं नयति सूनृतम् ॥ ४१६ ॥ नास्ति सत्यात् परं तपः ॥ ४१७ ॥ सत्यं स्वर्गस्य साधनम् ॥ ४१८ ॥ सत्येन धार्यते लोकः ॥ ४१९ ॥ सत्याद् देवो वर्षति ॥ ४२० ॥


प्रत्येक देहधारी व्यक्ति के लिए सुख और दुःख लगे रहते हैं ॥ ३९६ ॥ जैसे बछड़ा माता के पास जा पहुँचता है वैसे ही सुख और दुःख अपने कर्ता के पास जा पहुँचते हैं ॥ ३९७ ॥

सज्जन पुरुष तिलतुल्य उपकार को पहाड़ जैसा मानता है ॥ ३९८ ॥ दुष्ट पुरुष का उपकार न करना चाहिए ॥ ३९९ ॥ क्योंकि प्रत्युपकारभय से दुष्ट पुरुष शत्रु बन जाता है ॥ ४०० ॥ सज्जन पुरुष थोड़े भी उपकार का महान् प्रत्युपकार करने के लिए उद्यत रहता है ॥ ४०१ ॥ देवता का कभी भी अपमान न करना चाहिए ॥ ४०२ ॥

आंख के समान दूसरी ज्योति नहीं है ॥ ४०३ ॥ नेत्र, देहधारियों का नेता है ॥ ४०४ ॥ नेत्रहीन व्यक्ति का शरीर धारण करना व्यर्थ है ॥ ४०५ ॥

जल में मूत्रत्याग नहीं करना चाहिए ॥ ४०६ ॥ नग्न होकर पानी में न उतरना चाहिए ॥ ४०७ ॥ जैसा शरीर होता है, उसमें वैसा ही ज्ञान रहता है ॥ ४०८ ॥ जैसी बुद्धि होती है, वैसा ही वैभव प्राप्त होता है ॥ ४०९ ॥ आग में आग न डालनी चाहिए ( तेजस्वी पर क्रोध न करना चाहिए ) ॥ ४१० ॥ तपस्वियों की सदा पूजा करनी चाहिए ॥ ४११ ॥ पराई स्त्री के साथ समागम न करना चाहिए ॥ ४१२ ॥ अन्नदान से भ्रूण ( गर्भस्थ शिशु ) हत्या का भी पाप मिट जाता है ॥ ४१३ ॥ वेद-स्वीकृत धर्म ही वास्तविक धर्म है ॥ ४१४ ॥ जिस तरह भी हो, धर्म का आचरण करना चाहिए ॥ ४१५ ॥

मीठी और सच्ची वाणी मनुष्य को स्वर्ग ले जाती है ॥ ४१६ ॥ सत्य से बढ़कर कोई तप नहीं है ॥ ४१७ ॥ सत्य ही स्वर्ग का साधन है ॥ ४१८ ॥ सत्य पर ही संसार टिका है ॥ ४१९ ॥ सत्य से ही इन्द्र जल बरसाता है ॥ ४२० ॥