भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 876, कुल 918 में से

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पृष्ठ 876

७९२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र

दहति राजवह्निः ॥ ३७३ ॥ रिक्तहस्तो न राजानमभिगच्छेत् ॥ ३७४ ॥ गुरुं च दैवं च ॥ ३७५ ॥ कुटुम्बिनो भेतव्यम् ॥ ३७६ ॥ गन्तव्यं च सदा राजकुलम् ॥ ३७७ ॥ राजपुरुषैः सम्बन्धं कुर्यात् ॥ ३७८ ॥ राजदासी न सेवितव्या ॥ ३७९ ॥ न चक्षुषाऽपि राजानं निरीक्षेत् ॥ ३८० ॥

पुत्रे गुणवति कुटुम्बिनः स्वर्गः ॥ ३८१ ॥ पुत्रा विद्यानां पारं गमयितव्याः ॥ ३८२ ॥ जनपदार्थं ग्रामं त्यजेत् ॥ ३८३ ॥ ग्रामार्थं कुटुम्बस्त्यज्यते ॥ ३८४ ॥ अतिलाभः पुत्रलाभः ॥ ३८५ ॥ दुर्गतेः पितरौ रक्षति स पुत्रः ॥३८६॥ कुलं प्रख्यापयति पुत्रः ॥३८७॥ नानपत्यस्य स्वर्गः ॥३८८॥

या प्रसूते सा भार्या ॥३८९॥ तीर्थसमवाये पुत्रवतीमनुगच्छेत् ॥३९०॥ सतीर्थगमनाद् ब्रह्मचर्यं नश्यति ॥ ३९१ ॥ न परक्षेत्रे बीजं विनिक्षिपेत् ॥ ३९२ ॥ पुत्रार्था हि स्त्रियः ॥ ३९३ ॥ स्वदासीपरिग्रहो हि दासभावः ॥ ३९४ ॥

उपस्थितविनाशः पथ्यवाक्यं न शृणोति ॥ ३९५ ॥ नास्ति देहिनां सुखदुःखाभावः ॥ ३९६ ॥ मातरमिव वत्साः सुखदुःखानि कर्तारमेवानुगच्छन्ति ॥ ३९७ ॥


॥ ३७१ ॥ राजा से बड़ा कोई देवता नहीं है ॥ ३७२ ॥ राजवह्नि दूर से ही भस्म कर डालती है ॥ ३७३ ॥ राजा, देवता और गुरु के पास खाली हाथ न जाना चाहिए ॥ ३७४-३७५ ॥ कुटुम्ब के व्यक्ति से सदा डरना चाहिए ॥ ३७६ ॥ राज-दरबार में हमेशा जाना चाहिए ॥ ३७७ ॥ राजपुरुषों से सम्बन्ध बनाये रखना चाहिए ॥ ३७८ ॥ राजदासी से किसी तरह का सम्बन्ध न रखना चाहिए ॥३७९॥ राजा की ओर आँख उठाकर न देखना चाहिए ॥ ३८० ॥

गुणवान् पुत्र से परिवार स्वर्ग बन जाता है ॥ ३८१ ॥ पुत्र को सब विद्याओं में पारंगत बनाना चाहिए ॥ ३८२ ॥ जनपद के हित के आगे ग्रामहित को त्याग देना चाहिए ॥ ३८३ ॥ ग्रामहित के लिए परिवार-हित की उपेक्षा कर देनी चाहिए ॥ ३८४ ॥ पुत्रलाभ सर्वोच्च लाभ है ॥ ३८५ ॥ दुर्गति से माता-पिता की रक्षा करने वाला पुत्र ही होता है ॥३८६॥ सुपुत्र से ही कुल की ख्याति होती है ॥३८७॥ पुत्रहीन व्यक्ति को स्वर्ग नहीं मिलता ॥ ३८८ ॥

सन्तान को जन्म देने वाली स्त्री ही भार्या है ॥ ३८९ ॥ अनेक स्त्रियों के एक साथ ऋतुमती होने पर उस स्त्री के पास जाना चाहिए, जो पहले पुत्रवती हो ॥३९०॥ रजस्वला स्त्री के साथ संभोग करने से ब्रह्मचर्य नष्ट होता है ॥ ३९१ ॥ परस्त्री के गर्भ में वीर्य का निक्षेप नहीं करना चाहिए ॥ ३९२ ॥ पुत्र-प्राप्ति के लिए ही स्त्रियों का वरण किया जाता है ॥ ३९३ ॥ अपनी दासी के साथ परिग्रह करना अपने को दास बना लेना है ॥ ३९४ ॥

जिसका विनाश निकट होता है, वह हित की बात को नहीं सुनता ॥ ३९५ ॥

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