भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७९१

अतिसंगो दोषमुत्पादयति ॥ ३४९ ॥ सर्वं जयत्यक्रोधः ॥ ३५० ॥ यद्यपकारिणि कोपः कोषे कोप एव कर्तव्यः॥ ३५१ ॥ मतिमत्सु मूर्खमित्र-गुरुवल्लभेषु विवादो न कर्तव्यः ॥ ३५२ ॥ नास्त्यपिशाचमैश्वर्यम् ॥ ३५३ ॥ नास्ति धनवतां शुभकर्मसु श्रमः ॥ ३५४ ॥ नास्ति गतिश्रमो यानवताम् ॥ ३५५ ॥ अलौहमयं निगडं कलत्रम् ॥ ३५६ ॥ यो यस्मिन् कुशलः स तस्मिन् योक्तव्यः ॥ ३५७ ॥ दुष्टकलत्रं मनस्विनां शरीरकर्शनम् ॥ ३५८ ॥ अप्रमत्तो दारान्निरोक्षेत ॥ ३५९॥ स्त्रीषु किञ्चिदपि न विश्वसेत् ॥ ३६० ॥ न समाधिः स्त्रीषु लोकज्ञता च ॥ ३६१ ॥ गुरूणां माता गरीयसी ॥ ३६२ ॥ सर्वावस्थासु माता भर्तव्या ॥ ३६३ ॥ वैदुष्यमलंकारेणाच्छाद्यते ॥ ३६४ ॥ स्त्रीणां भूषणं लज्जा ॥ ३६५ ॥ विप्राणां भूषणं वेदः ॥ ३६६ ॥ सर्वेषां भूषणं धर्मः ॥ ३६७ ॥ भूषणानां भूषणं सविनया विद्या ॥ ३६८ ॥ अनुपद्रवं देशमावसेत् ॥ ३६९ ॥ साधुजनबहुलो देशः ॥ ३७० ॥ राज्ञो भेतव्यं सार्वकालम् ॥ ३७१ ॥ न राज्ञः परं दैवतम् ॥ ३७२ ॥ सूदूरमपि

अत्यधिक साथ से बुराई पैदा हो जाती है ॥ ३४९ ॥ क्रोध न करने वाले व्यक्ति की सर्वत्र विजय होती है ॥ ३५० ॥ यदि अपकारी व्यक्ति पर क्रोध करना हो तो पहले क्रोध पर ही क्रोध करना चाहिए ॥ ३५१ ॥ बुद्धिमान् मनुष्य, मूर्ख, मित्र, गुरु और प्रियजनों के साथ व्यर्थ का विवाद न करें ॥ ३५२ ॥

ऐश्वर्य में पैशाचिकता होती है ॥ ३५३ ॥ धनिकों को शुभकार्य करने में श्रम नहीं करना पड़ता ॥ ३५४ ॥ सवारी पर चलने वाले को थकावट का अनुभव नहीं होता ॥ ३५५ ॥ स्त्री बिना लोहे की बेड़ी है ॥ ३५६ ॥

जो मनुष्य जिस कार्य में निपुण हो, उसको उसी काम में नियुक्त करना चाहिए ॥ ३५७ ॥ दुष्ट स्त्री मनस्वी पुरुष के शरीर को कृश बना देती है ॥ ३५८ ॥ अप्रमत्त होकर सदा स्त्री का निरीक्षण करना चाहिए ॥ ३५९ ॥ स्त्रियों पर जरा भी विश्वास न करना चाहिए ॥ ३६० ॥ स्त्रियों में न विवेक होता है और न लोक-व्यवहार का ज्ञान ॥ ३६१ ॥ गुरुजनों में माता का स्थान सर्वोच्च होता है ॥ ३६२ ॥ अतएव प्रत्येक अवस्था में माता का भरण-पोषण करना चाहिए ॥ ३६३ ॥

अलंकार ( बनावटीपन ), पाण्डित्य को ढांप देता है ॥ ३६४ ॥ स्त्री का आभूषण लज्जा है ॥ ३६५ ॥ ब्राह्मणों का आभूषण वेद ( ज्ञान ) है ॥ ३६६ ॥ सब लोगों का आभूषण धर्म है ॥ ३६७ ॥ समस्त आभूषणों का आभूषण विनयसंपन्न विद्या है ॥ ३६८ ॥

जिस देश में उपद्रव न हो, वहाँ बसना चाहिए ॥ ३६९ ॥ जिस देश में सज्जन पुरुषों का निवास हो वहीं बसना चाहिए ॥ ३७० ॥ राजा से सदा डरना चाहिए