कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७९१
अतिसंगो दोषमुत्पादयति ॥ ३४९ ॥ सर्वं जयत्यक्रोधः ॥ ३५० ॥ यद्यपकारिणि कोपः कोषे कोप एव कर्तव्यः॥ ३५१ ॥ मतिमत्सु मूर्खमित्र-गुरुवल्लभेषु विवादो न कर्तव्यः ॥ ३५२ ॥ नास्त्यपिशाचमैश्वर्यम् ॥ ३५३ ॥ नास्ति धनवतां शुभकर्मसु श्रमः ॥ ३५४ ॥ नास्ति गतिश्रमो यानवताम् ॥ ३५५ ॥ अलौहमयं निगडं कलत्रम् ॥ ३५६ ॥ यो यस्मिन् कुशलः स तस्मिन् योक्तव्यः ॥ ३५७ ॥ दुष्टकलत्रं मनस्विनां शरीरकर्शनम् ॥ ३५८ ॥ अप्रमत्तो दारान्निरोक्षेत ॥ ३५९॥ स्त्रीषु किञ्चिदपि न विश्वसेत् ॥ ३६० ॥ न समाधिः स्त्रीषु लोकज्ञता च ॥ ३६१ ॥ गुरूणां माता गरीयसी ॥ ३६२ ॥ सर्वावस्थासु माता भर्तव्या ॥ ३६३ ॥ वैदुष्यमलंकारेणाच्छाद्यते ॥ ३६४ ॥ स्त्रीणां भूषणं लज्जा ॥ ३६५ ॥ विप्राणां भूषणं वेदः ॥ ३६६ ॥ सर्वेषां भूषणं धर्मः ॥ ३६७ ॥ भूषणानां भूषणं सविनया विद्या ॥ ३६८ ॥ अनुपद्रवं देशमावसेत् ॥ ३६९ ॥ साधुजनबहुलो देशः ॥ ३७० ॥ राज्ञो भेतव्यं सार्वकालम् ॥ ३७१ ॥ न राज्ञः परं दैवतम् ॥ ३७२ ॥ सूदूरमपि
अत्यधिक साथ से बुराई पैदा हो जाती है ॥ ३४९ ॥ क्रोध न करने वाले व्यक्ति की सर्वत्र विजय होती है ॥ ३५० ॥ यदि अपकारी व्यक्ति पर क्रोध करना हो तो पहले क्रोध पर ही क्रोध करना चाहिए ॥ ३५१ ॥ बुद्धिमान् मनुष्य, मूर्ख, मित्र, गुरु और प्रियजनों के साथ व्यर्थ का विवाद न करें ॥ ३५२ ॥
ऐश्वर्य में पैशाचिकता होती है ॥ ३५३ ॥ धनिकों को शुभकार्य करने में श्रम नहीं करना पड़ता ॥ ३५४ ॥ सवारी पर चलने वाले को थकावट का अनुभव नहीं होता ॥ ३५५ ॥ स्त्री बिना लोहे की बेड़ी है ॥ ३५६ ॥
जो मनुष्य जिस कार्य में निपुण हो, उसको उसी काम में नियुक्त करना चाहिए ॥ ३५७ ॥ दुष्ट स्त्री मनस्वी पुरुष के शरीर को कृश बना देती है ॥ ३५८ ॥ अप्रमत्त होकर सदा स्त्री का निरीक्षण करना चाहिए ॥ ३५९ ॥ स्त्रियों पर जरा भी विश्वास न करना चाहिए ॥ ३६० ॥ स्त्रियों में न विवेक होता है और न लोक-व्यवहार का ज्ञान ॥ ३६१ ॥ गुरुजनों में माता का स्थान सर्वोच्च होता है ॥ ३६२ ॥ अतएव प्रत्येक अवस्था में माता का भरण-पोषण करना चाहिए ॥ ३६३ ॥
अलंकार ( बनावटीपन ), पाण्डित्य को ढांप देता है ॥ ३६४ ॥ स्त्री का आभूषण लज्जा है ॥ ३६५ ॥ ब्राह्मणों का आभूषण वेद ( ज्ञान ) है ॥ ३६६ ॥ सब लोगों का आभूषण धर्म है ॥ ३६७ ॥ समस्त आभूषणों का आभूषण विनयसंपन्न विद्या है ॥ ३६८ ॥
जिस देश में उपद्रव न हो, वहाँ बसना चाहिए ॥ ३६९ ॥ जिस देश में सज्जन पुरुषों का निवास हो वहीं बसना चाहिए ॥ ३७० ॥ राजा से सदा डरना चाहिए
७९२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
दहति राजवह्निः ॥ ३७३ ॥ रिक्तहस्तो न राजानमभिगच्छेत् ॥ ३७४ ॥ गुरुं च दैवं च ॥ ३७५ ॥ कुटुम्बिनो भेतव्यम् ॥ ३७६ ॥ गन्तव्यं च सदा राजकुलम् ॥ ३७७ ॥ राजपुरुषैः सम्बन्धं कुर्यात् ॥ ३७८ ॥ राजदासी न सेवितव्या ॥ ३७९ ॥ न चक्षुषाऽपि राजानं निरीक्षेत् ॥ ३८० ॥
पुत्रे गुणवति कुटुम्बिनः स्वर्गः ॥ ३८१ ॥ पुत्रा विद्यानां पारं गमयितव्याः ॥ ३८२ ॥ जनपदार्थं ग्रामं त्यजेत् ॥ ३८३ ॥ ग्रामार्थं कुटुम्बस्त्यज्यते ॥ ३८४ ॥ अतिलाभः पुत्रलाभः ॥ ३८५ ॥ दुर्गतेः पितरौ रक्षति स पुत्रः ॥३८६॥ कुलं प्रख्यापयति पुत्रः ॥३८७॥ नानपत्यस्य स्वर्गः ॥३८८॥
या प्रसूते सा भार्या ॥३८९॥ तीर्थसमवाये पुत्रवतीमनुगच्छेत् ॥३९०॥ सतीर्थगमनाद् ब्रह्मचर्यं नश्यति ॥ ३९१ ॥ न परक्षेत्रे बीजं विनिक्षिपेत् ॥ ३९२ ॥ पुत्रार्था हि स्त्रियः ॥ ३९३ ॥ स्वदासीपरिग्रहो हि दासभावः ॥ ३९४ ॥
उपस्थितविनाशः पथ्यवाक्यं न शृणोति ॥ ३९५ ॥ नास्ति देहिनां सुखदुःखाभावः ॥ ३९६ ॥ मातरमिव वत्साः सुखदुःखानि कर्तारमेवानुगच्छन्ति ॥ ३९७ ॥
॥ ३७१ ॥ राजा से बड़ा कोई देवता नहीं है ॥ ३७२ ॥ राजवह्नि दूर से ही भस्म कर डालती है ॥ ३७३ ॥ राजा, देवता और गुरु के पास खाली हाथ न जाना चाहिए ॥ ३७४-३७५ ॥ कुटुम्ब के व्यक्ति से सदा डरना चाहिए ॥ ३७६ ॥ राज-दरबार में हमेशा जाना चाहिए ॥ ३७७ ॥ राजपुरुषों से सम्बन्ध बनाये रखना चाहिए ॥ ३७८ ॥ राजदासी से किसी तरह का सम्बन्ध न रखना चाहिए ॥३७९॥ राजा की ओर आँख उठाकर न देखना चाहिए ॥ ३८० ॥
गुणवान् पुत्र से परिवार स्वर्ग बन जाता है ॥ ३८१ ॥ पुत्र को सब विद्याओं में पारंगत बनाना चाहिए ॥ ३८२ ॥ जनपद के हित के आगे ग्रामहित को त्याग देना चाहिए ॥ ३८३ ॥ ग्रामहित के लिए परिवार-हित की उपेक्षा कर देनी चाहिए ॥ ३८४ ॥ पुत्रलाभ सर्वोच्च लाभ है ॥ ३८५ ॥ दुर्गति से माता-पिता की रक्षा करने वाला पुत्र ही होता है ॥३८६॥ सुपुत्र से ही कुल की ख्याति होती है ॥३८७॥ पुत्रहीन व्यक्ति को स्वर्ग नहीं मिलता ॥ ३८८ ॥
सन्तान को जन्म देने वाली स्त्री ही भार्या है ॥ ३८९ ॥ अनेक स्त्रियों के एक साथ ऋतुमती होने पर उस स्त्री के पास जाना चाहिए, जो पहले पुत्रवती हो ॥३९०॥ रजस्वला स्त्री के साथ संभोग करने से ब्रह्मचर्य नष्ट होता है ॥ ३९१ ॥ परस्त्री के गर्भ में वीर्य का निक्षेप नहीं करना चाहिए ॥ ३९२ ॥ पुत्र-प्राप्ति के लिए ही स्त्रियों का वरण किया जाता है ॥ ३९३ ॥ अपनी दासी के साथ परिग्रह करना अपने को दास बना लेना है ॥ ३९४ ॥
जिसका विनाश निकट होता है, वह हित की बात को नहीं सुनता ॥ ३९५ ॥
चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७९३
तिलमात्रमप्युपकारं शैलवन्मन्यते साधुः ॥ ३९८ ॥ उपकारोऽनार्येष्व- कर्तव्यः ॥ ३९९ ॥ प्रत्युपकारभयादनार्यः शत्रुर्भवति ॥ ४०० ॥ स्वल्प- मप्युपकारकृते प्रत्युपकारं कर्तुमार्यो न स्वपिति ॥ ४०१ ॥ न कदाऽपि देवताऽवमन्तव्या ॥ ४०२ ॥
न चक्षुषः समं ज्योतिरस्ति ॥४०३॥ चक्षुर्हि शरीरिणां नेता ॥४०४॥ अपचक्षुषः किं शरीरेण ॥ ४०५ ॥
नाप्सु मूत्रं कुर्यात् ॥ ४०६ ॥ न नग्नो जलं प्रविशेत् ॥ ४०७ ॥ यथा शरीरं तथा ज्ञानम् ॥ ४०८ ॥ यथा बुद्धिस्तथा विभवः ॥ ४०९ ॥ अग्ना- वग्निं न निक्षिपेत् ॥ ४१० ॥ तपस्विनः पूजनीयाः ॥ ४११ ॥ परदारात्न गच्छेत् ॥ ४१२ ॥ अन्नदानं भ्रूणहत्यामपि मार्ष्टि ॥ ४१३ ॥ न वेदबाह्यो धर्मः ॥ ४१४ ॥ कदाचिदपि धर्मं निषेवेत् ॥ ४१५ ॥
स्वर्गं नयति सूनृतम् ॥ ४१६ ॥ नास्ति सत्यात् परं तपः ॥ ४१७ ॥ सत्यं स्वर्गस्य साधनम् ॥ ४१८ ॥ सत्येन धार्यते लोकः ॥ ४१९ ॥ सत्याद् देवो वर्षति ॥ ४२० ॥
प्रत्येक देहधारी व्यक्ति के लिए सुख और दुःख लगे रहते हैं ॥ ३९६ ॥ जैसे बछड़ा माता के पास जा पहुँचता है वैसे ही सुख और दुःख अपने कर्ता के पास जा पहुँचते हैं ॥ ३९७ ॥
सज्जन पुरुष तिलतुल्य उपकार को पहाड़ जैसा मानता है ॥ ३९८ ॥ दुष्ट पुरुष का उपकार न करना चाहिए ॥ ३९९ ॥ क्योंकि प्रत्युपकारभय से दुष्ट पुरुष शत्रु बन जाता है ॥ ४०० ॥ सज्जन पुरुष थोड़े भी उपकार का महान् प्रत्युपकार करने के लिए उद्यत रहता है ॥ ४०१ ॥ देवता का कभी भी अपमान न करना चाहिए ॥ ४०२ ॥
आंख के समान दूसरी ज्योति नहीं है ॥ ४०३ ॥ नेत्र, देहधारियों का नेता है ॥ ४०४ ॥ नेत्रहीन व्यक्ति का शरीर धारण करना व्यर्थ है ॥ ४०५ ॥
जल में मूत्रत्याग नहीं करना चाहिए ॥ ४०६ ॥ नग्न होकर पानी में न उतरना चाहिए ॥ ४०७ ॥ जैसा शरीर होता है, उसमें वैसा ही ज्ञान रहता है ॥ ४०८ ॥ जैसी बुद्धि होती है, वैसा ही वैभव प्राप्त होता है ॥ ४०९ ॥ आग में आग न डालनी चाहिए ( तेजस्वी पर क्रोध न करना चाहिए ) ॥ ४१० ॥ तपस्वियों की सदा पूजा करनी चाहिए ॥ ४११ ॥ पराई स्त्री के साथ समागम न करना चाहिए ॥ ४१२ ॥ अन्नदान से भ्रूण ( गर्भस्थ शिशु ) हत्या का भी पाप मिट जाता है ॥ ४१३ ॥ वेद-स्वीकृत धर्म ही वास्तविक धर्म है ॥ ४१४ ॥ जिस तरह भी हो, धर्म का आचरण करना चाहिए ॥ ४१५ ॥
मीठी और सच्ची वाणी मनुष्य को स्वर्ग ले जाती है ॥ ४१६ ॥ सत्य से बढ़कर कोई तप नहीं है ॥ ४१७ ॥ सत्य ही स्वर्ग का साधन है ॥ ४१८ ॥ सत्य पर ही संसार टिका है ॥ ४१९ ॥ सत्य से ही इन्द्र जल बरसाता है ॥ ४२० ॥
७९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
नानृतात् पातकं परम् ॥ ४२१ ॥ न मीमांस्या गुरवः ॥४२२॥ खलत्वं नोपेयात् ॥ ४२३ ॥ नास्ति खलस्य मित्रम् ॥ ४२४ ॥ लोकयात्रा दरिद्रं बाधते ॥ ४२५ ॥ अतिशूरो दानशूरः ॥ ४२६ ॥ गुरुदेवब्राह्मणेषु भक्तिर्भूषणम् ॥४२७॥ सर्वस्य भूषणं विनयः ॥ ४२८ ॥ अकुलीनोऽपि विनीतः कुलीनाद् विशिष्टः ॥ ४२९ ॥ आचारादायुर्वर्धते कीर्तिश्च ॥ ४३० ॥ प्रियमप्यहितं न वक्तव्यम् ॥ ४३१ ॥ बहुजनविरुद्धमेकं नानुवर्तेत ॥ ४३२ ॥ न दुर्जनेषु भागधेयः कर्तव्यः ॥ ४३३ ॥ न कृतार्थेषु नीचेषु सम्बन्धः ॥ ४३४ ॥ ऋणशत्रुव्याधिश्वशेषः कर्तव्यः ॥ ४३५ ॥ भृत्यानुवर्तनं पुरुषस्य रसायनम् ॥ ४३६ ॥ नार्थिष्ववज्ञा कार्या ॥ ४३७ ॥ दुष्करं कर्म कारयित्वा कर्तारमवमन्यते नीचः ॥ ४३८ ॥ नाकृतज्ञस्य नरकान्निवर्तनम् ॥ ४३९ ॥ जिह्वायत्तौ वृद्धिविनाशौ ॥ ४४० ॥ विषामृतयोराकरी जिह्वा ॥ ४४१ ॥ प्रियवादिनो न शत्रुः ॥ ४४२ ॥ स्तुता अपि देवतास्तुष्यन्ति ॥ ४४३ ॥ अनृतमपि दुर्वचनं चिरं तिष्ठति ॥ ४४४ ॥ राजद्विष्टं न च वक्तव्यम् ॥ ४४५ ॥ श्रुतिसुखात्कोकिलालापात् तुष्यन्ति ॥ ४४६ ॥
झूठ से बढ़कर कोई पाप नहीं है ॥ ४२१ ॥ गुरूजनों की आलोचना नहीं करनी चाहिए ॥ ४२२ ॥ दुष्टता को अंगीकार न करना चाहिए ॥ ४२३ ॥ दुष्ट मनुष्य का कोई मित्र नहीं होता ॥ ४२४ ॥ दरिद्र मनुष्य को जीवन-निर्वाह करना कठिन होता है ॥ ४२५ ॥
दानवीर ही सबसे बड़ा वीर है ॥ ४२६ ॥ गुरु, देवता और ब्राह्मणों में भक्ति रखना मानवता का आभूषण है ॥ ४२७ ॥ विनय सबका आभूषण है ॥ ४२८ ॥ जो कुलीन न होता हुआ भी विनीत हो वह अविनीत कुलीन की अपेक्षा बड़ा है ॥ ४२९ ॥
सदाचार से आयु और यश दोनों की वृद्धि होती है ॥ ४३० ॥ प्रिय होने पर भी अहितकर वाणी को न बोलना चाहिए ॥ ४३१ ॥ अनेक लोगों के विरोधी एक व्यक्ति का अनुगमन नहीं करना चाहिए ॥ ४३२ ॥ दुर्जन व्यक्तियों के साथ अपना भाग्य नहीं जोड़ना चाहिए ॥ ४३३ ॥ कृतार्थ (सफल) नीच पुरुष से सम्बन्ध न करना चाहिए ॥ ४३४ ॥ ऋण, शत्रु और रोग को सर्वथा समाप्त कर देना चाहिए ॥ ४३५ ॥ कल्याण मार्ग पर चलना ही मनुष्य के लिए उत्तम रसायन है ॥ ४३६ ॥
याचक से घृणा न करनी चाहिए ॥ ४३७ ॥ नीच मनुष्य दुष्कर्म कराके, कर्ता को अपमानित करता है ॥ ४३८ ॥ कृतघ्न मनुष्य के लिए नरक के अतिरिक्त कोई गति नहीं है ॥ ४३९ ॥
अपनी उन्नति और अवनति अपनी वाणी के अधीन है ॥ ४४० ॥ वाणी ही विष तथा अमृत की खान है ॥ ४४१ ॥ प्रिय वचन बोलने वाले का कोई शत्रु नहीं है
चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७९५
स्वधर्महेतुः सत्पुरुषः ॥ ४४७ ॥ नास्त्यर्थिनो गौरवम् ॥ ४४८ ॥ स्त्रीणां भूषणं सौभाग्यम् ॥ ४४९ ॥ शत्रोरपि न पातनीया वृत्तिः ॥४५०॥ अप्रयत्नोदकं क्षेत्रम् ॥ ४५१ ॥ एरण्डमवलम्ब्य कुञ्जरं न कोपयेत् ॥४५२॥ अतिप्रवृद्धा शाल्मली वारणस्तम्भो न भवति ॥ ४५३ ॥ अतिदीर्घोऽपि कर्णिकारो न मुसली ॥ ४५४ ॥ अतिदीप्तोऽपि खद्योतो न पावकः ॥४५५॥ न प्रवृद्धत्वं गुणहेतुः ॥ ४५६ ॥ सुजीर्णोऽपि पिचुमन्दो न शङ्कुलायते ॥ ४५७ ॥ यथा बीजं तथा निष्पत्तिः ॥ ४५८ ॥ यथा श्रुतं तथा बुद्धिः ॥ ४५९ ॥ यथा कुलं तथाऽऽचारः ॥ ४६० ॥ संस्कृतः पिचुमन्दः सहकारो न भवति ॥ ४६१ ॥ न चागतं सुखं त्यजेत् ॥ ४६२ ॥ स्वयमेव दुःखमधिगच्छति ॥ ४६३ ॥ रात्रिचारणं न कुर्यात् ॥ ४६४ ॥ न चार्धरात्रं स्वपेत् ॥ ४६५ ॥ तद्विद्भिङ्गुः परीक्षेत ॥ ४६६ ॥ परगृहमकारणतो न प्रविशेत् ॥ ४६७ ॥ ज्ञात्वाऽपि दोषमेव करोति लोकः ॥ ४६८ ॥
॥ ४४२ ॥ स्तुति से देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ४४३ ॥ असत्य दुर्वचन चिरकाल तक स्मरण होता रहता है ॥ ४४४ ॥ राजा से द्वेष करने वाली बात न बोलनी चाहिए ॥ ४४५ ॥ काली कोयल के भी, कानों को सुख देने वाले वचन सबको भाते हैं (कोयल के समान, कानों को सुख देने वाली वाणी का प्रयोग करना चाहिए) ॥ ४४६ ॥
स्वधर्म पर अवस्थित रहने के कारण पुरुष भी सत्यपुरुष हो जाता है ॥ ४४७ ॥ याचक का कोई गौरव नहीं होता ॥ ४४८ ॥ सुहाग स्त्री का आभूषण है ॥ ४४९ ॥ शत्रु की भी जीविका को नष्ट न करना चाहिए ॥ ४५० ॥ जहाँ बिना प्रयत्न के जल सुलभ हो वही अपना खेत है ॥ ४५१ ॥ एरण्ड वृक्ष के सहारे पर हाथी को कुपित करना उचित नहीं है ॥ ४५२ ॥ बहुत बड़ा होने पर भी सेमल के वृक्ष से हाथी को नहीं बाँधा जा सकता ॥ ४५३ ॥ बहुत बड़ा हुआ भी कनेर का वृक्ष मूसल बनाने के काम में नहीं आता ॥ ४५४ ॥ जुगुनू कितना भी अधिक चमकीला क्यों न हो, आग का काम नहीं दे सकता ॥ ४५५ ॥ बहुत बड़ा समृद्धिशाली हो जाने पर भी कोई गुणवान् नहीं हो पाता ॥ ४५६ ॥
बहुत पुराना होने पर भी नीम के वृक्ष का सरोता नहीं बन सकता ॥ ४५७ ॥ जैसा बीज होता है वैसा ही उससे फल उत्पन्न होता है ॥ ४५८ ॥ योग्यता के ही अनुरूप बुद्धि होती है ॥ ४५९ ॥ जैसा कुल होता है वैसा ही आचार होता है ॥ ४६० ॥ कितना ही संस्कार क्यों न किया जाय, नीम आम नहीं बन सकता ॥ ४६१ ॥ जो सुख प्राप्त हो उसको न छोड़ना चाहिए ॥ ४६२ ॥ कर्मानुसार ही मनुष्य को दुःख मिलता है ॥ ४६३ ॥
रात के समय व्यर्थ न घूमना चाहिए ॥ ४६४ ॥ आधी रात को शयन न करना
७९६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
शास्त्रप्रधाना लोकवृत्तिः ॥ ४६९ ॥ शास्त्राभावे शिष्टाचारमनुगच्छेत् ॥ ४७० ॥ नाचरिताच्छास्त्रं गरीयः ॥ ४७१ ॥ दूरस्थमपि चारचक्षुः पश्यति राजा ॥ ४७२ ॥ गतानुगतिको लोकः ॥ ४७३ ॥ यमनुजीवेत् तं नापवदेत् ॥ ४७४ ॥ तपःसार इन्द्रियनिग्रहः ॥४७५॥ दुर्लभः स्त्रीबन्धनान्मोक्षः ॥ ४७६ ॥ स्त्री नाम सर्वाशुभानां क्षेत्रम् ॥ ४७७ ॥ न च स्त्रीणां पुरुषपरीक्षा ॥ ४७८ ॥ स्त्रीणां मनः क्षणिकम् ॥४७९॥ अशुभद्वेषिणः स्त्रीषु न प्रसक्ताः ॥ ४८० ॥ यज्ञफलज्ञास्त्रिवेदविदः ॥ ४८१ ॥ स्वर्गस्थानं न शाश्वतं यावत् पुण्यफलम् ॥ ४८२ ॥ न च स्वर्गपतनात् परं दुःखम् ॥ ४८३ ॥ देही देहं त्यक्त्वा ऐन्द्रं पदं न वाञ्छति ॥ ४८४ ॥ दुःखानामौषधं निर्वाणम् ॥४८५॥ अनार्यसम्बन्धाद्वरमार्यशत्रुता ॥४८६॥ निहन्ति दुर्वचनं कुलम् ॥४८७॥ न पुत्रसंस्पर्शात् परं सुखम् ॥ ४८८ ॥
चाहिए ॥ ४६५ ॥ विद्वानों के सामने ब्रह्म की चर्चा करनी चाहिए ॥ ४६६ ॥ अकारण दूसरे के घर में न जाना चाहिए ॥ ४६७ ॥ जान-बूझकर भी लोग अपराध ही करते हैं ॥ ४६८ ॥
लोकव्यवहार शास्त्रानुकूल होना चाहिए ॥ ४६९ ॥ शास्त्रज्ञान न होने पर श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण का अनुगमन करना चाहिए ॥ ४७० ॥ सदाचार से बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है ॥ ४७१ ॥
गुप्तचरों के द्वारा राजा दूर की वस्तु को देख लेता है ॥ ४७२ ॥ लोक, परम्परा का अनुगमन करता है ॥ ४७३ ॥
जिसके द्वारा जीविकोपार्जन होता है उसकी निन्दा न करनी चाहिए ॥ ४७४ ॥ इन्द्रियनिग्रह तप का सार है ॥ ४७५ ॥
स्त्री के बन्धन से छूटना बड़ा दुष्कर है ॥ ४७६ ॥ स्त्री समस्त अशुभों की जन्म-दात्री है ॥ ४७७ ॥
स्त्री, पुरुष की परीक्षा नहीं कर सकती ॥ ४७८ ॥ स्त्री का मन क्षण-क्षण बदलता रहता है ॥ ४७९ ॥ अशुभ कर्मों को न चाहने वाले लोग स्त्रियों में आसक्त नहीं होते ॥ ४८० ॥
वेदत्रयी ( ऋक्, यजु, साम ) को जानने वाला ही यज्ञ के फल को जानता है ॥ ४८१ ॥ स्वर्गप्राप्ति स्थायी नहीं होती, क्योंकि उसकी अवधि तब तक होती है, जब तक पुण्य का फल शेष रहता है ॥ ४८२ ॥ स्वर्गपतन से बढ़कर दुःख नहीं है ॥ ४८३ ॥ शरीर त्याग करके जीव इन्द्रासन को नहीं चाहता ॥ ४८४ ॥ समस्त दुःखों की औषधि मोक्ष है ॥ ४८५ ॥
चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७९७
विवादे धर्ममनुस्मरेत् ॥४८९॥ निशान्ते कार्यं चिन्तयेत् ॥४९०॥ प्रदोषे न संयोगः कर्तव्यः ॥४९१॥ उपस्थितविनाशो दुर्नयं मन्यते ॥४९२॥ क्षीराथिनः किं करिण्या ॥४९३॥ न दानसमं वश्यम् ॥४९४॥ परायत्तेषूत्कण्ठां न कुर्यात् ॥४९५॥ असत्समृद्धिरसद्भिरेव भुज्यते ॥४९६॥ निम्बफलं काकैरेव भुज्यते ॥४९७॥ नाम्भोधिस्तृष्णामपोहति ॥४९८॥
बालुका अपि स्वगुणमाश्रयन्ते ॥४९९॥ सन्तोऽसत्सु न रमन्ते ॥५००॥ हंसः प्रेतवने न रमते ॥५०१॥
अर्थार्थं प्रवर्तते लोकः ॥५०२॥ आशया बध्यते लोकः ॥५०३॥ न चाशापरैः श्रीः सह तिष्ठति ॥५०४॥ आशापरे न धैर्यम् ॥५०५॥
दैन्यान्मरणमुत्तमम् ॥५०६॥ आशा लज्जां व्यपोहति ॥५०७॥
न मात्रा सह वासः कर्तव्यः ॥५०८॥ आत्मा न स्तोतव्यः ॥५०९॥ न दिवा स्वप्नं कुर्यात् ॥५१०॥ न चासन्नमपि पश्यत्यैश्वर्यान्धो न श्रृणोतीष्टं वाक्यम् ॥५११॥
अनार्य व्यक्ति की मित्रता से आर्यव्यक्ति की शत्रुता अच्छी है ॥४८६॥ दुर्वाणि सारे कुल को नष्ट कर देती है ॥४८७॥ पुत्र के आलिंगन से बढ़कर कोई सुख नहीं है ॥४८८॥
विवाद के समय धर्म के अनुसार कार्य करना चाहिए ॥४८९॥ नित्य प्रातः-काल अपने (दिन के) कार्यों पर विचार करना चाहिए ॥४९०॥ संध्याकाल में संभोग वर्जित है ॥४९१॥ जिसका विनाशकाल निकट होता है वह अन्याय पर उतर आता है ॥४९२॥ दूध चाहने वाले को हथिनो की आवश्यकता नहीं होती ॥४९३॥ दान के समान कोई वशीकरण नहीं ॥४९४॥ परायी वस्तु की इच्छा न करनी चाहिए ॥४९५॥ दुर्जनों की समृद्धि को दुर्जन ही भोगते हैं ॥४९६॥ नीम के फल को कौवे ही खाते हैं ॥४९७॥ समुद्र प्यास नहीं बुझाता ॥४९८॥
बालू भी अपने गुण का अनुसरण करती है ॥४९९॥ भले लोग बुरे लोगों से आनन्दित नहीं होते ॥५००॥ हंस श्मशान में रहना पसन्द नहीं करते ॥५०१॥
सारा संसार धन के पीछे दौड़ता है ॥५०२॥ सभी सांसारिक प्राणी आशा के बन्धन से बँधे है ॥५०३॥ आशा में निमग्न पुरुष को लक्ष्मी नहीं मिलती ॥५०४॥ आशावान् मनुष्य धैर्यशाली नहीं होता ॥५०५॥
दरिद्र होकर जीवित रहने की अपेक्षा मर जाना ही अच्छा है ॥५०६॥ आशा, लज्जा को मिटा देती है ॥५०७॥
एकान्त में माता के भी साथ न रहे ॥५०८॥ अपने मुख से अपनी प्रशंसा न करनी चाहिए ॥५०९॥ दिन में सोना न चाहिए ॥५१०॥ ऐश्वर्य में अन्धा मनुष्य न तो अपने समीप की वस्तु को देखता है और न हितकारी बात को सुनता है ॥५११॥
७९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
स्त्रीणां न भर्तुः परं दैवतम् ॥ ५१२ ॥ तदनुवर्तनमुभयसुखम् ॥५१३॥ अतिथिमभ्यागतं पूजयेद् यथाविधिः ॥ ५१४ ॥ नास्ति हव्यस्य व्याघातः ॥ ५१५ ॥ शत्रुर्भाववत् प्रतिभाति ॥ ५१६ ॥ मृगतृष्णा जलवद् भाति ॥ ५१७ ॥ दुर्मेधसामसच्छास्त्रं मोहयति ॥ ५१८ ॥ सत्संगः स्वर्गवासः ॥ ५१९ ॥ आर्यः स्वमिव परं मन्यते ॥ ५२० ॥ रूपानुवर्ती गुणः ॥५२१॥ यत्र सुखेन वर्तते तदेव स्थानम् ॥ ५२२ ॥ विश्वासघातिनो न निष्कृतिः ॥ ५२३ ॥ दैवयत्तं न शोचेत् ॥ ५२४ ॥ आश्रितदुःखमात्मन इव मन्यते साधुः ॥ ५२५ ॥ हृद्गतमाच्छाद्यान्यद् वदत्यनार्यः ॥ ५२६ ॥ बुद्धिहीनः पिशाचतुल्यः ॥ ५२७ ॥ असहायः पथि न गच्छेत् ॥ ५२८ ॥ पुत्रो न स्तोतव्यः ॥ ५२९ ॥ स्वामी स्तोतव्योऽनुजीविभिः ॥ ५३० ॥ धर्मकृत्येष्वपि स्वामिन एव घोषयेत् ॥ ५३१ ॥ राजाज्ञां नातिलङ्घयेत् ॥ ५३२ ॥ यथाऽऽज्ञप्तं तथा कुर्यात् ॥ ५३३ ॥ नास्ति बुद्धिमतां शत्रुः ॥ ५३४ ॥ आत्मच्छिद्रं न प्रकाशयेत् ॥५३५॥
स्त्री के लिए पति बढ़कर कोई देवता नहीं है ॥ ५१२ ॥ पति के इच्छानुसार चलने वाली स्त्री को इहलोक और परलोक, दोनों का सुख प्राप्त होता है ॥ ५१३ ॥ अपने यहाँ आये हुए अतिथि का विधिवत् सत्कार करना चाहिए ॥ ५१४ ॥ देवताओं के निमित्त से दिया हुआ द्रव्य कभी भी नष्ट नहीं होता ॥ ५१५ ॥ शत्रु भी कभी मित्र के समान दिखायी देता है ॥ ५१६ ॥ तृष्णा के कारण मृग चमकती हुई बालू को जल समझ बैठता है ॥ ५१७ ॥ दुर्बुद्धि मनुष्य को असत् शास्त्र मोह लेते हैं ॥ ५१८ ॥ सत्संग ही स्वर्गवास है ॥ ५१९ ॥ श्रेष्ठ व्यक्ति सबको अपने ही समान समझता है ॥ ५२० ॥ रूप के अनुसार ही मनुष्य में गुण होता है ॥ ५२१ ॥ जहाँ सुख से रहा जा सके, वही उत्तम स्थान है ॥ ५२२ ॥
विश्वासघाती मनुष्य के उद्धार के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं ॥ ५२३ ॥ जो बात दैव के अधीन है उसके सम्बन्ध में सोच-विचार न करना चाहिए ॥ ५२४ ॥ सज्जन व्यक्ति आश्रितों के दुःख को अपना ही दुःख समझते हैं ॥ ५२५ ॥ हृदय की बात को छिपाकर बनावटी बातें करने वाला अनार्य है ॥ ५२६ ॥ बुद्धिहीन मनुष्य पिशाच के समान है ॥ ५२७ ॥ बिना साथ के यात्रा न करनी चाहिए ॥ ५२८ ॥ अपने पुत्र की प्रशंसा न करनी चाहिए ॥ ५२९ ॥
सेवक लोगों को चाहिए कि वे अपने स्वामी का गुणगान करते रहें ॥ ५३० ॥ अपने धर्मकार्यों में भी वे स्वामी का गुणगान करते रहें ॥५३१॥ राजा की आज्ञा का कभी भी उल्लंघन न करना चाहिए ॥ ५३२ ॥ उसकी जैसी आज्ञा हो तदनुसार करना चाहिए ॥ ५३३ ॥
बुद्धिमान् मनुष्य का कोई शत्रु नहीं है ॥ ५३४ ॥ अपनी गुप्त बात किसी पर
चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७९९
क्षमावानेव सर्वं साधयति ॥ ५३६ ॥ आपदर्थं धनं रक्षेत् ॥ ५३७ ॥ साहस- वतां प्रियं कर्तव्यम् ॥ ५३८ ॥ श्वः कार्यमद्य कुर्वीत ॥ ५३९ ॥ आपराह्निकं पूर्वाह्ने एव कर्तव्यम् ॥ ५४० ॥ व्यवहारानुलोमो धर्मः ॥ ५४१ ॥ सर्वज्ञता लोकज्ञता ॥ ५४२ ॥ शास्त्र- ज्ञोऽप्यलोकज्ञो मूर्खतुल्यः ॥ ५४३ ॥ शास्त्रप्रयोजनं तत्त्वदर्शनम् ॥ ५४४ ॥ तत्त्वज्ञानं कार्यमेव प्रकाशयति ॥ ५४५ ॥ व्यवहारे पक्षपातो न कार्यः ॥ ५४६ ॥ धर्मादपि व्यवहारो गरीयान् ॥ ५४७ ॥ आत्मा हि व्यवहारस्य साक्षी ॥ ५४८ ॥ सर्वसाक्षी ह्यात्मा ॥ ५४९ ॥ न स्यात् कूटसाक्षी ॥ ५५० ॥ कूटसाक्षिणो नरके पतन्ति ॥ ५५१ ॥ प्रच्छन्नपापानां साक्षिणो महाभूतानि ॥ ५५२ ॥ आत्मनः पापमात्मैव प्रकाशयति ॥ ५५३ ॥ व्यवहारेऽन्तर्गतमाचारः सूचयति ॥ ५५४ ॥ आकारसंवरणं देवानामशक्यम् ॥ ५५५ ॥ चौरराजपुरुषेभ्यो वित्तं रक्षेत् ॥ ५५६ ॥ दुर्दर्शना हि राजानः प्रजाः नाशयन्ति ॥ ५५७ ॥
प्रकट न करनी चाहिए ॥ ५३५ ॥ क्षमाशील मनुष्य अपना सब कार्य साध लेता है ॥ ५३६ ॥ आपत्काल के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए ॥ ५३७ ॥ साहसी पुरुष कर्तव्यप्रिय होता है ॥ ५३८ ॥
जो कार्य कल करना है, उसको आज ही कर लेना चाहिए ॥ ५३९ ॥ जो कार्य दोपहर के बाद करना है उसको दोपहर के पहले ही कर लेना चाहिए ॥ ५४० ॥
व्यवहार के अनुसार ही धर्म होता है ॥ ५४१ ॥ सांसारिक बातों का ज्ञाता ही सर्वज्ञ कहलाता है ॥ ५४२ ॥ शास्त्रज्ञ होता हुआ भी जो लोकज्ञ न हो, वह मूर्ख के समान है ॥ ५४३ ॥ यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति ही शास्त्र का प्रयोजन है ॥ ५४४ ॥ कार्य ही यथार्थ ज्ञान के प्रकाशक हैं ॥ ५४५ ॥
व्यवहार ( न्याय ) में पक्षपात न करना चाहिए ॥ ५४६ ॥ व्यवहार धर्म से भी बड़ा होता है ॥ ५४७ ॥ व्यवहार का साक्षी आत्मा है ॥ ५४८ ॥ समस्त प्राणियों में आत्मा साक्षीरूप में विद्यमान रहता है ॥ ५४९ ॥ कपट-साक्षी न होना चाहिए ॥ ५५० ॥ झूठे साक्षी नरक में जाते हैं ॥ ५५१ ॥ छिपकर किये गये पापों के साक्षी पंच महाभूत ( पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश ) हैं ॥ ५५२ ॥ अपने पापों को पापी स्वयमेव प्रकट करता है ॥ ५५३ ॥ व्यवहार के समय मन की बात को आकृति ही प्रकट कर देती है ॥ ५५४ ॥
मनोगत भावों की अभिसूचक आकृति को देवता भी नहीं छिपा सकते ॥ ५५५ ॥
चोरों और राजपुरुषों से अपने धन की रक्षा करनी चाहिए ॥ ५५६ ॥ जिन
८०० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र
सुदर्शना हि राजानः प्रजा रञ्जयन्ति ॥ ५५८ ॥ न्याययुक्तं राजानं मातरं मन्यन्ते प्रजाः ॥ ५५९ ॥ तादृशः स राजा इह सुखं ततः स्वर्गमाप्नोति ॥ ५६० ॥
अहिंसालक्षणो धर्मः ॥ ५६१ ॥ स्वशरीरमपि परशरीरं मन्यते साधुः ॥ ५६२ ॥ मांसभक्षणमयुक्तं सर्वेषाम् ॥ ५६३ ॥
न संसारभयं ज्ञानवताम् ॥ ५६४ ॥ विज्ञानदीपेन संसारभयं निवर्तते ॥ ५६५ ॥
सर्वमनित्यं भवति ॥ ५६६ ॥ कृमिशकृन्मूत्रभाजनं शरीरं पुण्यपापजन्महेतुः ॥ ५६७ ॥ जन्ममरणादिषु दुःखमेव ॥ ५६८ ॥
तेभ्यस्तर्तुं प्रयतेत ॥ ५६९ ॥ तपसा स्वर्गमाप्नोति ॥ ५७० ॥ क्षमायुक्तस्य तपो विवर्धते ॥ ५७१ ॥ तस्मात् सर्वेषां कार्यसिद्धिर्भवति ॥ ५७२ ॥
इति चाणक्यसूत्राणि — : ० : —
राजाओं के दर्शन, प्रजा को कठिनाई से प्राप्त होते हैं उसकी प्रजा नष्ट हो जाती है ॥ ५५७ ॥
जो राजा बराबर प्रजा के सुख-दुःख को सुनते हैं उनसे प्रजा प्रसन्न रहती है ॥ ५५८ ॥ न्यायपरायण राजा को, प्रजा माता के समान मानती है ॥ ५५९ ॥ इस प्रकार का प्रजाप्रिय राजा ऐहिक सुख और पारलौकिक स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥ ५६० ॥
अहिंसा ही धर्म है ॥ ५६१ ॥ सज्जन पुरुष अपने शरीर को भी पराया ही मानते हैं ॥ ५६२ ॥ मांस-भक्षण सबके लिए अनुचित है ॥ ५६३ ॥ ज्ञानी पुरुषों को संसार का भय नहीं होता ॥ ५६४ ॥ विज्ञान ( ब्रह्मज्ञान ) के दीपक से संसार-भय भाग जाता है ॥ ५६५ ॥
यह दिखायी देने वाला सब कुछ अनित्य है ॥ ५६६ ॥ कृमि-कीट तथा मल-मूत्र का घर शरीर पुण्य-पाप का जन्मस्थल है ॥ ५६७ ॥ यह जन्म-मरण आदि दुःख ही दुःख है ॥ ५६८ ॥
इस जन्म-मरणादि से छुटकारा पाने का उपाय करना चाहिए ॥ ५६९ ॥ सब से स्वर्ग की प्राप्ति होती है ॥ ५७० ॥ क्षमाशील पुरुष का तप बढ़ता रहता है ॥ ५७१ ॥ तपश्चर्या से सबके कार्य सिद्ध होते हैं ॥ ५७२ ॥
चाणक्यसूत्र समाप्त
— : ० : —
पारिभाषिक शब्दावली
प्राचीन भारत की राजनीति और शासन के क्षेत्र में आचार्य कौटिल्य का अर्थ-शास्त्र एक विश्वकोश जितना महत्त्व रखता है। उसमें धर्म, कर्म, शिक्षा, नीति, समाज, विज्ञान, कृषि, चिकित्सा और यहाँ तक कि मन्त्र-तन्त्र आदि जितने भी विषय हैं उन सभी का समावेश है। इस सर्वांगीण और सर्वतोमुखी विशिष्टता के कारण अर्थशास्त्र की शब्दावली में अनेकता के दर्शन होते हैं।
अर्थशास्त्र-विषयक पुरातन उद्देश्य को दृष्टि में रख कर यहाँ लगभग पौने आठ सौ शब्दों की एक सूची इस हेतु दी जा रही है कि शासन के विभिन्न क्षेत्रों में अंग्रेजी शब्दों के स्थान पर जो भारतीय भाषाओं और विशेषतया संस्कृत भाषा के शब्दों का नवीनीकरण हुआ है, अर्थशास्त्र के पाठकों को उसकी जानकारी प्राप्त हो सके।
प्राचीन अर्थशास्त्र का महत्त्व वर्त्तमान शासन-संबंधी सभी कार्यक्षेत्रों में व्याप्त है। इस दृष्टि से और आचार्य कौटिल्य की सर्वथा वैयक्तिक विचारधारा को समझने के लिए भी यह पारिभाषिक शब्दावली उपयोगी सिद्ध होगी।
यह शब्दावली सरकार के शिक्षा-विभाग से तैयार की गयी पारिभाषिक शब्द-सूचियों, श्री मोनियर विलियम्स, श्री वामन शिवराम आप्टे, श्री लक्ष्मण शास्त्री, राहुलजी तथा डा० रघुवीर के शब्दकोशों, डा० शामशास्त्री, एवं महामहोपाध्याय गणपति शास्त्री कृत अर्थशास्त्र के अंग्रेजी, संस्कृत अनुवादों और डा० जायसवाल की पुस्तक हिन्दू पॉलिटी पर आधारित है।
अ
| अंकनी—लेखनी—पेंसिल | अंतिमेत्यम्—अंतिम चेतावनी—अल्टिमेटम |
| अंकयमित—मुहर लगा पत्र—स्टांप्ड | अंशधर—हिस्सेदार—शेयर होल्डर |
| अंकेक्षित लेखा—लेखा-परीक्षक द्वारा जाँच किया हुआ हिसाब—ऑडिटेड एकाउंट | अकृतक्षेत्र—कृषि के अयोग्य भूमि |
| अंगरक्षक—शरीररक्षक—बॉडीगार्ड | अकृषित—जो भूमि जोती-बोई न गई हो—अनकल्टिवेटेड |
| अंतग्रस्त—विपत्तिग्रस्त—इंवाल्व्ड | अक्ष—धुरी-एक्सिस |
| अंतपाल राज्य—दो देशों की सीमाओं के बीच स्थित राज्य—बफर स्टेट | अक्षपटल—आय-व्यय के लेखे का प्रधान, विभाग या कर्मचारी ( पटल—अधिदेवन ) |
| अंतरंग सचिव—निजी सचिव—प्राइवेट सेक्रेटरी | अक्षपटलाध्यक्ष—महागणक, महागणनिक—एकाउंटेंट जनरल |
| अंतर्वाणिज्य—आभ्यंतर व्यापार—इंटरनल ट्रेड | अक्षशाला—सुवर्ण आदि का शोधन करने एवं गणना करने वालों का स्थान |
५१ कौ०
| अधिकरण—आधार विषय | अधिशिक्षक—मुख्य अधिष्ठाता—रेक्टर |
८०२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
| अग्निवारक—अग्नि का प्रभाव रोकने वाला—फायरप्रूफ | अधिकारी राज्य—कर्मचारी तन्त्र—ब्यूरोक्रेसी |
| अग्निशामक—अग्नि को शांत करने वाला—फायरब्रिगेड | अधिकोष—रुपया जमा करने और माँगने पर ब्याज सहित लौटा देने वाली संस्था—बैंक |
| अग्रदाय—इम्प्रेस्ड | अधिग्रहण—अधिकार या अभियाचन द्वारा किसी की संपत्ति आदि को ले लेना—ऐक्विजिशन |
| अग्रदाय धन--इम्प्रेस्ड मनी | |
| अग्रसर—आगे बढ़ा हुआ—फारवर्ड | |
| अग्रसारित—आगे बढ़ा दिया गया पत्र आदि—फॉरवर्डेड | अधिदेय—भत्ता—अलाउन्स |
| अधिनायक—तानाशाह—डिक्टेटर | |
| अटवीवल—कोल-भील लोगों की सेना | अधिनियम—पारित विधि—ऐक्ट |
| अणुदर्शी—सूक्ष्मदर्शी—माइक्रोस्कोप | अधिपत्र—लिखित आदेश—वारंट |
| अति उत्पादन—खपत या माँग से अधिक मात्रा में पण्य वस्तुओं का उत्पादन—ओवर प्रॉडक्शन | अधिप्रभार—निर्धारित परिणाम से अधिक शुल्क—ओवरचार्ज |
| अधिभार—अधिक कर—सरचार्ज | |
| अतिचरण—सीमा का उल्लंघन—ट्रांसग्रेसन | अधिमास—मलमास—लीप-ईयर |
| अधियुक्त—नियोजित—एम्प्लॉयड | |
| अत्यय—वैध अर्थदण्ड | अधिराज्य—स्वतंत्र उपनिवेश—डोमीनियन |
| अद्यावधिक—आज तक का—अप-टु-डेट | |
| अधमर्ण—जिसने किसी से ऋण लिया हो, कर्जदार—डेटर | अधिवक्ता—वकील—एडवोकेट |
| अधिवारन—डामिसियल | |
| अधिकर—अतिरिक्त कर—सुपर टैक्स | अधिविन्ना—प्रथम विवाहिता पत्नी |
| अधिकरण—आधार विषय | अधिशिक्षक—मुख्य अधिष्ठाता—रेक्टर |
| अधिकर्ता—निदेशक; संचालक—डायरेक्टर | अधिशेष—बचत—सरप्लस |
| अधिकर्मी—अधिकारी—ओवरसीयर | अधिष्ठाता—नियामक अधिकारी—प्रसाइडिंग आफिसर |
| अधिकार—कार्यभार—सर चार्ज | |
| अधिकारपत्र—शासत द्वारा प्राप्त पत्र—चार्टर | असूधिचना—अधिकृत सूचना—नोटिफिकेशन |
| अधिकारिक सेना—विजित देश पर तब तक अधिकार बनाये रखनेवाली सेना, जब तक कि नियमित शासन व्यवस्था कायम नहीं हो जाती—आर्मी आफ आकुपेशन | अधीक्षक—कार्यालय या विभाग का अधिकारी—सुपरिटेंडेंट |
| अध्यक्ष—प्रमुख—चेयरमैन | |
| अभ्यर्थित—क्लेम्ड | |
| अधिकारी—पदाधिकारी—अफसर | अभ्यर्थी—दावेदार—क्लेमेंट |
पारिभाषिक शब्दावली
८०३
अध्यादेश—विशेष स्थिति में लागू किया गया आदेश—आर्डिनेंस
अध्यारोप—इम्यूटेशन
अनय—दुष्टनीति
अनर्हता—अयोग्यता—डिस्क्वालिफिकेशन
अनारूढ—पैदल—डिस्माउण्टेड
अनावर्त्तक—जो (अनुदान) एक ही बार दिया जाय—नाॅन-रेकरिंग
अनावर्ती—फिर न लौटनेवाला—एपीरिओडिक
अनीकस्थ—निपुण हस्तिशिक्षक
अनीकिनी—सेना का सबसे बड़ा भाग, जिसमें १०-१५ हजार सैनिक हों—डिवीजन
अनुग्रह—राजा के द्वारा प्रजा को प्रदत्त उपकार
अनुग्रह परिहार—आर्थिक रियायतें
अनुग्रहधन—सेवा का उपहार—ग्रेचुइटी
अनुच्छेद—संविदा आदि का वह विशिष्ट अंश, जिसमें एक विषय और उसके प्रतिबंधों आदि का उल्लेख हो—पैराग्राफ
अनुज्ञप्ति—अनुज्ञापत्र—लाइसेंस
अनुज्ञाधारी—लाइसेंसदार
अनुदेश—हिदायत—इंस्ट्रक्शन
अनुपूरक—छूट या कमी को पूरा करने के लिए बाद में बढ़ाया हुआ—सप्लिमेंटरी
अनुबन्ध—बंधन—क्राँन्ट्रक्ट
अनुबन्ध पत्र—करारनामा—इंडेंचर
अनुबल—पृष्ठरक्षक सेना—रेयरगार्ड
अनुभाजन—ऐपोर्शन
अनुरक्षक—एस्कॉर्ट
अनुवेशपत्र—परीक्षित पारपत्र—वीजा
अनुशय—क्रय-विक्रय-संबंधी विवाद
अनूप—जलमय प्रदेश
अनैतिक—इम्मोरल
अनौपचारिक —इनफारमल
अन्तपाल—सीमान्त अधिकारी
अन्तर्वेशिक—अन्तःपुर का प्रमुख अधिकारी
अन्तर्धि—शत्रु तथा विजिगीषु के बीच का राज्य
अपचारक—दूसरे की सीमा में अनधिकार प्रवेश—ट्रेसपासर
अपर न्यायाधीश —अतिरिक्त न्यायाधीश—एडीशनल जज
अपर सचिव—अतिरिक्त सचिव—एडिशनॅल सेक्रेटरी
अपराधी—दोषी—गिल्टी
अपरिदेय—जिसकी अदला-बदली न की जा सके—नाॅन-ट्रांसफरेबल
अपलाभ—अनुचित लाभ—प्रोफिटियरिङ्ग
अपहार—प्राप्त आय को खाते में न चढ़ाना निर्धारित धन का व्यय न करना और बचत धन का अपव्यय करना
अपेक्षाभूमि—परती भूमि—फालोलैंड
अप्रतिभाव्य—वह अपराध, जिसमें किसी के जामिन बनने या जमानत देने को तैयार होने पर भी अपराधी को अस्थायी रूप से रिहा कर देने की गुञ्जायश न हो—नाॅन-बेलेबिल
अप्रत्यक्षकर—जो कर विक्रेय वस्तुओं की बढ़ी हुई कीमत के रूप में उप भोक्ताओं से लिया जाता है—इण्डाइरेक्ट टैक्स
अप्रत्यादेय—जो फिर प्राप्त या वसूल न किया जा सके—इर्रिकव्हरेबिल
४०४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
अप्राप्तव्यवहार—नाबालिग
अभक्ति—अश्रद्धा—डिस्लोयल्टी
अभिकथन—अप्रमाणित आरोप—एलेगेशन
अभिकरण—अभिकर्ता के कार्य करने का स्थान—एजेंसी
अभिकर्ता-—कार्यवाहक, घटक—एजेंट
अभिग्रहण—अपना कहकर स्वीकार करना—एक्वीजीशन
अभिज्ञा—मान्यता—रेकॉगनिशान, आइडेण्टिटी
अभिज्ञात—मान्यता प्राप्त—रेकॉगनाइज्ड
अभिज्ञान—पहिचान—आइडेन्टिफिकेशन
अभिज्ञापक—उद्घोषक—एनाउंसर
अभिज्ञापत्र—पहचान पत्र—आइडेण्टिटी-कार्ड
अभिधान—कथन—एपीलेशन्स
अभिनिर्णय—अन्तिम निर्णय—वर्डिक्ट
अभिन्यास—किसी योजना के अनुसार गृह, उद्यान आदि का निर्माण करना—ले-आउट
अभिभावक—संरक्षक—गार्जियन
अभियन्ता—यन्त्रविद—इंजीनियर
अभियान—आक्रमण करने की क्रिया
अभियोक्ता—वादी—कॉम्पिलनेण्ट
अभियोग—दोषारोपण—ऐक्यूजेशन
अभिवक्ता—वकील—प्लीडर
अभिरक्षक—सुरक्षा की दृष्टि से किसी वस्तु या व्यक्ति को अपने संरक्षण में रखने वाला—कस्टोडियन
अभिरक्षा—हिरासत—कस्टोडी
अभिलेख—रिकार्ड
अभिलेख कार्यालय—रिकार्ड आफिस
अभिलेखपाल—कीपर आफ रिकार्ड्स
अभिषद्—सीनेट की प्रबन्ध समिति—सिण्डिकेट
अभिसूचना—हिदायत—इंस्ट्रक्शन
अभिस्रावणी—भट्टी—डिस्टलरी
अभुक्त—जिसका उपभोग या भुगतान न किया गया हो—अनकैश्ड
अभ्यंश—नियतांश—कोटा
अभ्यस्त अपराधी—आदतन दोषी—हैविचुअल ऑफेण्डर
अभ्युक्ति—टीका—रिमार्क
अभ्युद्देश—रिफ्रेन्स
अम्ल—तेजाब—एसिड
अमित्रसंपत्—शत्रु के प्रमुख दोष
अय—अभीष्ट फल की प्राप्ति
अराजक—बिना शासक वाली आदर्शवादियों की शासन-प्रणाली
अर्थदूषण—आर्थिक क्षति
अर्थशास्त्र—पृथिवी की प्राप्ति और पालन का प्रतिपादन करने वाली विद्या
अर्थापन—व्याख्या—इण्टरप्रेटेशन
अर्हता—योग्यता—क्वालिफिकेशन
अवकाशग्रहण—विश्राम लेना—रिटायरमेंट
अवज्ञा—अवहेलना—डिस्-ओविडिएंस
अवघाता—वह व्यक्ति जो असली मालिक की अविद्यमानता में मकान आदि की निगरानी करे—केयरटेकर
अवधायी सरकार—अवधायक सरकार वह सरकार, जो निर्वाचन होने के बाद नई सरकार के कार्यभार ग्रहण कर लेने तक शासन-व्यवस्था की निगरानी करती है—केयरटेकर गवर्नमेंट
अवधान—देखभाल—केयर
पारिभाषिक शब्दावली
८०५
अवधायक अधिकारी—किसी कार्य या कार्यालय का अधिकारी—आफिस इनचार्ज
अवमान—अवज्ञा—कंटेप्ट
अवमूल्यन—किसी सरकार द्वारा अन्य देशों की मुद्राओं की तुलना में अपने देश की मुद्रा का मूल्य घटा दिया जाना—डीवेलुएशन
अवयस्क—नाबालिग (१८ वर्ष से कम)—माइनर
अवर—जूनियर
अवरागार—लोकसभा—लोअर हाउस
अवरुद्ध—नजरबन्द
अवरोधन भत्ता—रूकौनी भत्ता—डिटेंशन अलाउंस
अवशेष—बचा हुआ—बैलेंस ओपनिंग
अवेक्षण—लुक आउट
अवैतनिक—ऑनररी
अवैध—नियमविरुद्ध—इल्लीगल
अवसर ग्रहण—अवसर प्राप्त-रिटायरमेंट
अवस्थान प्रक्रम—ठहरने का स्थान—स्टेशन
अवहार—छूट ( कर )—रिबेट
अव्ययित शेष—किसी काम के लिए निर्धारित या जमा किये हुए धन का वह अंश, जो व्यय न किये जाने के कारण बच गया हो—अनस्पेंट बैलेंस
अशोधित शेष—किसी ऋण आदि का वह बचा हुआ अंश जिसका भुगतान या अदायगी न हुई हो—अनरिडीम्ड बैलेंस
अष्टकुल—आठ सदस्यों की न्यायकारी काउंसिल
असैनिक—सिविल
असैनिकीकरण—किसी स्थान या क्षेत्र को सैन्यविहीन कर देना—डीमिलिटेरिजेशन
अस्थायी संधि—आर्मिस्टिस
आ
आकाशी—एरियल
आक्रय—फेरीवाला—हॉकर
आख्यापक—अनाउंसर
आख्यापना—अनाउंसमेंट
आज्ञप्ति—दीवानी मुकदमे में न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय—डिक्री
आतिथ्य शुल्क—आयात माल पर कर
आतंक युद्ध—प्रचार आदि के द्वारा ऐसा आतंक उत्पन्न कर देना कि जिससे शत्रु का साहस और युद्ध-क्षमता शीण पड़ जाय—वार ऑफ नर्ज
आदेय—वह धन, जो दूसरों से मिलना हो या जो अपनी संपत्ति बेच कर प्राप्त किया जाय—असेट्स
आधि—धरोहर—पॉन
आधिकारिक—सरकारी—ऑफिसियल
आन्वीक्षकी—आत्मविद्या
आपत्सहायकार्य—दुष्काल या बाढ़, भूकंप आदि के संकट-काल में, आर्त तथा असहाय जनता की सहायता के लिए आरंभ किया गया सार्वजनिक निर्माण कार्य—रिलीफ वर्क
आपात—आकस्मिक संकट—इमरजेंसी
आपृच्छा—रेफरेंडम
आबकारी—एक्साइज
आभारोक्ति—एक्नॉलेजमेंट
आयकर—इनकम टैक्स
८०६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र
आयकर अधिकारी—इनकम टैक्स आफिसर
आयात शुल्क—इम्पोर्ट ड्यूटी
आयात—इम्पोर्ट
आयाम—माप-डाइमेन्शन्स
आयव्ययक—किसी निश्चित अवधि के आय-व्यय का लेखा—बजट
आयुक्त—कमिशनरी का प्रधान अधिकारी—कमिशनर
आयोग—किसी विशेष कार्य को संपन्न करने के लिए नियुक्त व्यक्तियों का मंडल—कमीशन
आयोजना—प्लॉनिंग
आरक्षक—आरक्षी-पुलिस
आरक्षण—रिजर्वेशन
आरक्षित शायिका—रिजवर्ड बर्थ
आलोचना—गुण-दोष विवेचन—कॉमेंट
आवक—इनवार्ड
आवर्त्त—रिवोल्यूशन
आवर्त्तक—आवर्ती, बार-बार दिया जाने वाला (अनुदान)—रेकरिंग
आविस पत्र—मैनिफेस्टो
आशुपत्र—एक्सप्रेस लेटर
आशुलिपिक—स्टेनोग्राफर
आहर्त्ता—ड्रावर
आसेध—कुर्की—अटैचमेंट
आहार्यी—ड्रावी
आह्वान पत्र—समन-समंस
इ
इतिवृत्त पत्रक—हिस्ट्री शीट
इतिशेष—बैलेंस क्लोजिंग
उ
उच्च न्यायालय—हाईकोर्ट
उच्चाधिकारी—हाई कमान
उच्चायुक्त—हाई कमिश्नर
उत्कोच—रिश्वत—ब्राइब
उत्तमर्ण—महाजन—क्रेडिटर
उत्तराधिकारी—हेयर
उत्तोलक—ऊपर उठाकर तौलने वाला यन्त्र—लीवर
उत्थानक—ऊपर-नीचे चढ़ाने-उतारने वाला बिजली का आसन—लिफ्ट
उद्ग्रहण—उगाहना—लेवी
उद्योगशाला—कारखाना—फैक्ट्री
उन्मोचन—बन्धनमुक्त या ऋणमुक्त—डिसचार्ज
उप—डिप्टी
उप उच्चायुक्त—डिप्टी हाई कमिश्नर
उपकर—एक तरह का छोटा कर, जो विविध वस्तुओं पर विभिन्न स्थितियों में लगाया जाता है—सेस
उपकुलपति—कुलपति के मातहत—प्रो-वाइसचांसलर
उपजीव—मानना या धर्म आदि का पालन करना (राज शब्दोपजीवी = राजा की उपाधि धारण करने वाला संघ, शस्त्रोपजीवी = जो संघ अस्त्र-शस्त्रों का व्यवहार करता था अथवा युद्धकला में निपुण होता था)
उपनिदेशक—डिप्टी डायरेक्टर
उपनिवेश—दूसरे देशों में अपनी वस्ती वसाना या नई वस्ती वसाना—कॉलोनिजेशन
उपनौबलाध्यक्ष—वाइस एडमिरल
उपपंजीयक—सब रजिस्ट्रार
उपपत्ति—थ्योरी
पारिभाषिक शब्दावली
८०७
उपप्रस्ताव—मोशन
उपमुख्य—डिप्टी चीफ
उपमुख्य लेखा-अधिकारी—डिप्टी चीफ अकाउण्ट आफिसर
उपबन्ध—शर्तक-कांडिशन
उपयोजक—एडाप्टर
उपशुल्क—उपकर-रेण्ट
उपसञ्चालक—डिप्टी डायरेक्टर
उपसंहरण—घटाना, कम करना-आबेट
उपस्कर—मसाला-इक्युप्मेंट
ऋ
ऋणबन्धनपत्र—रुक्का-प्रो-नोट
औ
औपचारिक—दिखाऊ-फारमल
औरस—विवाहिता पत्नी से उत्पन्न पुत्र
क
कक्ष—सेना के पश्चाद् भाग के दोनों पार्श्व
कण्टकशोधन—समाज-अहितकारी लोगों का दमन
कण्टिका—आलपीन-पिन
कण्टिकाधार—पिनकुशन
कर—चुङ्गी-इम्पोस्ट
करण—न्यायालय में बयान लिखने वाला-क्लर्क
करणिक—क्लर्क
करणिक प्रधान—हेडक्लर्क
करणिक मुख्य—चीफ क्लर्क
करणिक सहायक—असिस्टेण्ट क्लर्क
कर निर्धारक—असेसर
कर्णपाल—क्वाटर मास्टर
कर्मक—पर्सनल ( वर्ग )
कर्मकार—वर्कमैन
कर्मशाला—वर्कशाप
कर्मान्त—कारखाना
कल्पना—दन्तकथा पुराणकथा-मेय
कारागारिक—कारापाल-जेलर
कार्तान्तिक—यमपट दिखाकर जीविकोपार्जन करने वाला ज्योतिषी
कार्मिक—गणना विभाग का कर्मचारी
कार्यकारी अभिकर्ता—ऐक्टिङ्ग एजेण्ट
कार्यनायक—चार्ज डी-एफेयर्स
कार्य-परिषद्—काउन्सिल आफ ऐक्शन
कार्यपुस्तक—काल बुक
कार्यभारी—इञ्चार्ज
कार्यवाहक—ऐक्टिङ्ग
कार्यवाहक प्रभारी—इञ्चार्ज
कुटीर शिल्प—छोटा उद्योग-काटेज इंडस्ट्री
कुलपति—वाइसचांसलर
कुलिक—पौर का न्यायाधीश, गणराज्य में निर्णय करने वाली संस्था
कूटरूप—जाली सिक्का
कूटशासन—कपट लेख या जाली दस्तावेज
कूटसाक्षी—झूठा गवाह
कृतिस्वामित्व—सर्वाधिकार-कॉपीराइट
कृष्य—जो भूमि जोती-बोई जा सके—कल्टिवेटेबिल
केन्द्र निदेशक—स्टेशन डायरेक्टर
कोशसंपत—राजकोश के उत्कृष्ट गुण
कोष्ठागार—सरकारी अन्नसंग्रह का स्थान
क्षति सर्वेक्षण—डेमेज सर्वे
क्षय—अल्प आय और अधिक व्यय
क्षेत्रीय न्यायालय—रीजनल कोर्ट
ख
खण्ड निरीक्षक—ब्लाक इन्सपेक्टर
८०८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
ख्यापना—ऐलान-अनाउंसमेंट
ग
गण—संस्था, सिनेट, कंपनी
गणक, गाणनिक—आय-व्यय लेखक—एकाउण्टेण्ट
गणना—लेखा—अकाउंट
गणनाफलक—खिड़की—काउण्टर
गणिकाध्यक्ष—वेश्याओं पर अनुशासन रखने वाला अधिकारी
गति निदेशक—मूवमेंट डायरेक्टर
गुटिकाधार—बाल बेयरिंग
गुणांकन—स्कोरिंग
गुल्म—रक्षकदल—प्लाटून
गृहपति—छात्राभिरक्षक—वार्डन
गृहरक्षक—होमगार्ड
ग्रन्थागारिक—पुस्तकालय का अध्यक्ष—लाइब्रेरियन
ग्रन्थि—गिल्टी—ग्लैंड
ग्रामकूट—गांव का मुखिया
ग्राम गामणिक—किसी गाँव या नगर का निर्वाचित राजा या सभापति
ग्रामणी—गांव का मुखिया
ग्रामिक—ग्रामपाल
घ
घट्टकर—नावकर—फेरी टॉल
च
चमू—मण्डल-डिवीजन
चारक—हवालात
चालक—ड्राइवर
चिकित्सा अधिकारी—मेडिकल आफिसर
चित्राधार—अलबम
छ
छंद—मत—वोट
छंदक—संमति—रेफरेन्डम (Referedum)
छंदाधिकार—मताधिकार
छद्मनाम—कपटनाम—प्यूडोनिक
छद्मयुद्ध—कपट युद्ध—शैंम फाइट
ज
जनित्र—जेनेरेटर
जनन—उत्पादन—रिप्रोडक्शन
जनसम्पर्काधिकार—जनता से सम्पर्क बनाये रखनेवाला सरकारी अधिकारी—पब्लिक रिलेशन आफिसर
जल परिवहन विधि—एडमिरेलिटी ला
जानपद—देशसंघ
जानपद सैन्य—देशरक्षक सेना—मिलीशिया
जीवनरक्षक पेटी—डूबने से बचने के लिए बांधी जाने वाली ऐसी पेटी जिसमें हवा भरी रहती है या बड़ा सा कार्क लटकता रहता है—लाइफ बेल्ट
ज्ञप्ति, प्रज्ञप्ति—सूचना
ज्ञात कुल—डिस्क्रिप्ट
ज्वलनांक—फायर पोइंट
ज्वालक—बर्नर
ट
टंकशाला—टकसाल—मिंट
ड
डमर—विप्लव
डिम्ब—प्रजा-विप्लव
त
तर्जनी—देशिनी प्रदेशिनी—इण्डैक्स फिंगर
तीर्थ—विभागीय अध्यक्ष
तुन्नवाय—दर्जी
तुलनपत्र—बैलेंस शीट
पारिभाषिक शब्दावली
८०९
द
दण्डपाल—सेनाध्यक्ष
दण्डाधीश—दण्डाधिकारी—मजिस्ट्रेट
दशकुली—दस परिवारों का संघ
दशग्रामी—दस गाँवों का समुदाय
दाति—वितरण—डेलीवरी
दाय—रिक्थ—इन्हेरिटेंस
दायाद—पिता की संपत्ति का उत्तराधिकारी
दिक्सूचक—कुतुबनुमा—कम्पास
दिविर—मुंशी—रजिस्ट्रार-एक्चुअरी
दुरभियोजन—किसी को हानि पहुँचाने के लिये की जाने वाली गुप्त कार्यवाही—प्लाट
दुर्ग रक्षक सेना—दुर्गनिवेश—गारिजन
दूरमुद्रक—टेलिप्रिंटर
दूष्य—राजद्रोही
द्रावक—फ्लस्क
द्विनेत्री—दूरबीन—बाइनोकुलर
द्वैराज्य—दो शासकों वाला राज
ध
धनादेश—चेक
धरण—सहारा—गर्डर
धर्मस्थ—दीवानी कचहरी का न्यायाधीश
धर्मस्व—प्राभृत—इन्डोमेंट
धारक—कीपर
धारणिक—कर्जदार
धारा—दफा-सेक्शन
धारिता—मता—कैपेसिटी
धारुक—बियरिंग
धात्री—दायी—मिडवाइफ
ध्वजदंड—फ्लेग स्टाफ
ध्वजपति—फ्लेग अफसर
ध्वजपोत—फ्लेगशिप
न
नगरपाल—सिटी फादर
नगररक्षक—सिविल गार्ड
नामन्—आख्य—नॉमिनेशन
नामपत्र—लेबल
नामिका—पेनल
नायक—दलनेता—कैप्टिन
नाविक—पोतारोही—डेक हैड
निकाय—वर्ग—बॉडी
निगम—पौर संघ—कॉर्पोरेशन
निचयकर्ता—समासक, संक्षेपकर्ता—अब्रेविएटर
निजी सचिव—निजी कामों की देखभाल करने वाला सचिव—प्राइवेट सेक्रेटरी
निदेश—हिदायत—डाइरेक्शन
निदेशक—डाइरेक्टर ( प्रशासन )
निबंधक—पंजीयक—रजिस्ट्रार
निबंधन—पंजीयन—रजिस्ट्रेशन
नियंत्रक—कंट्रोलिंग—आफिसर
नियामक—अवरोधक—रेगुलेटर
नियोक्ता—नियोजिता—एम्प्लायर
निरंकुश राजतंत्र—अवसोल्यूट-मोनार्की
निरसन—किसी विधि आदि को अधिकारपूर्वक या वैधरीति से रद्द कर देना—रिपील्ड
निरीक्षक—इंसपेक्टर
निर्देशक—डाइरेक्टर ( प्रोग्राम )
निर्माता—प्रॉजेक्टर
निर्वांत—वेक्यूम
निलंबित—मुअत्तिल—सस्पेंडिड
निबन्धक—मुनीम
निशान्त—राजभवन
निष्कासिका—आउटलेट
८१० कौटिल्य का अर्थशास्त्र
निष्क्रांत—इवेक्यूई
निष्क्रिय लेखा—डेड अकाउंट
निष्पादक—एक्जिक्यूटिव
निसृष्टि—राज्य का प्रमाण पत्र
निस्तारण—काम पूरा करने की क्रिया—डिसपोजल
निस्यंदक—फिल्टर
निःस्वामिक भूमि—वह परती भूमि जो किसी के अधिकार में न हो—नो मेंस लैंड
नीवी—आय-व्यय के बाद का बचा हुआ धन
नैगम—नगर-व्यापारियों की सभा
नैमित्तिक—असाधारण—काजल
नौतरण—वहन जलयात्रा—नैविगेशन
नौबलाध्यक्ष—नौसेना का प्रधान सेनापति—एडमिरल
नौभार—कारगो
न्यायसभ्य—जूरी
न्यायिक—जुडिसियल
न्यास—निगम—ट्रस्ट
न्यासधन—ट्रस्टमनी
प
पंजी—रजिस्टर
पंजीयन—दर्ज करना—रजिस्ट्रेशन
पक्ष—सेना के अग्रभाग के दोनों पार्श्व
पञ्चगामी—पाँच गाँवों का कर-संग्रह करने वाला अधिकारी
पण—शर्त, राज्याभिषेक के समय राजा से इस बात की शपथ करायी जाती थी कि वह धर्म या कानून के अनुसार शासन करेगा
पण्य—व्यवहार योग्य—कॉमोडिटी
पण्यक्षेत्र—पण्यभूमि, बाजार—मारकेट
पण्यगृह—गोदामघर
पण्यशाला—भंडार—इम्पोरियम
पत्तनपति—हार्बर मास्टर
पत्ती—पार्टी
पत्रवाहक पंजी—पियन बुक
पथकर—मार्गकर—टॉल
पदक्रम—ग्रेड
पदक्षेप—मार्क टाइम
पदाति—पैदल सेना—इन्फैन्ट्री
परजीवी—पैरासाइटिक
परराष्ट्र मंत्री—फारेन मिनिस्टर
परिचर—सेवक—अटेंडेंट
परिचायक—डिटेक्टर
परिचालक—आपरेटर
परिदर्शन—इन्सपेक्शन (चिकित्सा)
परिधि—सरकल
परिपथ—सरक्यूट
परिपृच्छा—पूछ-ताछ—इनक्वाइरी
परिभाव्य धन—काउशन मनी
परिरक्षक—परजरवेटिव (चिकित्सा)
परिवर्त्तक—कॉन्वर्टर
परिवहन—ट्रांसपोर्ट
परिवाद—शिकायत—कॉम्प्लैण्ट
परिवीक्षा—परख—प्रोवेशन
परिव्यय—लागत—कॉस्ट
परिषद्—काउन्सिल
परिष्ठा—हैसियत—स्टेट्स
परिसंपत्ति—असेसमेण्ट
परीक्षक—टेस्टर
परीक्षण—टेस्ट
परीहार—करमुक्ति से सम्बद्ध राजाज्ञा-पत्र
पर्णिका—कूपन