भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 874, कुल 918 में से

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पृष्ठ 874

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कौटिल्य का अर्थशास्त्र

अपराधानुरूपो दण्डः ॥ ३२८ ॥ कथानुरूपं प्रतिवचनम् ॥ ३२९ ॥ विभवानुरूपमाभरणम् ॥३३०॥ कुलानुरूपं वृत्तम् ॥ ३३१ ॥ कार्यानुरूपः प्रयत्नः ॥३३२॥ पात्रानुरूपं दानम् ॥३३३॥ वयोऽनुरूपो वेषः ॥३३४॥ स्वाम्यनुकूलो भृत्यः ॥ ३३५ ॥

भर्तृवशवर्तिनी भार्या ॥ ३३६ ॥ गुरुवशानुवर्ती शिष्यः ॥ ३३७ ॥ पितृवशानुवर्ती पुत्रः ॥ ३३८ ॥ अत्युपचारः शङ्कितव्यः ॥३३९॥ स्वामिन-मेवानुवर्तेत ॥ ३४० ॥

मातृताडितो वत्सो मातरमेवानुरोदिति ॥ ३४१ ॥

स्नेहवतः स्वल्पो हि रोषः ॥ ३४२ ॥ आत्मच्छिद्रं न पश्यति परच्छिद्र-मेव पश्यति बालिशः ॥ ३४३ ॥

सोपचारः कैतवः ॥ ३४४ ॥ काम्यैर्विशेषैरुपचरणमुपचारः ॥३४५॥ चिरपरिचितानामत्युपचारः शङ्कितव्यः ॥ ३४६ ॥ गौर्दुष्कराश्वसहस्रादेका-किनी श्रेयसी ॥ ३४७ ॥ श्वो मयूरादद्य कपोतो वरः ॥ ३४८ ॥


व्यक्ति दूसरों पर भी सन्देह करता है ॥ ३२६ ॥ स्वभाव को बदलना बड़ा कठिन है ॥ ३२७ ॥

अपराध के अनुसार ही दण्ड देना चाहिए ॥ ३२८ ॥ प्रश्न के अनुसार ही उत्तर देना चाहिए ॥३२९॥ संपत्ति के अनुसार ही आभूषण धारण करने चाहिए ॥३३०॥ अपने कुल की मर्यादा के अनुसार ही कार्य करना चाहिए ॥ ३३१ ॥ कार्य के अनुसार ही प्रयत्न करना चाहिए ॥ ३३२ ॥ पात्र के अनुसार ही दान देना चाहिए ॥३३३॥ अवस्था के अनुसार ही वेष धारण करना चाहिए ॥ ३३४ ॥ स्वामी के अनुसार ही सेवक को कार्य करना चाहिए ॥ ३३५ ॥

पति के वश में रहने वाली पत्नी ही भार्या ( भरण-पोषण की अधिकारिणी ) होती है ॥ ३३६ ॥ शिष्य को सदा गुरु के अधीन रहना चाहिए ॥ ३३७ ॥ पुत्र को सदा पिता के अधीन रहना चाहिए ॥ ३३८ ॥ अत्यधिक आदर शंका का कारण होता है ॥ ३३९ ॥ सेवक को सदा स्वामी की आज्ञा का अनुगमन करना चाहिए ॥ ३४० ॥

माता के द्वारा ताड़ित बच्चा, माता के ही आगे रोता है ॥ ३४१ ॥

स्नेही व्यक्ति का कोप क्षणिक होता है ॥ ३४२ ॥ मूर्ख व्यक्ति अपने दोषों को नहीं, दूसरों के ही दोषों को देखता है ॥ ३४३ ॥

उपचार के साथ छल होता है ॥ ३४४ ॥ किसी विशेष अभिलाषा की पूर्ति के लिए की जाने वाली सेवा को 'उपचार' कहते हैं ॥ ३४५ ॥ सुपरिचित व्यक्ति का अतिशय आदर-दर्शन संशयकारी होता है ॥ ३४६ ॥ एक साधारण गाय भी सौ कुत्तों से बढ़कर होती है ॥ ३४७ ॥ कल मिलने वाले मोर की अपेक्षा आज मिलने वाला कबूतर ही अच्छा है ॥ ३४८ ॥

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