भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 873, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 873

चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७८९

अवस्थया पुरुषः सम्मान्यते ॥३०८॥ स्थान एव नराः पूज्यन्ते ॥३०९॥ आर्यवृत्तमनुतिष्ठेत् ॥ ३१० ॥ कदापि मर्यादां नातिक्रमेत् ॥ ३११ ॥ नास्त्यर्थः पुरुषरत्नस्य ॥ ३१२ ॥ न स्त्रीरत्नसमं रत्नम् ॥ ३१३ ॥ सुदुर्लभं रत्नम् ॥ ३१४ ॥
अयशोभयं भयेषु ॥ ३१५ ॥ नास्त्यलसस्य शास्त्रागमः ॥ ३१६ ॥ न स्त्रैणस्य स्वर्गाप्तिर्धर्मकृत्यं च ॥ ३१७ ॥
स्त्रियोऽपि स्त्रैणमवमन्यते ॥ ३१८ ॥ न पुष्ठार्थी सिंचति शुष्कतरुम् ॥ ३१९ ॥ अद्रव्यप्रयत्नो बालुकाक्वथनादनन्यः ॥ ३२० ॥ न महाजन-हासः कर्तव्यः ॥ ३२१ ॥ कार्यसम्पदं निमित्तानि सूचयन्ति ॥ ३२२ ॥ नक्षत्रादपि निमित्तानि विशेषयन्ति ॥ ३२३ ॥ न त्वरितस्य नक्षत्रपरीक्षा ॥ ३२४ ॥
परिचये दोषा न छाद्यन्ते ॥३२५॥ स्वयमशुद्धः परानाशङ्कते ॥३२६॥ स्वभावो दुरतिक्रमः ॥ ३२७ ॥


म्लेच्छ व्यक्ति की भी अच्छी बात को अपना लेना चाहिए ॥ ३०४ ॥ दूसरे के अच्छे गुणों से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए ॥ ३०५ ॥ शत्रु में भी यदि अच्छे गुण दिखायी दें तो उन्हें ग्रहण कर लेना चाहिए ॥ ३०६ ॥ विष में यदि अमृत हो तो उसे भी ले लेना चाहिए ॥ ३०७ ॥

अवस्था के अनुसार ही पुरुष को सम्मान प्राप्त होता है ॥ ३०८ ॥ अपने स्थान पर बने रहने से ही व्यक्ति को सम्मान मिलता है ॥ ३०९ ॥ मनुष्य को चाहिए कि वह सदा श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण का अनुसरण करे ॥ ३१० ॥ मर्यादा का कभी भी उल्लंघन न करना चाहिए ॥ ३११ ॥ पुरुषरत्न का कोई मूल्य नहीं है ॥ ३१२ ॥ स्त्रीरत्न से बढ़कर दूसरा रत्न नहीं है ॥ ३१३ ॥ रत्न का मिलना बड़ा कठिन होता है ॥ ३१४ ॥

समस्त भयों में अपयश का भय बड़ा है ॥ ३१५ ॥ आलसी पुरुष को कभी शास्त्र की प्राप्ति नहीं होती ॥ ३१६ ॥ स्त्री में आसक्त पुरुष को न तो स्वर्ग मिलता है और न उसके द्वारा कोई धर्मकार्य हो पाता है ॥ ३१७ ॥

स्त्रियाँ भी स्त्रैण पुरुष का अपमान कर देती हैं ॥ ३१८ ॥ फूलों का इच्छुक व्यक्ति सूखे पेड़ को नहीं सींचता ॥ ३१९ ॥ धन के बिना किसी कार्य का उद्योग करना बालू से तेल निकालने के समान है ॥ ३२० ॥ महापुरुषों का उपहास नहीं करना चाहिए ॥ ३२१ ॥ किसी कार्य के लक्षण ही उसकी सिद्धि या असिद्धि की सूचना दे देते हैं ॥ ३२२ ॥ इसी प्रकार नक्षत्रों से भी भावी सिद्धि या असिद्धि की सूचना मिल जाती है ॥ ३२३ ॥ अपने कार्य की सिद्धि शीघ्र चाहने वाला व्यक्ति नक्षत्रगणना पर अपने भाग्य की परीक्षा नहीं करता ॥ ३२४ ॥

परिचय हो जाने पर दोष छिपे नहीं रह सकते ॥ ३२५ ॥ अशुद्ध विचारों का