भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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७८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र

॥ २८१ ॥ लुब्धसेवी पावकेच्छया खद्योतं धमति ॥ २८२ ॥ विशेषज्ञं स्वामिनमाश्रयेत् ॥ २८३ ॥ पुरुषस्य मैथुनं जरा ॥२८४॥ स्त्रीणाममैथुनं जरा ॥२८५॥ न नीचोत्तमयोर्विवाहः ॥ २८६ ॥ अगम्यागमनादायुर्यशःपुण्यानि क्षीयन्ते ॥२८७॥ नास्त्यहंकारसमः शत्रुः ॥ २८८ ॥ संसदि शत्रुं न परिक्रोशेत् ॥२८९॥ शत्रुव्यसनं श्रवणसुखम् ॥ २९० ॥ अधनस्य बुद्धिर्न विद्यते ॥ २९१ ॥ हितमप्यधनस्य वाक्यं न गृह्यते ॥ २९२ ॥ अधनः स्वभार्ययाऽप्यवमन्यते ॥ २९३ ॥ पुष्पहीनं सहकारमपि नोपासते भ्रमराः ॥ २९४ ॥ विद्याधनमधनानाम् ॥ २९५ ॥ विद्या चौरैरपि न ग्राह्या ॥ २९६ ॥ विद्यया ख्यापिता ख्यातिः ॥ २९७ ॥ यशःशरीरं न विनश्यति ॥ २९८ ॥ यः परार्थमुपसर्पति स सत्पुरुषः ॥ २९९ ॥ इन्द्रियाणां प्रशमं शास्त्रम् ॥ ३०० ॥ अशास्त्रकार्यवृत्तौ शास्त्रांकुशं निवारयति ॥ ३०१ ॥ नीचस्य विद्या नोपेतव्या ॥ ३०२ ॥ म्लेच्छभाषणं न शिक्षेत ॥ ३०३ ॥ म्लेच्छानामपि सुवृत्तं ग्राह्यम् ॥३०४॥ गुणे न मत्सरः कर्तव्यः ॥३०५॥ शत्रोरपि सुगुणो ग्राह्यः ॥ ३०६ ॥ विषादप्यमृतं ग्राह्यम् ॥ ३०७ ॥


स्वामी की सेवा करके जीविकोपार्जन करना चाहिए ॥ २८१ ॥ कृपण स्वामी के सेवक की वही दशा होती है जो आग प्राप्त करने के लिए जुगुन्तू को पंखे से झलने वाले की होती है ॥२८२॥ विद्वान् (विशेषज्ञ) स्वामी का आश्रय प्राप्त करना चाहिए ॥२८३॥

अधिक मैथुन से पुरुष शीघ्र ही वृद्ध हो जाता है ॥२८४॥ मैथुन न करने से स्त्री शीघ्र वृद्ध हो जाती है ॥ २८५ ॥ नीच और उच्च व्यक्तियों में परस्पर विवाह-संबंध नहीं हो सकता ॥ २८६ ॥ वेश्या आदि ( अगम्य ) स्त्रियों के साथ सहवास करने से आयु, यश और पुण्य नष्ट हो जाते हैं ॥ २८७ ॥

अहंकार से बढ़कर दूसरा शत्रु नहीं है ॥ २८८ ॥ सभा में शत्रु की निन्दा न करनी चाहिए ॥ २८९ ॥ शत्रु का दुःख सुनकर कानों को आनन्द मिलता है ॥२९०॥ निर्धन पुरुष को बुद्धि नहीं होती ॥ २९१ ॥ धनहीन व्यक्ति की हितकर बात को भी नहीं सुना जाता ॥ २९२ ॥ निर्धन व्यक्ति की स्त्री भी पति का अपमान कर बैठती है ॥ २९३ ॥ पुष्परहित आम के पास भौंरे नहीं जाते ॥ २९४ ॥ निर्धन के लिए विद्या ही एकमात्र धन है ॥ २९५ ॥ विद्याधन को चोर भी नहीं चुरा सकता ॥ २९६ ॥ विद्या के द्वारा ही ख्याति प्राप्त होती है ॥ २९७ ॥ यशरूपी शरीर का कभी नाश नहीं होता ॥ २९८ ॥

जो मनुष्य परोपकार के लिए आगे बढ़ता है, वही सत्पुरुष है ॥ २९९ ॥ शास्त्र-ज्ञान से इन्द्रियां शान्त होती हैं ॥ ३०० ॥ अयुक्त कार्यों में प्रवृत्त व्यक्ति को शास्त्र का अंकुश ही संयम में लगाता है ॥ ३०१ ॥ नीच पुरुष की विद्या की अवहेलना नहीं करनी चाहिए ॥ ३०२ ॥ म्लेच्छ भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ ३०३ ॥