भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 871

चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७८७

कुलीनाद्विशिष्टः ॥ २६० ॥ नास्त्यवमानभयमनार्यस्य ॥ २६१ ॥ न चेतन- वतां वृत्तिभयम् ॥ २६२ ॥ न जितेन्द्रियाणां विषयभयम् ॥ २६३ ॥ न कृतार्थानां मरणभयम् ॥ २६४ ॥ कस्यचिदर्थं स्वमिव मन्यते साधुः ॥ २६५ ॥ परविभवेष्वादरो न कर्तव्यः ॥ २६६ ॥ परविभवेष्वादरोऽपि नाशमूलम् ॥ २६७ ॥ पलालमपि परद्रव्यं न हर्तव्यम् ॥ २६८ ॥ परद्रव्यापहरणमात्मद्रव्यनाशहेतुः ॥ २६९ ॥ न चौर्यात्परं मृत्युपाशः ॥ २७० ॥ यवागुरपि प्राणधारणं करोति काले ॥ २७१ ॥ न मृतस्यौषधं प्रयोजनम् ॥ २७२ ॥ समकाले स्वयमपि प्रभु- त्वस्य प्रयोजनं भवति ॥ २७३ ॥ नीचस्य विद्याः पापकर्मणि योजयन्ति ॥ २७४ ॥ पयःपानमपि विष- वर्धनं भुजङ्गस्य नामृतं स्यात् ॥ २७५ ॥ न हि धान्यसमो ह्यर्थः ॥ २७६ ॥ न क्षुधासमः शत्रुः ॥ २७७ ॥ अकृतेर्नियता क्षुत् ॥ २७८ ॥ नास्त्यभक्ष्यं क्षुधितस्य ॥ २७९ ॥ इन्द्रियाणि जरावशं कुर्वन्ति ॥ २८० ॥ सानुक्रोशं भर्तारमाजीवेत्


धनवान् भी रूपवान् समझा जाता है ॥ २५८ ॥ न देने वाले धनवान् को भी याचक लोग नहीं छोड़ते ॥ २५९ ॥ निम्नकुल में पैदा हुआ भी धनी पुरुष उच्चकुलोत्पन्न पुरुष से बड़ा समझा जाता है ॥ २६० ॥ नीच पुरुष को अपने तिरस्कार का भय नहीं होता ॥ २६१ ॥ चतुर पुरुष को जीविका का भय नहीं होता ॥ २६२ ॥ जितेन्द्रिय पुरुष को विषयों का भय नहीं होता ॥ २६३ ॥ आत्मदर्शी पुरुष को मृत्यु का भय नहीं होता ॥ २६४ ॥

जो सज्जन पुरुष होता है वह पराये अर्थ को अपने ही अर्थ की भाँति मानता है ॥ २६५ ॥ दूसरे के वैभव की लिप्सा न करनी चाहिए ॥ २६६ ॥ दूसरे के वैभव की लिप्सा करना भी नाश का कारण होता है ॥ २६७ ॥ पलालमात्र भी (थोड़ा भी) दूसरे के द्रव्य का अपहरण न करना चाहिए ॥ २६८ ॥ दूसरे के द्रव्य का अपहरण करना अपने द्रव्य का नाश करना है ॥ २६९ ॥ चोरी से बढ़कर कोई भी दुखदायी बन्धन नहीं है ॥ २७० ॥ उचित समय पर प्राप्त लपसी (यवागू) भी प्राणरक्षक होती है ॥ २७१ ॥ मृतक व्यक्ति का औषधि से कोई प्रयोजन नहीं होता ॥ २७२ ॥ समय आने पर ऐश्वर्य की आवश्यकता होती है ॥ २७३ ॥

नीच पुरुष की विद्यायें उसे पापकर्म में प्रवृत्त करती हैं ॥ २७४ ॥ सर्प को दूध पिलाने पर उसका विष ही बढ़ता है, वह अमृत नहीं बनता ॥ २७५ ॥ अन्न से बढ़कर दूसरा धन नहीं है ॥ २७६ ॥ भूख से बढ़कर दूसरा शत्रु नहीं है ॥ २७७ ॥ अकर्मण्य व्यक्ति को कभी-न-कभी भूख का कष्ट भोगना ही पड़ता है ॥ २७८ ॥ भूखे मनुष्य के लिए कुछ भी अभक्ष्य नहीं है ॥ २७९ ॥

इन्द्रियाँ मनुष्य को वृद्धावस्था में अपने वश में कर लेती हैं ॥ २८० ॥ कृपालु