कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरकाण्ड रामकी कृपालुता बालि-सो बीरु बिदारि सुकंठु थप्यो, हरषे सुर, बाजने बाजे । पलमें दल्यो दासरथीं दसकंधरु, लंक विभीषनु राज बिराजे ॥ राम-सुभाउ सुनैं 'तुलसी' हुलसै अलसी हम-से गलगाजे । कायर क्रूर कपूतनकी हद, तेउ गरीबनेवाज नेवाजे ॥१॥ बालि-से वीरको मारकर ( श्रीरामचन्द्रजीने ) सुग्रीवको राज्य दिया । इससे देवता लोग हर्षित होकर बाजे बजाने लगे । दशरथनन्दन ( श्रीरामचन्द्र ) ने पलभरमें रावणको मार डाला और लंकामें विभीषण राज्यपर सुशोभित हुए । तुलसीदासजी कहते हैं—श्रीरामचन्द्रजीका खभाव सुनकर मेरे-जैसे और आलसी भी आनन्दित होकर गाल बजाते हैं । जो लोग कायर, क्रूर और कपूतोंकी हद थे, उनपर भी गरीबनिवाज भगवान् रामने कृपा की । बेद पढ़ैं विधि, संभु सभीत पुजावन रावनसों नितु आवैं । दानव-देव दयावने दीन दुखी दिन दूरिहि तें सिरु नावैं ॥ ऐसेउ भाग भगे दसभाल तें, जो प्रभुता कबि-कोबिद गावैं । रामसे बाम भएॅं तेहि बामहि बाम सबै सुख-संपति लावैं ॥२॥