भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

कवितावली १०४ (अधीनता) चला गया और उनकी मनभायी बात हुई है। तथा वानर-भालु भी सब-के-सब 'ओहो रे ! खूब हुई, ओहो रे ! खूब हुई' ऐसा कहकर नाचते हैं। मारे रन रातिचर रावनु सकुल दलि, अनुकूल देव-मुनि फूल बरषतु हैं। नाग, नर, किंनर, बिरंचि, हरि, हरु हेरि पुलक सरीर, हिएँ हेतु हरषतु हैं॥ बाम ओर जानकी कृपानिधानके बिराजैं, देखत बिषादु मिटै, मोदु करषतु हैं। आयसु भो, लोकनि सिधारे लोकपाल सबै, 'तुलसी' निहाल कै कै दिये सरखतु हैं॥५८॥ श्रीरामचन्द्रजीने रावणका उसके कुलसहित दलन कर युद्धमें राक्षसोंका संहार किया। इससे देवता और मुनिगण प्रसन्न होकर फूलोंकी वर्षा करने लगे। यह देखकर नाग, नर, किन्नर तथा ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीके शरीर पुलकित हो जाते हैं और हृदयमें प्रेम और आनन्द भर जाता है। कृपानिधान (श्रीरामचन्द्रजी) की बायीं ओर जानकीजी विराजमान हैं, जिनके दर्शनसे विषाद मिट जाता है और आनन्द वृद्धिको प्राप्त होता है। लोकपाल सब आज्ञा पाकर अपने-अपने लोकोंको चले गये। गोसाईंजी कहते हैं कि भगवान्‌ने सबको निहाल कर-करके मानो परवाना दे दिया (कि अब तुमलोग निर्भय रहो)। इति लंकाकाण्ड