भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 106

१०३ लंकाकाण्ड विभीषनु नेवाजि, सेत सागर-तरनु भो ॥ घोर रारि हेरि त्रिपुरारि-बिधि हारे हिएँ, घायल लखन बीर बानर बरनु भो । ऐसे सोकमें तिलोकु कै बिसोक पलही में, सबही को तुलसीको साहेबु सरनु भो ॥५६॥ पिताने वनवास दिया, रावण-जैसा वीर शत्रु हो गया, जिसके द्वारा सीताजी हरी गयीं, तो भी जिनका मुख बड़ा प्रसन्न रहा- मलिन नहीं हुआ। बलशाली बालिको मारकर सुग्रीवकी रक्षा की, विभीषणपर कृपा की और पुल बाँधकर समुद्रको लाँघा; फिर जिनके घोर युद्धको देखकर शिव और ब्रह्मा भी हृदयमें हार गये और वीर लक्ष्मणजी घायल होकर (खून और मिट्टीसे ऐसे लथपथ हो गये कि) उनका रंग वानरोंका-सा (भूरा) हो गया। ऐसे शोकमें भी जिन्होंने तीनों लोकोंको पलमात्रमें विशोक कर दिया अर्थात् लक्ष्मणजीको सचेत और रावणको मारकर सबकी रक्षा की, वे तुलसीदासके प्रभु सभीको शरण देनेवाले हुए । कुंभकरन्नु हन्यो रन राम, दल्यो दसकंधरु, कंधर तोरे । पूषनबंसविभूषन-पूषन-तेज-प्रताप गरे अरि-ओरे ॥ देव निसान बजावत, गावत, सावँतु गो, मनभावत भो रे । नाचत बानर-भालु सबै 'तुलसी' कहि 'हा रे! हहा भै अहो रे!'।५७। भगवान् रामने युद्धमें कुम्भकर्णको मारा और रावणकी गर्दनें तोड़कर उसका भी वध किया। इस प्रकार सूर्यवंशविभूषण श्रीराम- रूप सूर्यके प्रतापरूप तेजसे शत्रुरूपी ओले गल गये । देवतालोग नगाड़े बजाकर गाते हैं, क्योंकि उनका सामन्तपना