कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १०२ पहुँचनेके स्थानतक एक ही पर्वत मालूम होता था । ] चल्यो हनुमानु, सुनि जातुधानु कालनेमि पठयो, सो मुनि भयो, पायो फलु छलि कै । सहसा उखारो है पहारु बहु जोजनको, रखवारे मारे भारे भूरि भट दलि कै ॥ बेगु, बलु, साहसु, सराहत कृपाल रामु, भरतकी कुसल, अचलू ल्यायो चलि कै । हाथ हरिनाथके बिकाने रघुनाथु जनु, सीलसिंधु तुलसीस भलो मान्यो भलि कै ॥५५॥ हनुमान्जीका जाना सुन रावणने राक्षस कालनेमिको भेजा । उसने मुनिका वेष बनाया और इस प्रकार छल करनेका फल पाया, अर्थात् मारा गया । हनुमान्जीने अनेकों योजनके पर्वतको सहसा उखाड़ लिया और रक्षकोंको मारकर बड़े-बड़े अनेक वीरोंका नाश कर दिया । 'देखो, हनुमान्जी चलकर पर्वत और भरतजीका कुशल-समाचार लाये हैं'—ऐसा कहकर कृपालु रघुनाथजी उनके बल, साहस और वेगकी सराहना करने लगे । मानो श्रीरामचन्द्रजी कपिनाथ (हनुमान्जी) के हाथ बिक गये । तुलसीदासके स्वामी शीलसिन्धु श्रीरामचन्द्रने सम्यक् प्रकारसे उनका उपकार माना । युद्धका अन्त बाप दियो काननु भो आननु सुभाननु सो, बैरी भो दसाननु सो, तीयको हरनु भो । बालि बलसालि दलि, पालि कपिराजको,