कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०१ लंकाकाण्ड है । महाबलशाली बालिको मारकर सुग्रीवकी रक्षा की और विभीषणको राजा बनाया । इधर स्त्री हरी गयी और भाई भी समरमें गिर गये; तो भी हृदयमें शरणागतकी ही चिन्ता है । भला, श्रीराम- चन्द्रजीके समान अपनी भुजाका आश्रय देनेवाला उदार और दयालु वीर दूसरा कहाँ मिलेगा ? लीन्हो उखारि पहारु बिसाल, चल्यो तेहि काल, बिलंबु न लायो । मारुतनंदन मारुतको, मनको, खगराजको वेगु लजायो ॥ तीखी तुरा 'तुलसी' कहतो, पै हिएँ उपमाको समाउ न आयो । मानो प्रतच्छ परब्बतकी नभ लीक लसी, कपि यों धुकि धायो ॥५४॥ [ लक्ष्मणजीकी मूर्च्छानिवृत्तिके लिये जब सुषेणने सञ्जीवनी बूटी निश्चित की तो उसे लानेके लिये श्रीहनुमान् जी द्रोणाचल पर्वतपर गये । तब उसे पहचान न सकनेके कारण ] उन्होंने उस विशाल पर्वतको उखाड़ लिया और तनिक भी विलम्ब न कर तत्काल चल दिये । उस समय मारुतनन्दन ( हनुमान्जी ) ने वायु, गरुड़ और मनकी गतिको भी लज्जित कर दिया । गोसाईंजी कहते हैं कि मैं उनके प्रचण्ड वेगका वर्णन करता; परन्तु हृदयमें उसकी उपमाकी सामग्री कहीं नहीं मिली । हनुमान्जी झपटकर ऐसे दौड़े कि आकाशमें पर्वतकी प्रत्यक्ष लकीर-सी शोभित होने लगी । [ तात्पर्य यह कि ऐसी शीघ्रतासे हनुमान्जी पर्वत लेकर चले कि चलने और